कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Saturday, 28 February 2015

प्रसन्न चौधरी - पौराणि‍क डर व आ‍धुनिक विश्वास

मन एव मनुष्याणां’ ऐसे कवि की कविता है, जिसके विश्वास पौराणिक हैं और डर आधुनिक। अपने पौराणिक विश्वासों से कवि इन आधुनिक डरों का मुकाबला करना चाहता है। ऐसा करते हुए वाल्ट डिज्ने और रूपर्ट मडोक के आतंक से त्राहिमाम करता कवि वेद और गीता की पंक्तियों की शरण लेता है। अपने सामाजिक विकास को उसके संदर्भों में परिभाषित करता हुए कवि थककर अपने एकांतिक विश्वासों की शरण लेता है। वह अहं ब्रह्मष्मि-तत्वमसि-इदं अहम् अस्मि से लेकर ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या जैसी अवधारणाओं को कभी उसी रूप में और कभी कई आवरणों में छुपाकर प्रस्तुत करता है। और मन ही मनुष्य है की वैदिक अवधारणा में खुद को आरोपित करता है। ऐसा करते हुए वह मन, जो कि अनन्त है की बलि देने की बात करता है और सर्वस्व दान की महिमा बखानता है। 
वस्तुतः यह कविता ‘हारे को हरिनाम’ है। ‘‘मन ही मनुष्य है’’ विकास के उस स्टेज की अवधारणा है, जब मनुष्य पशु से मानव की श्रेणी में आने को प्रयासरत था। तब मन (इच्छा) के उद्भव ने ही उसे मनुष्य के रूप में अलग पहचान दी। तब श्रम और उसका संघर्ष पूरी तरह सामने नहीं आया था। जब जंगल फल-मूल से भरे थे और कटे हुए खेतों से चुने गए अन्न से आश्रमों का काम चल जाता था। आज एक ओर जहाँ मन अनंत नहीं रह गया है। उसकी उड़ान बार-बार बाधित हो रही है। और सारा काम बेमन का रह गया है। आज दुनिया परस्पर की दासता से संचालित हो रही है। मन पर दुनिया भर की चिंताओं का बोझ है। ऐसे में मन की बलि से जरूरी है कि हम चिंता करें कि मन बचे कैसे? कैसे उसकी अनंतता वापस हो?
यूं कवि का खुद मन की अनंतता पर विश्वास नहीं रह गया है तभी तो अंत में वह लिख जाता है कि - ‘‘हर चीज का अन्त था। लेकिन मेरी कविता तो अनन्त की कविता थी।’’ अंत में हैं की जगह थी का प्रयोग कर खुद कवि कविता को अंत की कविता मान लेता है। शायद वह यथार्थ से इतना आतंकित है कि इतिहास के बाहर जा ही नहीं पा रहा। प्रलय के पूर्व मन की अनन्तता और उसकी बलि का विचार गल्प हो सकता है यथार्थ नहीं। इस अंतःगामी दर्शन से विकास और
विनाश का जिन्न फिर अंगीठी में समाने वाला नहीं। जनसंख्या नियंत्राण और मन को बचा लेने की चेतना से ही बचाव संभव है। मन के बेमन होते जाने के अलावे इसका दूसरा पहलू यह है कि आज केवल आदिम युग का मन ही नहीं रह गया है। आबादी के एक हिस्से में मन के अलावे उसे नियंत्रित करने वाली चेतना भी विकसित हुई है, जिसका इस विश्व मानव की अनंत की कविता में कोई जिक्र नहीं। और आज मन की बलि देने के रहस्यवादी तर्क की बजाय मन को बेमन होने से बचाने के लिए अपनी चेतना की भट्ठी में लकडि़याँ डालते रहने की जरूरत है। क्योंकि बाजार के बहुराष्ट्रीय हमले से बचने के लिए मात्रा गीता के सत्य, दया वाले मंत्रों का जाप काफी नहीं है जैसा कि कवि अंत, में करने की सलाह देता है, क्योंकि इन मंत्रों के जाप से आगे जाकर उसे यथार्थ की भूमि पर स्थापित करने की कोशिश गाँधी और बुद्ध कर चुके हैं। यह  कविता क्षणों के उदात्तीकरण के सिवा कुछ नहीं है। इकबाल का एक शेर है -  अपने मन में डूबकर पा जा सुरागे जिन्दगी, तू अगर मेरा नहीं बनता न बन, अपना तो बन। इसका जो निहितार्थ है वही ‘मन एव मनुष्याणं’ कविता का सार है। अपने मन में डूबकर जिन्दगी का रहस्य जानने की सलाह इकबाल उसे देते हैं, जो औरों का बनने की क्षमता खो चुके हैं। परिशिष्ट में भारतीय चिन्तन विधि पर टिप्पणियाँ करता कवि एक जगह कहता है कि भेदों की नयी सत्ताएँ भेदों की पुरानी सत्ताओं की जगह लेती जाती है। फिर किस मोह में कवि आधुनिक डरों के मुकाबले पौराणिक दर्शन की शरण लेता चाहता है। नयी भेद सत्ताएँ जन्म ले लेंगी हमें सचेतन ढंग से काम जारी रखना है। पर कवि पर तो भेदों की सत्ता से ज्यादा अभेदवाद का भूत सवार है। पूरी सृष्टि में उसे अपनी जन्म कथा के अलावे कुछ सूझता ही नहीं है - ‘‘जनमने की अनगिनत कहानियाँ हैं। और इन सबमें मैं हूँ’’। भेदों की नहीं, संयोगों की सत्ता को ही वह देख पाता है और उसके लिए सत्य मात्र नियति है। नियतिवाद के मोह में वह सारे विकास को नकारता है और अशोक वाजपेयी की तरह घोषित करता है - ‘कि सब कुछ वही है कुछ बदलता नहीं है।’ पत्थर के औजारों से प्रक्षेपास्त्रों तक यही है आदम जात का सफरनामा बाकी सब भ्रम है। भास, कालिदास, शेक्सपीयर, इमरसन, बुद्ध, गाँधी सबको कवि भ्रम बतलाता है। लेकिन वे हमारे पशुत्व के बारे में सिर्फ भ्रम जगाते हैं हम वही हैं जो थे - पाखंडी पशु... सभी फेंकते पत्थर दूसरे पर कोई नहीं झाँकता अपने भीतर। अब पाठक बताएँ यह भ्रम क्या शंकर के अद्वैती भ्रम से अलग है। यही सच है तो कविता किसलिए।

