कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Thursday, 29 January 2015

गगन गिल - हंसी के बारूद पर लड़की

मैथिलीशरण गुप्त, निराला, महादेवी वर्मा से लेकर रघुवीर सहाय और आलोक धन्वा तक जिसने भी नारी की मूलभूत संवेदनाओं को पकड़ने की कोशिश की है उसने दुखों की एक जीवंत कथा रची है। अपने सारे संघर्षों और बदलावों के बाद भी हमारा प्रगतिशील तबका आधी दुनिया के दुखों को आज भी सरसरी तौर पर ही लेता है। उनके निजी संघर्षों को वह अपने उपयोगितावादी तराजू पर तौलता है। उसके होंठ लहूलुहान होते हैं और हमारी अंधी अपेक्षाएँ वहाँ फूल ही ढूंढ़ती हैं। ऐसे में गगन गिल की कविताएँ मार्मिक चुनौती के रूप में सामने आती हैं। इनमें लड़कियाँ हैं। अबोले दुखों के बोझ से झुकी हुई लड़कियाँ, उनके भार से गूंगी हुई लड़कियाँ। वे हमारे कंधे छूती हैं, विषम हंसी हंसती हैं और चली जाती हैं। यही चुनौती है। अपना दुख बाँटने को नहीं कहती हैं लड़कियाँ। आप में संवेदनाएँ हैं, कूवत है तो बढ़ें और बाँटें उनका दुख। दुख जिनके कारक आप हैं।
लड़कियों से संबंधित गगन की कविताओं में एक पूरी कथा है व्यथा की। किससे कहे लड़की। कौन सुनेगा इसे। विश्वास भी करेगा। किसी सहृदयी ने विश्वास किया भी, तो क्या उसे लेकर लड़ेगा भी और इसीलिए अकेली है लड़की, उदास भी और हंसी के बारूद पर बैठी है। फैज खूब समझते थे इस अफसुर्दा हंसी को। गगन की कविता बताती है कि किस तरह भारतीय समाज में लड़कियों को सुहागन बनाने की प्रक्रिया में अभागन बना दिया जाता है। किस तरह उनकी हर फड़कती नस को मुर्दा रंगीन रेखाओं में तब्दील कर दिया जाता है।
लड़कियां आधुनिकता की चाहत में अपनी त्वचा को रंगती, पोतती, उसकी पर्तें खोदती अपना सौंदर्य खोती चली जाती हैं, एक दिवालिया जिद में - लेकिन आजकल वह जिद में है, अपनी देह का सादापन धीरे-धीरे उखाड़ती हुई! गगन गिल की लड़कियों पर केंद्रित कविताओं की मुख्य विशेषता उनकी निर्मल करुणा का ममतामय भोलापन है। जिसे छूते भी भय लगता है। उसे छूना जैसे उदासी को छूना है - माँ की उम्र के इस मौसम में क्या खाकर मरोगे बेटे?, मिट्टी, घास, बर्फ पहले किसे कुरेदोगे, अपने नन्हें हाथों से या भूखे ही मरोगे?, बस नींद मत कुरेदना माँ की कभी, इसमें उसके सपनों की मिट्टी फंसी होगी।
करुणा का जैसा आलोक इन कविताओं में है विरले ही कहीं और होगा। करुणा की अभिव्यक्ति की इसी प्रतिभा को लेकर आलोक धन्वा खासे चर्चित हैं। पर एक ओर ये कविताएँ आलोक जी की करुणा के पीछे अलंकार के रूप में जो दुहराव होता है उससे मुक्त हैं, तो दूसरी ओर उनके यहाँ करुणा के साथ जो युग के सवाल होते हैं उसका उस रूप में यहाँ अभाव भी है। यहाँ सहजता है करुणा की, जो किसी ममतामयी नारी में ही हो सकती है। माताएँ हमारे यहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी किस तरह अपनी पुत्रियों को कुंठाएँ सौंपती हैं और बतलाती हैं कि ये ही सुख हैं उसे दिखलाती हैं ये कविताएं - बीत जाएँगे, जैसे भी होंगे स्याह काले दिन, हम हैं न तुम्हारे साथ! कहती हैं माँएँ और बुदबुदाती हैं खुद से, कैसे बीतेंगे ये दिन, हे ईश्वर!
किस तरह बार-बार लड़कियों को लुभाता प्रेम धोखा देता हुआ खुद शोक में बदल जाता है। प्रेम पर एक बिल्कुल ईष्र्यामुक्त दृष्टिकोण भी उभरता है गगन के यहां।
लड़कियों पर केंद्रित कविताओं से गगन की अपनी पहचान बनती है, वहाँ उनकी संवेदनाएँ खुलकर खिलती हैं और वे अमृता प्रीतम के सपाट रोमानीपन से मुक्त दिखती हैं। महादेवी के बाद हिंदी में नया उभार हैं गगन। नारी जीवन की विडंबनाओं को उसकी सांद्रता में उद्घाटित करने का साहस दिखलाती हैं वे।

