कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Friday, 20 March 2015

लाल सिंह दिल - थिगलियों से निखरता हुस्‍न

अंतिम आदमी की ताकत को भारतीय कविता में केदारनाथ अग्रवाल और विजेंद्र के यहां अभिव्यक्त होते देखा जा सकता है। पर उसके जैसे गहरे और बहुआयामी रंग पंजाबी कवि लाल सिंह दिल की कविताओं में दिखते हैं उसकी मिसाल और नहीं मिलती। अंतिम आदमी के साथ अंतिम औरत की पीडा और ताकत भी लाल के यहां जगह पाती दिखती है
'तवे की ओट में छिप कर चूल्हे की आग की तरह ...रोती
और 
'थिगलियों से हुस् निखारतीअंतिम औरत।
दविड और आदिवासी समाज के पक्ष को सामने रखती लाल की कविता सहज ही आर्यों,मुगलों,अंग्रेजों और मैकाले की भारतीय संतानों की सनातनी सत्ताकामी क्रूरता को उजागर करती है। अंतिम आदमी की आजादी की चाहत को लाल से बेहतर कोई अभिव्यक्त नहीं कर पाता। इसलिए भी कि लाल खुद उसी अंतिम दलित जमात से हैं। यूं तो लाल की परंपरा वाल्मीकि और व्यास जैसे दलित समाज से आए आदि रचनाकारों से जुडती है पर बीच के लंबे दौर में इस अंतिम आदमी की हैसियत को भारतीय अपसंस्कृति लगातार ग्रसती रही है और लाल भी उसका शिकार हुए हैं। अपने अनुवादकीय 'दिल और हममें सत्यपाल सहगल दिल के बारे में सही लिखते हैं - 'उसका जीवन-अंत जिस मुफलिसी और उपेक्षा से भरा थावह एक मायने में साहित्यिक समाज में सुपरिचित चीज है और कायदे से किसी शहादत की श्रेणी में नहीं रखी जाती हैजैसे एके 47 की गोलियों खाकर पाश की जिंदगी के अंत की शहादत।'
लाल की खूबी यह है कि दलित के नाम पर किसी तरह का कोई 'रहमउन्हें 'मंजूरनहीं। फैज के बाद 'सारी दुनिया मांगेंगेवाली आकांक्षा लाल की कविता में ही फिर पनाह पाती है। लाल की कविता उन शब्दों की वकालत करती है 'जिन्हें ढूंढती हुई तलवारेंपागल हो जाती हैं। उनका विश्वास मिटटी और जनता पर है जो गेहूं से लेकर बारूद तक और तूफान से लेकर इंकलाब तक को अपने भीतर समेटे रहती है। लाल देखते हैं कि उनकी परंपरा के लडाका शब्द युगों से चले  रहे हैं और चुनौती देते हैं कि संभव हो तो जो कहे जा चुके हैं और हमेशा मुकाबिल खडे चले  रहे हैं उन शब्दों की जुबान काट कर दिखाए कोई।
एक साथ आदिम युग से लेकर आज के वैज्ञानिक युग और तथाकथित लोकतंत्र तक के तमाम छोरों को एक साथ जोडती है लाल की कविता। इसीलिए वे अगर आर्यों का मुकाबला करने वाले 'द्रविड भीलों'को 'सूरज से भी उजलाबताते हैं वहीं अंधेरों में दम ना तोडने वाले 'रेडियम का गीतभी गाते हैं।
उूर्जा के पारंपरिक प्रतीकों के मुकाबले लाल नये वैज्ञानिक प्रतीकों को खडा करते चलते हैं। इसीलिए उनकी कविता में सूर्य के मुकाबले अंधेरों में घिरकर भी लडताचमकता रेडियम तरजीह पाता है और 'अंधेरा राकेट की चाल चलता है'
अंग्रेजी तौर-तरीकों पर चले  रहे कानूनों को लाल ऐसी चिता के समान पाते हैं जिनमें सरमायेदार तो एक भी नहीं जलता पर जटटों,सैणियों और झीवरों के लिए यह चिता कभी ठंडी भी नहीं पडती।
परंपरा और संस्कृति को लेकर झूठा दंभ रखने वालों पर लाल जैसी चोटें करते हैं -
'खजानों के सांप
तेरे गीत गाते हैं
सोने की चिडिया कहते हैं'
उसकी दूसरी मिसाल पंजाबी के ही दूसरे कवि पाश के यहां मिलती हैजो जनता के हितों की दलाली करने वालों के भारत से अपना नाम काट देने की बात करते हैं।
देखें तो दलित विमर्श और स्त्री विमर्श अपने सर्वाधिक सशक्त रूप में लाल की कविता में ही आकार पाता है। फिर यह अपने लिए किसी तरह की रहम या छूट मांगता विमर्श भी नहीं हैयह बाकी तमाम विमर्शों को चुनौती देता विमर्श हैजो केवल पीडा की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह संवेदनाभाषा के स्तरों और पंरपरा को चुनौती समेत तमाम रचनात्मक कसौटियों के लिए चुनौती बनता विमर्श है-
'कुत्ते पुकारते हैं
मेरा घरमेरा घर
जगीरदार
मेरा गांवमेरी सल्तनत
लीडर
मेरा देशमेरा देश
... मैं क्या कहूं
... कुछ भी नहीं मेरा'
लाल के यहां एक कविता है 'मां आयशा'  शीर्षक से। जिसमें मर्यादापुरूषोत्तम राम की तुलना पैगम्बर मुहम्मद से की गयी है और बताया गया है कि जहां स्त्री को जलील करने वाले आरोपों के चलते राम ने सीता को घर से और जीवन से निकाल दिया था वहीं ऐसे ही आरोपों के बावजूद पैगम्बर  ने किसी की एक  सुनी और अंत तक आयशा का साथ दिया। यहां तक कि आयशा की गोद में ही दम तोडा। देखा जाए तो ऐसी मार्मिक चुनौतीपूर्ण तुलना करने वाला 'दिललाल सिंह के पास ही है और यही उनकी पहचान है।