बद्री नारायण भी इस सदी को हत्यारों की सदी मानते हैं। शायद यह एक नई दृष्टि है, जो गाँधी-लेनिन-माओ-मंडेला की सदी को हत्यारों की सदी साबित करती है। शायद इनके लिए गाँधी के सच से बड़ा गोडसे का सच है। दिनकर ने लिखा था - ‘‘झड़ गई पूंछ रोमांत झड़े, पशुता का झड़ना बाकी है।’’ पर उन्होंने पशुता को अपरिवर्तनीय सच नहीं कहा था। उन्हें विश्वास था कि पशुता तो बाकी है वह कभी निर्मूल होगी। वस्तुतः पशुता नहीं पशुता के साथ मनुष्यता का द्वंद्व सच है। मनुष्यता का प्रबल पक्ष यह कि पशुत्व से संचालित सारी शक्तियाँ भी अपने क्रूर कार्यों को मानवीय दर्शाने की कोशिश करती हैं, पर मनुष्य कभी भी अपने को एक पशु की तरह देखने की कोशिश नहीं करता। मन एव मनुष्याणां, कविता की तुलना राजकमल चौधरी के ‘मुक्तिप्रसंग’ से की जा सकती है। मुक्तिप्रसंग अपेक्षाकृत सघन कविता है और वहाँ जटिलताओं के आयाम भी ज्यादा है। मुक्तिप्रसंग में भी एक त्रिशूल है। कोशी और कमला बलान की पृष्ठभूमि दोनों जगह है। दोनों में स्त्री-कृष्ण विवर, उग्रतारा और महाजननी है। दोनों ही मुक्ति की गाथा हैं। पर जहां मुक्तिप्रसंग मनुष्यता की मुक्ति का व्यक्तिगत प्रयास है वहीं ‘‘मन एवं मनुष्यणां’’ व्यक्ति की मुक्ति का व्यक्तिगत प्रयास। जहाँ साफ-साफ कह देने का साहस राजकमल चौधरी के बयान को आकर्षित करने वाली कविता बना डालता है। वहीं साहस की कमी से यह कविता एक सुंदर चंदन लिपे शव की झाँकी बन जाती है। कवि के अनुसार गाँधी, और बुद्ध के अनुयायी नरमुंडों के व्यापारी हैं। क्या कवि ने कभी अनुयायी बनने की कोशिश की? क्या वह भ्रष्ट हो गया? कवि एक ऊँचाई से इस दुनिया को देखता है, उसे सब बौना नजर आता है। यह कविता इसी बौनेपन से त्रस्त भारतीय मनीषा के समाधिस्त होने का प्रयास है। 