पर गगन गिल  की बाद की कविताओं में उनकी करुणा, संताप की लगातार धीमी पड़ती लय में तब्दील होती दिखती है। उनका स्वर भी बदलता है और कवयित्री के शब्दों में ही –शब्दों से अधिक अनुगूंजेंबचती हैं वहां।’ ये अनुगूंजें सामान्य पाठकों के लिए एक बुझौवल साबित होती हैं। गगन गिल की करुणा आगे खुद उनके लिए भी अबूझ-सी होती जाती है - ‘न मैं हंसी न मैं रोयी’,’ ये दुख कैसा मैंने पाला इसमें अंधेरा न उजाला। 

रघुवीर सहाय - कहाँ से कौन लाएगा वह दिमाग

1955 में मुक्तिबोध लिखते हैं- ‘‘लगभग सभी कवियों में विकसित विश्वदृष्टि का अभाव मिलता है। अगर किसी में कोई विश्वदृष्टि है भी, तो वह ऐसी स्थिति में है कि वह उसकी भाव-दृष्टि का अनुशासन प्रायः नहीं कर पाती है।’’ और जब रघुवीर सहाय की ‘सीढि़यों पर धूप में’ से लेकर ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियों’ तक की यात्रा का मैं आकलन करता हूँ, तो पाता हूँ कि एक आतंक है वहाँ, धूमिल की चीख और चुप्पी के अंतःसंबंध को अप्रासंगिक करार देता हुआ दुःपरिभाष्य इसीलिए अगम्य, अवध्य आतंक, एक अराजकता है, जिसमें राजनीतिक शोहदेपन के मार-तमाम भाष्य बिखरे पड़े हैं। धूप में चित्त लेटी एक स्त्री है, जिसने ‘पतिव्रता’ से ‘रखैल’ और ‘पतुरिया’ तक की यात्रा की है। वहाँ एक दर्द मिलता है उबासी भरा। और एक हंसी मिलती है गमगीन-सी, जो शमशेर के यहाँ पाई जाती है।
पर यह सब काफी है क्या? क्या उच्च मध्यवर्गीय जीवन के अलावे का पिचहत्तर प्रतिशत जीवन, जो महानगर के बाहर रहता है, की समझ कविता की आधुनिकता के लिए जरूरी नहीं है? गाँव, कस्बा, नगर, उपनगर का जीवन और मजदूरों-किसानों का जीवन सहाय की कविता में आ नहीं पाता है। इस पर विचार किया जा सकता है। या इस बारे में रामविलास शर्मा के विचार सिर्फ यूटोपिया हैं। सहाय जी की जीविका रेडियो, अखबार, टेलिविजन से जुड़ी रही तो क्या मीडिया के यंत्रीकृत दबावों की भी उनकी कविता पर कोई भूमिका बनती है?
बच्चन की कविता से सहाय जी का कंठ फूटता है। और कुछ लोगों को लगता है कि जिस तरह उत्तर छायावाद में बच्चन और दिनकर और बाद में एक हद तक अज्ञेय मुख्यता से उभरते हैं, पर कविता की परम्परा पंत-प्रसाद-निराला के बाद मुक्तिबोध, शमशेर, त्रिलोचन, केदार, नागार्जुन से जुड़ती है, उसी तरह इनके बाद रघुवीर सहाय पूरे काल छाये रहते हैं, पर क्या वह परम्परा कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा, अरुण कमल और विजेन्द्र से नहीं जुड़ती है। क्या इस जुड़ाव को परिभाषित करने के लिए इन कवियों को भी अज्ञेय की तरह रघुवीर सहाय की कवितांतक आधुनिकता से जूझना नहीं पड़ेगा? क्या सहाय जी की मृत्यु उन्हें इस संघर्ष से बचा सकती है।
जितनी बूंदें
उतने जौ के दाने होंगे
इस आशा में चुपचाप गाँव यह भीग रहा है।
इन पंक्तियों का सच क्या मुकम्मिल नहीं है। आगे उनकी कविता से गाँव और उसका यह स्वर निर्वासित क्यों हो जाता है? जबकि केदारनाथ सिंह गाँव की इस ताकत को उसकी आत्मा और सुगंध के साथ ‘तार सप्तक’ से ‘अकाल में सारस’ तक लेकर चलते हैं। महानगर का अर्थ क्या है- सत्ता। सत्ता का शासन गाँवों पर भी है, पर क्या महानगरों से गाँवों की नकेल पकड़ कर उन्हें विकसित किया जा सकता है? क्या रघुवीर सहाय भी श्रीकान्त वर्मा की तरह सत्ता की विकृतियों तक सीमित नहीं रह जाते हैं। सत्ता सिरमौर है इसलिए उसकी विकृतियों का विश्लेषण भी साहित्य का सिरमौर हो जाएगा।
कुछ लोग हिन्दी कविता की परम्परा को निराला के बाद मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से जोड़ते हैं और तर्क देते हैं कि तीनों युग की विकृत विडंबनाओं से एक से आतंकित रहते हैं। क्या आतंकित रहने से परम्परा बनती है या उससे जुड़ने से, जूझने के साहस से, विवेक से। यह सर्वाधिक गहरा और बहुआयामी आतंक सबसे ज़्यादा मुक्तिबोध को ही ग्रसता है, पर वे विचलित नहीं होते हैं। वे लिखते हैं- ‘ कम-से-कम प्रस्तुत समय में, भारत में ऐसी कोई भयानक बाधा नहीं है जो लेखक को अपने पूर्ण और मूर्त आत्मप्रकटीकरण अथवा जीवन चित्राण से रोके।‘
आज कौन-सी नई बाधा अभिव्यक्ति को अमूर्त कर रही है। चीख और चुप्पी का अंतर मिटा ताकत ही ताकत का दर्शन रच रही है। यहाँ रघुवीर सहाय की ‘रामदास’ कविता की तुलना कुंवर नारायण के सम्मोदीन की लड़ाई’ कविता से करें तो राहत मिलती है।रामदास की तरह निहत्था सम्मोदीन का भी मारा जाना तय है पर उसकी मौत उसके संघर्ष का अंत नहीं -

जल्दी ही वह (सम्मोदीन) मारा जाएगा
सिर्फ उसका उजाला लड़ेगा।
रघुवीर सहाय के यहाँ आतंक तो दिखता है, पर उसका प्रतिकार कहाँ और कैसा है -‘ले आओ कहीं से वह दिमाग’, ‘रामदास मारा जाएगा’, ‘ऐसे हंसो वैसे हंसो नहीं तो मारे जाओगे’, ‘जो गवाह होगा मारा जाएगा’ । पर हल कहाँ है? क्या सबसे बड़े दुस्साहसी वहीं नहीं होते, जहाँ सबसे ज्यादा खतरे होते हैं। खतरे का यह आत्मघाती स्वरूप किसकी पैदाइश है? रघुवीर सहाय खतरे का कोई निदान नहीं खोजते, तो सुधीश पचौरी कविता का ही अंत देखते हैं, ठीक ही है कि ‘कहाँ से कौन लाएगा वह दिमाग।’