Tuesday, 24 February 2015

शमशेर - जो तू नहीं है, ओ काल

छायावादोत्तरकाल ने हिंदी कविता में रहस्यवाद, शून्य, संशय की परंपरागत अवधारणा के मुकाबले ठोस, तल्ख, दुर्निवार सौंदर्य की द्वंद्वात्मक अवधारणा की जो शुरुआत की थी वह शमशेर की कविताओं में आकर अपने सारे आयाम पाती है, पूर्ण होती है, देखें - 
य’ शाम है, कि आसमान खेत है 
पके हुए अनाज का 
लपक उठीं लहू-भरी दरातियाँ, कि आग है।
‘य’ शाम है’ पहली पंक्ति का स्वर छायावादी कविता-सा है, मानो कवि पाठक को शाम के धुंधलके में डुबो देना चाहता है फिर आगे की पंक्तियाँ इस नशे को तोड़ती हैं। एक सवाल उठाती हैं, ‘य’ शाम है’, ये कैसी शाम है? ‘कि आग है।’ धुंधलका टूटता ही नहीं जल जाता है। शाम शाम नहीं सबेरे की आहट बन जाती है। यहाँ सौंदर्य की द्वंद्वात्मकता, उसकी कठोरता-सरलता के संबंधों पर ध्यान दें। यहाँ जीवन की निरंतरता का द्वंद्व है। यहाँ आसमान शून्य नहीं है। वह खेत हो गया है, वह भी पके हुए अनाज का। यहाँ एक ठोस निष्कर्षात्मकता से वे शून्य को भर देते हैं। यहाँ कोई विस्फोट नहीं है। यहाँ आग है जो लपक रही है: जिसका विकास हो रहा है, क्योंकि निरंतर इसे श्रमिकों का रक्त मिल रहा है। यह श्रमिक जुलूस का वर्णन है जो लाल झंडा लिए उन पर रोटियाँ टाँगे गुजर रहा है, जिस पर अंगरेजी सरकार गोलियाँ चलाती है रोटियों की माँग पर। यहाँ मजदूरों के भीतर जो भूख है उसे कवि शिद्दत से महसूसता है और उसकी करुणा में डूब कर भूख पके हुए अनाज से भरे आसमान में बदल जाती है, तो उसे पाने को श्रमिकों के भीतर की आग लपक रही है आसमान की ओर दरातियाँ बन-बनकर। दरातियाँ भूखी हैं। उनके मुँह से अब रक्त आ रहा है। अपना रक्त देकर भी यह लपकती आग दूर आसमान में टंके अनाज को पाना चाहती है। यहाँ दुख कितना सघन है। कराहती धरा, कि हाय-मय विषाक्त वायु, धूम्रतिक्त आज। 
मानवता की इस पीड़ा से धरा कराह रही है। जलवायु विषाक्त है, पीड़ामय है। मुक्तिबोध इस पीड़ा के लिए हाय-हाय लिखते हैं। शमशेरियत उसे हाय-मय बना देती है। मुक्तिबोध की आतुरता यहाँ धैर्य में बदलती मालूम होती है। विषाक्त वायु से वातावरण हाय-मय हो रहा है, पर आग है जो जलेगी तो धुआँ छंटेगा। छंटता जाएगा आग बढ़ती आकाश छूती जाएगी।
काल, तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू, तुझमें अपराजित मैं वास करूँ।
अभिव्यक्ति के उद्दाम क्षणों में भी शमशेर का स्वविवेक चूकता नहीं है। बड़े सहज ढंग से वह उनके अहम को नियंत्रित करता है। जब वे काल से होड़ लगाते हैं, तो नहीं भूलते कि यह होड़ अपराजित काल से है। और उनकी अपराजेयता उसी का अंश है, पर यहाँ काल अतीत है। अपराजेय अतीत और शमशेर उसके भविष्योन्मुखी अंश हैं। इसीलिए वे काल से परे हैं। शमशेर के यहाँ सौंदर्य जीवन का वह हिस्सा है, जो सारे नाश और निर्माण के बाद भी बचा रह जाता है। रचे जाने को (केदारनाथ सिंह के शब्दों में कहें तो) वे हमेशा एक सादा पन्ना बचा रखते हैं, जिस पर भविष्य का नक्शा गढ़ा जा सके, जिस गढ़ाव के लिए अपनी कल्पना और विवेक के साथ व्यक्ति जीवित रहे।
मैं-तेरे भी, ओ काल ऊपर, सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल!