Wednesday, 28 January 2015

राजकमल चौधरी : उसकी शख्सियत घास थी

राजकमल ने जीवन का वह रास्ता चुना था, जिसमें हर कदम पर विसंगतियों के नाग फन काढ़े खड़े थे, और वह भी जीवन था, और है। उसे हम भूल जाते हैं अपनी प्रगतिशीलता की रौ में। उन नागों ने उन्हें डंसा, पर वे मरे नहीं, हालाँकि मृत्यु का भय उन्हें सताता रहा।
हमारे बहुत से कवियों को कभी न कभी मृत्यु का भय सताता है। वे सब मृत्यु से जीत तो जाते हैं, पर उससे भयमुक्त नहीं हो पाते। महाप्राण निराला ने लिखा था - आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला, पके आधे बाल मेरे, हुए निष्प्रभ गाल मेरे, चाल मेरी मंद होती जा रही, हट रहा मेला। ओज व तेज के प्रतीक दिनकर ने भी अंत में ‘हारे को हरिनाम’ लिखा ही। किसी भी भय को कम करने का तरीका यह है कि उसके निकट जाएँ हम, छूकर देखें उसे। श्रीकांत वर्मा ने ऐसा प्रयास किया था -  हम खोद ही तो रहे हैं जब से हमने सीखा है फावड़ा चलाना, जब से यह जाना कि शव है हर बार पाया मणिकर्णिका। पर वे भी इस भय से मुक्त नहीं हो सके। अंत में लिखा, ‘इस तरह मत मरो/मौत से डरो।’ संभवतः राजकमल को अपने पूर्ववर्तियों के अनुभव ने ही उस मृत्यु के भय को कम करने हेतु, उसे निकट से जानने को उन अंधी सुरंगों में जाने को विवश किया हो। जहाँ जाने की हिम्मत अन्य नहीं कर सके, फिर भी जिन्हें मृत्यु ने घेरा। राजकमल ‘मृत्यु की जीवित दुनिया में’ गए। उसका जहर झेला। उसके नशे में विभ्रमित हुए। मृत्यु के कगार तक जा-जाकर लौटे और आज हम देख रहे हैं कि उनका भय निराधार था और वह हमारे बीच जिंदा हैं।
राजकमल अपने अंदर तथा बाहर के सच की मशाल थामे अपने अंदर तथा बाहर के अंधकार से जूझते थे। वे ‘वियतनाम का युद्ध’ अपनी हड्डियों में लड़ा जाता महसूस करते थे। वे जानते थे कि - ‘कि शाम को बंद किए गए दरवाजे सुबह नहीं खुलते’। पर जब वे भाषा, जो कि धरती है को वेश्या कहते थे, तो तय है कि वे नहीं उनका नशा बोलता था। अब यह फर्क हमें करना है कि कहाँ से उनकी भाषा में अंधी गलियों का जहर घुलता है, जिसे निकट से जानने वे वहाँ गए थे - बहुत हद तक जाना भी था। ये अंधी गलियाँ थीं और हैं - हमें आगे भी इनका सच जानना बाकी है। इसके लिए राजकमल की जिज्ञासा, जिजीविषा तथा उनका आत्मविश्वास भी चाहिए।
राजकमल की तल्ख सच्चाइयों से बचने की कोशिश में लोग उसे ढँकने को काले लबादे फेंकते रहते हैं। पर दुख होता है जब उनके शुभचिंतक उन लबादों को नोंचने के बजाय उस पर एक और सुनहरा लबादा फेंककर एक नई सच्चाई थोपने का प्रयास करते हैं। ऐसी लीपापोती राजकमल को खोलने की बजाय ढंक लेती है। राजकमल पर लिखी गई धूमिल की पूरी कविता पढ़कर सही अर्थों में राजकमल से परिचित हुआ जा सकता है - वह सौ प्रतिशत सोना था ऐसा मैं नहीं कहूँगा, मगर यह तय है कि उसकी शख्सियत घास थी, वह जलते हुए मकान के नीचे भी हरा था, एक मतलबी आदमी जो अपनी जरूरतों में, निहायत खरा था।