जो कुछ भी काल से आगे जाने को, जीवित रहने को संघर्षरत है होड़ लगा रहा है, वही तो सौंदर्य है। उसी सौंदर्य चेतना की संघर्षपूर्ण द्वंद्वाभिव्यक्ति तो शमशेर हैं। यह जीवन संघर्ष बहुत गतिशील है। उसके रुकने का भ्रम हो सकता है। जिस तरह धरती की गति का हमें आभास नहीं होता। उसी तरह हो सकता है आपको सौंदर्य की उस चेतना का आभास ना हो जो जीवन को आगे बढ़ा रही है, पर वह बढ़ रहा है। इसके लिए शमशेर की काल से ऊपर होकर देखने की दृष्टि चाहिए। यह दृष्टि सत्य और असत्य दोनों से गुजर कर, ऊपर जाकर ही पाई जा सकती है। क्रांति से लेकर काल की सृष्टि तक। कम्युनिस्ट समाजों से लेकर विज्ञान और दर्शन के आधुनिक जीवंत वैभवों को जान-समझकर ही उस तक जाया जा सकता है। उस सौंदर्य तक जो अपराजित काल से परे है, पर उसके हृदय में वास करता है। बीजांकुर को देखकर वही सौंदर्यबोध में डूब सकता है, जिसके पास लहलहाते वृक्ष की कल्पना दृष्टि हो और उसे सींचने का धैर्यपूर्ण विवेक भी।

त्रिलोचन - दसों दिशाओं का सौरभ

फूल मेरे जीवन में आ रहे हैं 
सौरभ से दसों दिशाएँ भरी हुई हैं 
मेरा जी विह्नल है
मैं  किससे क्या कहूँ
यह अंतरंग विह्वलता और इसके पश्चात् इससे उपजे मौन और उल्लास के द्वंद्व से उद्वेलित जो ध्वनि की लहरों का ज्वार-भाटा है, वही हिंदी कविता में त्रिलोचन की पहचान है? जटिल और सात रंगों के गतिमय मेल से उपजे सादे रंग की सुरभिमय लय-ताल। अपनी सहज और मंद उपस्थिति से शनैः-शनैः हमारी संवेदना की जटिल बुनावट को रससिक्त करती हुई। और यह यूँ ही नहीं है कि तुलसीदास  से भाषा सीखनेवाले इस महाकवि से इतर आधुनिक बोध की जमीन के कवि केदारनाथ सिंह त्रिलोचन से काफी सीखते हैं और बादलों को पुकारते धान के बच्चों का जी उन्मन हो उठता है। ये धानों के बच्चे नहीं हैं। आधुनिक टेक्नालाजी में पिछड़े आज भी वर्षा ऋतु पर अपनी आशा टिकाए रखनेवाले भारतीय किसानों के बच्चे हैं। उसी तरह यह विह्वलता मात्रा आत्मोद्वेलन नहीं है, इसमें चार नहीं दसों दिशाओं का सौरभ भरा है।
शाखाएं, टहनियाँ हिलाओ, झकझोरो, जिन्हें गिरना हो गिर जाएं जाएं-जाएं
जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिए एक निर्मम आलोड़न की जरूरत होती है। आलोड़न जो अपने सूखे, झड़ने को आतुर अंगों को, कचरे को किनारे पर ला पटकता है। वह निर्मम कोमल उद्घाटन जो बीज का आवरण फाड़ कर सर से मिट्टी को हटाता खुले आकाश में अपना अंकुर फेंकता है। उसकी गहरी पहचान है त्रिलोचन को और अतीत के प्रति अतिरिक्त मोह नहीं है। श्रम और संवेदना की सूंड से इकट्ठा किया मधु कोष वे मुक्त मन से लुटाते हैं। दिनकर के शब्दों में -
ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना है
यह निर्ममता बड़ी सजग है। वे कहते हैं कि जिसे मिट्टी में मिलना हो मिल जाएँ मिट्टी में, पर अतीत और स्मृतियों का जो सौरभ है उसे भी मिट्टी में ना मिला दिया जाए और वे प्रार्थना करते हैं कि उस विरासत को हम संभाल कर आगे ले जाएं, क्योंकि जीवन की शुष्क राहों को यही सिक्त करेगा।
सुरभि हमारी यह हमें बड़ी प्यारी है उसको संभाल कर जहाँ जाना ले जाना।
जब से कविता की दुनिया में विचारों का प्रवेश हुआ है, जीवन को देखने का नजरिया बदला है। अब अपेक्षा की जाती है कि कविता में भाव और विचारों का संतुलन हो। यह नहीं कि भावनाओं की बाढ़ आती चली जाये और उसमें डूबते व्यक्ति की अपने विवेक पर से पकड़ छूट जाए। अब पाठक स्वतंत्र होता है कि भाव की नदी में डूबकर वह मोती ढूंढ़े या तट पर रहकर ही जल पान करता रहे। त्रिलोचन के यहाँ भावों में बह जाने का खतरा नहीं है। एक शब्द ‘नीरव’ त्रिलोचन के यहाँ बराबर आता है। अपनी सहजता के साथ। यह त्रिलोचन की अपनी विशेषता का द्योतक है। उनकी कविताएँ भी कोई शोर-गुल नहीं करतीं। वे गया की उस नदी (फल्गु) की तरह हैं, जिसका जल अगर पीना हो, तो थोड़ा श्रम करना पड़ेगा। तल की रेत हाथों से हटानी होगी, तभी स्वच्छ प्रदूषण मुक्त अंतरधारा का पान कर सकेंगे आप। त्रिलोचन की कविता की एक प्रबल स्थिति उसका धैर्य है। किसी भी स्थिति पर चिढ़कर वे आत्म हिंसक चोट नहीं करते, खुद को संगठित करते वह अपनी सहयोगी अंतरधाराओं को क्रम से जोड़ते जाते हैं। जब-तक विसंगतियों को बहा ले जाने लायक दबाव ना पैदा हो -  
मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्के मारें और ढहा दें उद्यम करते कभी न हारें