अंधी गलियों में भटकने वाले कितने हैं जो राजकमल की तरह स्वीकारते हैं - पूरा का पूरा युद्धकाल मैंने गलत जिया है। कुरूपता के संगठित रूप का तिलिस्म कितनों ने तोड़ा है। जहर का घूंट पीकर कितनों ने अमृत जोड़ा है। बहुत कम ने। और राजकमल की तरह शायद किसी ने नहीं? राजकमल की चुनौती स्वीकारते धूमिल ने लिखा था - मैं उन तमाम चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना चाहता हूँ, जिनका सामना करने के लिए छत्तीस साल तक वह आदमी, अंधी गलियों में नफरत का दरवाजा खट-खटाता रहा, कैंचियों की दलाली करता रहा। 
लेकिन, चुनौतियों को स्वीकार करने की ताकत कितनों में है? आदमी की गुलामी के खिलाफ अड़तीस साल की अपनी छोटी-सी जिंदगी में उपन्यास, कहानी और कविता की दो दर्जन किताबें लिखने वाले राजकमल चौधरी का हिंदी में मूल्यांकन किया जाना अभी बाकी है। मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’, आलोक धन्वा की ‘जनता का आदमी’ की तरह राजकमल की कविता ‘मुक्तिप्रसंग’ बदलते समय संदर्भों में हमेशा प्रासंगिक रही है। जिजीविषा और मुमुक्षा (मरने की इच्छा) के दो छोरों के बीच यह कविता व्यक्ति के उसके अहं से टकरावों और मुक्ति की गाथा है, जिसके वैश्विक संदर्भ उसे मनुष्यता के लिए संघर्षरत आमजन की कविता में बदल देते हैं - सुरक्षा के मोह में ही सबसे पहले मरता है आदमी, अपने शरीर के इर्दगिर्द दीवारें ऊपर उठाता हुआ, मिट्टी के भिक्षापात्र आगे और आगे बढ़ाता हुआ, गेहूँ और हथियारबंद हवाई जहाजों के लिए ... जब कि नंगा-भूखा बीमार आदमी सुरक्षित होता है। अमेरिकी सुरक्षा के तर्कों वाली हमलावर नीतियों के संदर्भ में राजकमल वैसे ही प्रासंगिक हैं जैसे कि वे 1966 में थे। 