हमारे घर जितने ही निकट-निकट होते हैं उतने ही दूर-दूर हमारे मन, वे लिखते हैं -  हृदय को हृदय से मिलाने के लिए हंसी सेतु है ( चित्रा जम्बोरकर )। अतीत और विश्व संस्कृति के सापेक्ष भारतीय संस्कृति की विरासत की शायद सर्वाधिक सही समझ रखने वाले इस कवि की आँखों से आधुनिक समाज की विसंगतियाँ और टूटन कभी ओझल नहीं रहे हैं, और वे बतलाते हैं कि इस जटिल युग में भी इस पारिवारिक टूटन का हल मात्र उन्मुक्त सरलता निश्छलता ही हो सकती है। निराला के बाद अगर किसी कवि ने भाषा, शैली, शिल्प के स्तर पर इतने विविध प्रयोग किए हैं तो वो त्रिलोचन ही हैं और यह विविधता कहीं भी उनकी मूल धारा को कमजोर नहीं करती। जाने कितना पानी है इस कवि की गंगोत्री में कि इतनी उपधाराओं के बाद भी उसकी गहराई और गति में निरंतरता बनी रहती है।

Monday, 23 February 2015

विनय कुमार - घृणा मेरा देश नहीं

मनोचिकित्सक और कव‍ि विनय कुमार की कविताओं से गुजरते हुए यह बात मन में उठती है कि क्या मुक्तिबोध और विष्णु खरे के बाद भी कविता में अपने समय के प्रश्नों के प्रति अबोध और मौलिक प्रतिप्रश्नों के लिए जगह बचती है। क्या सहज, सवालिया ढर्रे में कविताएं संभव हैं आज। क्या कविता से गायब हो चुके जीवन के रंगो-आब को इस कदर लौटाना और इतिहास और वर्तमान के बीच कविता में पुल बनाना संभव है।
विनय कुमार की कविताएं यह सब जिस सहज ढंग से करती हैं वह बौद्धिकों का उपनिवेश बनती जा रही आज की कविता के परिदृश्य में नयी आशा का संचार करता है।
श्रीकांत वर्मा ने इतिहास को लेकर निर्णायक राजनीतिक कविताएं लिखी हैं। पर विनय ने इतिहास का इस तरह इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि‍ वे इसके भीतर गये हैं सहज बोध् के स्तर पर और विचारा है इस तरह कि वह वर्तमान में शामिल दिखने लगता है, हमारे भीतर का हमारे साथ चलता हुआ जीवंत इतिहास- हमारे द्वारा बदला-रचा जाता हुआ।
अपनी कल्पनाशीलता की बदौलत जब कवि इतिहास की गलियों में पहुंचता है तो इतिहास जैसे खुद को पुनरपरिभाषित करता है और तब संभव हो पाता है दो अलग अलग कालखंडों के नायकों  शेरशाह और अकबर का संवाद –
मैं हुमायूं का दुश्मन नहीं
दिल्ली का आशि‍क था
मैं अवाम की बेहतरी का ख्वाब था
तलवारें मुस्तकबिल संवारती हैं
तारीख नहीं
तू हुमायूं का ही नहीं मेरा भी बेटा है
मेरे सोचों का फर्जंद
मेरे ख्वाबे-तामीर का वारिस
दिनकर ने महाभारत के अंत के संदर्भ में कविता में सवाल उठाते हुए लिखा था – कौन रोता है वहां इतिहास के अध्याय पर। विनय कुमार की कविताएं दिनकर की परंपरा को आगे बढाती हुईं इतिहास के अध्यायों पर हो रहे रूदन को जीवन के संवादों में बदलने की कोशि‍श करती हैं। जनमानस में जडें जमाए घावों के लिए मरहम हैं ये कविताएं।
इतिहास से नया संवाद रचने वाले विनय कुमार अपनी कविताओं में वर्तमान से भी बारहा टक्कर लेते चलते हैं। वर्तमान से जिरह, सवाल उनकी मुख्य मुद्रा है। उनकी एक कविता मस्टरवापढते हुए महाश्वेता देवी के उपन्यास मास्टर साहबकी याद आती है –
किसे नहीं जरूरत ऐसे मस्टरवा की
जो आते हुए बुलडोजर के सामने
मुस्कराकर खडा हो जाए
ऐसे समय में जब आजू-बाजू के गंवई पात्रों को कविता में उठाना कवियों को रास नहीं आ रहा विनय ऐसे चरित्रों को उसकी ताकत के साथ सामने रखते हैं। 
विनय कुमार की कविताओं का बडा भाग उनकी विदेश यात्राओं के अनुभवों से जुडा है। इन कविताओं में जिस तरह वे देखे-सुने को अभि‍व्यक्त करते हैं वह अपने समय के सच,स्वप्न और विडंबना को साथ-साथ जाहिर करता है –
पिरामिड एक प्रार्थना है
पुनर्जीवन की
फिर से माटी का पुतला हो सकने की
पुनर्जीवन को इस तरह नश्वरता के रूप में पुनरपरिभाषि‍त करने की यह दृष्टि‍ ही विनय कुमार को एक अलहदा पहचान देती है। परंपरा के जादू को भक से जला देती हैं उनकी कविताएं, फिर बचता है एक कडवा सच, आंखों में आंखें डाले देखता, जिरह करता –
हर पिरामिड एक पहाड है
जिसे पत्थर के इन्सानों ने बनाया
मिटटी के राजा और
राजा की मिटटी की हिफाजत के लिए
विनय की वाया लंदनकविता जिस तरह सफाई और सच्चाईको विलायती मूल्य के रूप में स्थापित करती है वह एक आईना है तथाकथि‍त भारतीय सत्यवादी हरिश्चंदों के लिए। यूं कव‍ि जिस तरह अपनी इतिहास दृष्टि‍ से उस सत्य के आधार पर सवाल खडे करता है, कि ब्रिटेन का सतयुग गुलाम देशों के शोषण की किस कीमत पर कायम हुआ है, वह एक ऐतिहासिक विडंबना को जाहिर करता है।
इसी तरह अमेरिका से लौटने पर वे जिस तरह उसे अमीर कापाते हैं वह उनके आत्मालोची दृष्टि‍कोण को पुष्ट करता है। पूंजी प्रसूत इस सभ्यता में वे पाते हैं कि अमेरिका, योरप के खुश दिखते बहुत से लोगों को अपनी खुशी की वजहही पता नहीं होती। विनय की यात्रा-वृतांती कविताएं मात्र नजारा नहीं करतीं, वे पाठकों को एक नजरिया भी देती चलती हैं। इन यात्रा-वृतांती कविताओं में वे एक सभ्यता-विमर्श भी खडा करने की कोशिश करते हैं। 
सत्ता तंत्र की कमजोरियों और विद्रूपताओं को उजागर करते चलना विनय की कविताओं का सहज स्वभाव है। सत्ता तंत्र से बारहा मुठभेड विनय की गजलों की भी ताकत रही है, इन कविताओं में उसका ही विस्तार मिलता है। सत्ता तंत्र के बरक्स आम जन की पीडा और सुख-दुख कवि को ज्यादा संवेदित करता है –कि सबका जयपुर गुलाबी नहीं
सामंती सत्ता प्रतीक आज दयनीय हो चुके हैं। ऐसे समय में ज‍ब शि‍खर भारतीय राजनेता खुद को सामंती प्रतीक भर रह गया शेर और जनता को भेंड समझते हैं, कवि लिखता है-
एक दिन उसे लडते और हारते देखा
उस हीरो से जो आज तक
अपने लालच से नहीं लड पाया
आज का सच यही है कि मांस के टुकडे और छडी के बीच फंसा शेरबंदर में बदल चुका है।
समय तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक मूल्य बदल रहे हैं। कवि इस बदलाव पर नजर रखता है ओर मौका मिलते ही उनसे मुठभेड करता है और उनकी सही जगह बताता चलता है 
युद्ध हो कि पूजा
अंत में निस्प्राणता ही बचती है
व्यंग्य और तंज कवि के लहजे का एक अंग है। अंक-डंककविता में वह इसके सहारे प्रकाशकों की उलटबांसियों को सीधा करता है, कि किस तरह किताबें नहीं बिकने का रोना रोते सारे प्रकाशक लेखकों के बल पर अपनी चांदी काटते जरा नहीं शर्माते –
लिखे जाने तक अक्षर ही अक्षर
छपते-छपते सिर्फ अंक ...
और रायल्टी
कुछ छोटे अंकों की बडी प्रतीक्षा का ही नाम
विनय की कविताओं के रंग नये सिरे से हिंदी कविता के प्रति आशान्वि‍त करते हैं कि कवि का स्पष्ट विश्वास है कि मेरा देश प्रेमहै कि घृणा-देश मेरा नहीं’। 