Tuesday, 27 January 2015

विष्णु खरे - कविताएँ हैं या श्राप


जिस तरह निराला ने कविता को छंदों से मुक्त किया, केदारनाथ सिंह ने उदात्तता से मुक्त किया और उसी तरह एक हद तक रघुवीर सहाय ने और ज्यादा समर्थ ढंग से विष्णु खरे ने उसे करुणा की अकर्मण्य लय से मुक्त किया है, और इस कविता को बचा लिया है अस्तित्व के संकट से। कवियों की बड़ी दुनिया के लिए नया प्रवेश द्वार खोल दिया है। केदार जी के यहाँ करुणा की जगह अगर खुशी दिखाई देती है, रघुवीर सहाय के यहाँ अगम्य-अवध्य आतंक, तो खरे के यहाँ क्षोभ और यथार्थ का स्वीकार मिलता है।
पर रघुवीर सहाय की कविता जहाँ महानगर केंद्रित है और ‘मैं’ पन के बोझ से दबी है, वहाँ खरे की कविता महानगर से तो अपने पात्रों को उठाती है पर जब कविता  पूरी होती है तो महानगर की जगह कविता में उठा विषय अस्तित्वमान हो उठता है। महानगर गौण होकर गायब-सा हो जाता है। यहाँ महत्त्वपूर्ण यह है कि इसके लिए ना तो उन्हें केदार जी की तरह मात्रा स्मृतियों के सहारे रहना पड़ता है, ना वे संदर्भों का आधुनिक कवियों की तरह चौंकाने वाले ढंग से इस्तेमाल की प्रचलित चालाकी दिखलाते हैं। बल्कि विषयवस्तु से ऐसा गहरा लगाव (एंगेजमेंट) या प्रतिबद्धता वहाँ दिखती है कि एक दर्शक या प्रस्तुतकर्ता के रूप में कवि गायब-सा हो जाता है। खरे की अधिकांश कविताएँ रघुवीर सहाय के ‘मैं’ पन, जिसमें गवाह होने की ध्वनि गहरे तक सुनाई पड़ती है, से मुक्त रहकर भी समस्या को पाठकों के रूबरू खड़ा कर देती है, और कवि अनुपस्थित-सा हो जाता है।
यही कारण है कि खरे की कुछ कविताओं को तो दुबारा पढ़ने की हिम्मत नहीं पड़ती। ‘आग’ एक ऐसी ही कविता है। जो रोज घटने वाली दहेज प्रताड़ना को लेकर है, पर उसे पढ़ते लगता है कि अगर ऐसी घटना घट रही है और आप उसे जान रहे हैं तो या तो इस आग को बुझाने की कोशिश कीजिए या इस मुद्दे को प्रसंग से बाहर कीजिए। ऐसी कविताएँ ‘कविता के लिए कविता’ की सुविधा से हमें वंचित करती हैं। इस मामले में ये कविताएँ परंपरागत रूप से अच्छी कविता होने की बजाय बुरी कविताएँ साबित होती हैं। क्योंकि ये अपने कष्ट में आपकी हिस्सेदारी माँगती हैं। ये स्त्रियों के जलाए जाने की पीड़ा को उत्सवता में नहीं बदल डालती हैं।
‘उनकी हत्या की गई/ उन्होंने आत्महत्या नहीं की/ इस बात का महत्त्व और उत्सव/ कभी धूमिल नहीं होगा कविता में’ (ब्रूनो की बेटियाँ - आलोक धन्वा)
इस मामले में मैं अपने ही आचरण से परेशान हूँ। क्योंकि ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ मेरी प्रियतम कविताओं में है। खरे पर विचार करने पर लगता है कि क्या मुझे भी करुणा के महोत्सव में शामिल होना अच्छा लगता है। ‘आग’ को तो मैं मुश्किल से पढ़ सका। बेचैन-सा हो गया जैसे कविता नहीं पढ़ रहा होऊँ, खुद जला रहा होऊँ या जलती देख रहा होऊँ। अब ऐसी कविता लोग बार-बार कैसे पढ़ सकते हैं। इस मामले में ये बुरी कविताएँ हैं कि ये परंपरागत रूप से अच्छी ‘फिर से पढ़ो’ वाले तर्ज पर पढ़ी जाने वाली कविताएँ नहीं हैं। बल्कि ये संवेदनशील पाठक को चुप करा देने वाली कविताएँ हैं। जैसे गोहत्या का पाप लगा हो। और यह कहते मुझे डर लगता है कि ये कविताएँ हैं या श्राप, जो मेरी आँखों में आँखें डाल खड़ी हो जाती हैं। ‘लड़कियों के बाप’, ‘जिल्लत’, ‘बेटी’, ‘हमारी पत्नियाँ’, ‘बच्चा’, ‘एक कम’, ‘साम्बवती’ आदि ऐसी ही बुरी कविताएँ हैं, जो कहती हैं कि अगर ये स्थितियाँ हैं और बुरी हैं, तो इसके कारक आप भी हैं। संभव हो तो इसे मिटाएँ, नहीं तो चर्चा कर उत्सव ना बनाएँ।