Saturday, 21 February 2015

पंकज चतुर्वेदी - प्रेम की असंभाव्यता

नामवर सिंह अपने भाषणों में जिस पश्चिमी बहुलतावाद के आक्रमण की बात किया करते हैं, उसे पंकज चतुर्वेदी अच्छी तरह पहचानते हैं। यह बहुलतावाद हमारी अनेकता में एकता की विरासत को बुरी तरह नष्ट कर रहा है, और पंकज को भय है कि वे किसी भी समय इस बहुलतावादी बाज़ार की वीभत्सता के शिकार हो सकते हैं: पर पंकज जानते हैं कि आज़ाद मनोवृत्ति तब ही जि़ंदा रहेगी, जब उसे आज़ाद वातावरण मिलेगा और कवि उसे जि़ंदा रखने पर अड़ा है। इसीलिए वह बौखलाता हुआ अपनी वाणी के सच को खोजता फिरता है। बहुलतावाद की ओट में हो रहे हमले को खूब पहचानते हैं पंकज, वे लिखते हैं-
लेकिन जब तुम घर से बाहर निकलोगे... तेज ट्रैफिक की शक्ल में कुछ जानवर तुम्हें विचलित कर देंगे... कि जब तुम कुछ कहना चाहोगे हर शब्द को सरकारी गोदामों का अन्न खाकर पुष्ट हुए चूहों ने कतर डाला होगा।
बहुलतावाद का यह हमला बहुआयामी है। यह हमारी वृत्ति को निकम्मा बना रहा है, यह बहुरूपिए की बहुलता है, जो हमें अंधा बनाती है, गूंगा बनाती है, यहाँ कवि साफ देखता है कि यह हमला सभ्यता और संस्कृति पर है और इसमें केवल कवि नहीं उसकी सोच को धार देने वाले उसकी चेतना के गाँव भी हारते हैं: पर यह सिर्फ मैं नहीं जो हारता हूँ... हर लड़ाई में मेरे साथ मेरी चेतना के गाँव हारते हैं। यहाँ कवि महसूस करता है कि इस हार से एक असहायता पैदा होती है जो हमारे सपनों पर राख बिछाती चलती है। और कवि का विश्वास हर जगह से डिगता जाता है - ‘कभी दुखें ही नहीं/ इतने पुख़्ता नहीं है विश्वास भी।’ या ‘यह सुबह/ किसी स्वप्न की हत्या सरीखी है/ फिर यह कैसे सौंदर्य की शुरुआत है/ मेरे ईश्वर!’
आक्सफोर्ड, कैंब्रिज की कानवेंटी औपनिवेशिक महोत्सवी समझ पर अपनी राय ज़ाहिर करते नामवर कहते हैं - ‘पश्चिम का भी जो सबसे सतही और सबसे उच्छिष्ट कचरा है, यह उसकी भी तीसरे दर्जे की नकल है, यह जड़-मूल से उखड़े कटे लोगों की सांस्कृतिक समझ का दौर है, ये लोग सौंदर्य-सौंदर्य, कला-कला पर इतना बल देकर मनुष्य विरोधी राजनीति का सौंदर्यीकरण कर रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे इनके समारोहों, उत्सवों और आयोजनों में इस संस्थान का असली चेहरा उजागर होता जा रहा है।’ पंकज की कविताएँ इस उत्सवी दृष्टि की मार्मिक आलोचनाएँ हैं: इनमें जीवन की चेतना को विकसित करने वाले ऊर्जा से भरे क्षणों की निरंतरता पर प्रायोजित उत्सवता के हमलों को समझने और उनसे जूझने की कोशिश की है कवि ने। ‘यह भी होगा’ कविता में वह लिखता है -  वे भूल जाएंगे जीवन के हर सादे क्षण में साथ देने की शपथ वे हमें उत्सव में बुलाएँगे... किसी नरक के उदास पक्षियों की तरह हम उनके स्वर्ग में शरीक होंगे।
सदी के अंतिम वर्ष में फैल रहे बाज़ार के ग्लोबल अंधेरे में पंकज चतुर्वेदी का कवि खुद को उदास पक्षी की तरह पाता है। यह उदासी और रूदन स्थायी भाव है। रूदन की लय को तोड़ना कवि को कठिन लगता है। पर रोते-रोते ही अचानक किसी कोने से हंसी फूट पड़ती है तो कवि को समझ में नहीं आता कि यह क्या है? और वह उसे रहस्य करार देता है। वह लिखता है -  किसी भी विलाप की एक कठिन लयबद्धता को तोड़ना सबसे मुश्किल काम है ...रोते जब तुम सहसा मुस्करा पड़ते हो... वह मुस्कराहट तुम्हारी आत्मा का सबसे बड़ा रहस्य है क्योंकि वहीं से जड़ हो गए आदमी के हर नए प्रस्थान की शुरुआत है। हालांकि यहाँ अगली ही पंक्ति में कुछ रहस्य नहीं रह जाता। जैसे उस रहस्य में कोई चेहरा खिल गया हो। दरअसल यह कवि की स्मृति है जो उसकी रूदनशीलता की लय को तोड़ती है।

पंकज की प्रेम कविताएँ इस कठिन समय में प्रेम की बढ़ती असंभाव्यता की कविताएँ हैं: इनमें प्रेम की पारंपरिक उदात्तता नहीं है और मुक्ति का संघर्ष भी नहीं है। ऐसे में कवि का प्रेम विवशता में तब्दील होता जाता है। उसकी हर गली प्रेमिका के घर तक जाकर समाप्त हो जाती है। और वह इस आशंका से कांप जाता है कि कल प्रेमिका के दरवाजे पर दस्तक देना भी संभव नहीं होगा। इसी दीवानगी और मोह में कवि दरवाज़ों को ही प्रतीक मान अपना प्रेम उसके बहाने प्रकट करता है। वह लिखता है -  हम दरवाज़े थे/ देखने और देखकर/ रह जाने को ही/ गढ़े गए।’ यहाँ दरवाज़ा कवि खुद है, प्रेम की असंभाव्यता ने उसे जड़ कर दरवाज़े में तब्दील कर डाला है। एक अन्य कविता में वह लिखता है - ‘...यदि सुबह आई / तो मैं अपने दरवाज़े बंद कर लूंगा / और कहूँगा / कि अब बहुत देर हो चुकी है’। इसी कविता के अगले पैरा में कवि खुद दरवाज़ा बन जाता है और दरवाज़ा बने देखता रहता है। वह सुखी होता है कि उसके दरवाज़े उसकी प्रेमिका सुबह आई है -  देर से मिले न्याय की तरह सुबह आएगी / मेरे दरवाज़े रोकर लिपट जाएंगे उससे /दरवाज़े के पीछे मैं / खड़ा रहूँगा कहीं उसे देखता। यहाँ प्रेम की इस असंभाव्यता से पैदा विवशता से जब कवि मुक्त होता है असंभाव्यता के कारकों पर तीखी टिप्पणी करता है - जीने का जोखिम न उठाना सुख है जीने का मेरे आस-पास, और यह कहीं न कहीं से खुद पर भी एक टिप्पणी है। क्योंकि कवि आगे लिखता है -  उन सबसे मुक्ति के लिए उसकी आंखों में एक झील फड़फड़ाती है पर वह बाढ़ बन जाने से क्यों घबराती है। यहाँ कवि की विवशता किसी के पूरी तरह साथ ना आ पाने की भी विवशता है। ऊपर कवि का सवाल तीखा है जो उसकी प्रेमपगी भाषा को दरकाता उसे कुमार विकल और सर्वेश्वर के निकट ले जाता है। कवि अपने ही इस विस्फोट को पहचाने और उसे ऊपर आने दे शायद तब उसका खुद का खड़ा किया रहस्यावरण टूटे और उसके दरवाज़ों जैसे जड़ प्रतीक खुलें-टूटें या बिखर जाएं। क्योंकि आगे कवि प्रेमिका की पुकार पर अनिर्णय की स्थिति में है कि - मैं जाऊँ या न जाऊँ/ यह पुकार है या कुछ और।’ यहाँ असमंजस साफ है कवि का। कि बाढ़ बन जाने से उसकी प्रेमिका ही नहीं घबराती है बल्कि बाढ़ बन जाने के बाद की स्थिति से कवि भी घबराता है और उसकी पुकार पर किनारा करने की कोशिश करता है। यहाँ झील का फड़फड़ाना और उसमें बाढ़ की आशा करना जैसी भाषायी व तथ्यगत भूलों पर कवि को ध्यान देना चाहिए। 
पंकज की इन कविताओं की मूल पूंजी भावुकता और साफ बयानी है। पर इतने से काम चलेगा क्या! मुक्तिबोध लिखते हैं - भावनाएँ बच्चा हैं अगर इन्हें आदमी नहीं बना सकते तो मार डालो।’ पंकज के ये बच्चे अच्छे हैं जैसे कि सभी बच्चे होते हैं। ये बच्चे सच्चे भी हैं देखना है आगे वे किस कदर और किस हद तक इन्हें आदमी बना पाते हैं।