‘लोग भूल गए हैं’ की एक कविता ‘अरे अब ऐसी कविता लिखो’ में रघुवीर सहाय लिखते हैं - अरे अब ऐसी कविता लिखो कि कोई मूड़ नहीं मटकाय ना कोई पुलक-पुलक रह जाय ना कोई बेमतलब अकुलाय।  सहाय की इस माँग को खरे की कविताएँ पूरी करती लगती हैं। ‘रामदास’ जैसी कविताओं में सहाय जी भी ऐसी कविता लिखने की कोशिश करते हैं। पर वे एक आतंककारी विवरण से आगे नहीं बढ़ पाते। खरे के यहाँ आतंक चुनौती की तरह सामने आता है। नामवर सिंह ने अच्छे आलोचक के बारे में कहीं लिखा था कि उसकी पहचान इससे होती है कि वह कविता की किन पंक्तियों को उद्धृत करता है। पर इस अर्थ में विष्णु खरे को अच्छा आलोचक शायद कभी नहीं मिल पाएगा। क्योंकि उनकी अधिकांश कविताएं भाषा संबंधी किसी भी रेटारिक, मुहावरे या पंक्तियों या पैरे को ज्यादा या कम प्रभावी बनाने के लिए किए गए चमत्कारों से मुक्त हैं। इस संदर्भ में मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं कि- ‘यह सबके अनुभव का विषय है कि मानसिक प्रतिक्रिया हमारे अंतर में गद्यभाषा को लेकर उतरती है, कृत्रिम ललित काव्य-भाषा में नहीं। फलतः नई कविता का पूरा विन्यास-गद्यभाषा के अधिक निकट है।’
‘सोनी’, ‘हर शहर में एक बदनाम औरत होती है’, जैसी कविताओं को छोड़कर अधिकांश का प्रभाव छायाचित्रों की तरह पड़ता है, जिनमें कुछ भी घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता। यहाँ ज्ञानेंद्रपति की बात महत्त्वपूर्ण लगती है कि - ‘सच्ची कविता में स्थितियाँ, जिन्हें मानवीय संवेदना से निहारा जाता है, वे अपने प्रभावों में प्रतीक बन जाती हैं। उन्हें प्रतीक बनाने की सचेत कोशिश नहीं की जाती। बल्कि वे प्रत्यालोकन में प्रतीक बन जाती हैं।’ रघुवीर सहाय यहीं कमजोर पड़ जाते हैं, उनके यहाँ निहारना कम देखना ज्यादा है। पर खरे के संदर्भ में यह निहारना भी काफी नहीं पड़ता। निहारना की जो एक रोमांटिकता है उसकी जगह एक गहरा व जटिल दायित्वबोध पैदा करते हैं वे। वह दो टूक कलेजे के नहीं करता, दो टूक पूछता है कि मैं हूँ यह आपके समक्ष, जो भी जैसा भी आपका जो उत्तरदायित्व बनता हो, वह पूरा करें।
पर निहारना के रागात्मक स्वरूपोंवाली अप्रतिम सौंदर्यबोध की कविताएँ भी खरे के पास हैं। लापता, अज्ञातवास, सत्य, द्रौपदी के विषय में कृष्ण आदि ऐसी ही कविताएँ हैं। ‘द्रौपदी के विषय में कृष्ण’ पढ़ते ‘कनुप्रिया’ की याद आती है। हालाँकि भारती के यहाँ आवेगों, उच्छ्वासों की जो व्यापकता है, उससे यह कविता मुक्त है। पर स्त्री-पुरुष की आदिम अंतरंगता को शायद यह कविता अब-तक की सर्वाधिक मधुरता के साथ सामने लाती है। इस तरह के ये चरित्र कविता में अपनी ऐतिहासिकता खोकर समकालीन होते लगते हैं। लगता है कि इतिहास ऐसे ही मधुर स्पंदनों के सहारे जीवित रहता है -
किन्तु किसे विश्वास होगा कि तुम्हारे मुख पर सदैव ऐसा कुछ था
कि प्रासाद में अकेले छोड़ दिए गए हम
परस्पर अर्थों को अंतिम सीमाओं तक समझते हुए

एक-दूसरे के स्पर्श तक की इच्छा नहीं करते थे’