Saturday, 7 March 2015

कुमार विकल - अच्छार्इ की जिजीविषा

मुझे लड़ना है
जनतंत्रा में उग रहे वनतंत्र के खिलाफ
जिसमें एक गैंडानुमा आदमी दनदनाता है

कुमार विकल धूमिल की परंपरा के कवि हैं जो शब्दों को गोलकर नहीं खोलकर कविता में रखते हैं। अपने अंतिम दिनों में बीमारी और निराशा के बाद भी कुमार विकल ने अपनी भाषा में उस खुलेपन की निरंतरता को बनाए रखा। और अंत-अंत तक अपनी ऊर्जा को आगत भविष्य के संघर्षोन्मुख  विकास के लिए समर्पित करते रहे। निरूपमा दत मैं बहुत उदास हूं की कविता घर वापसी में वे लिखते हैं
मैं अपने घर लौटूंगा
और अपनी जि़ंदगी की बची हुर्इ ऊन से
एक नन्हा पुलओवर बनाऊंगा
जो समय के साथएक ऐसा पुल ओवर बन जाएगा
जिसे दुनिया का हर बच्चा पहन पाएगा।

आज उस पुलओवर का अहसास हर उस व्यकित को है जो पिछले दशकों में आए उनके संग्रहों से गुजरा है। एक छोटी-सी लड़ाई जो उन्होंने शुरू की थी वह अंत तक जारी रही। उससे वे इस हद तक प्रतिबद्ध रहे कि आंसुओं को भी हथियार में बदल देने की बेचैनी से भरी पंक्ति‍यां लिखते रहे। दुख कविता में वे लिखते
हैं - दुख लड़ने के लिए एक बहुत बड़ा हथियार है जो पहले पानी की तरह आदमी की आंखों में आता है। यह नहीं है कि दुख को हथियार उन्होंने किसी जिद में बनाया है। आरंभ के दिनों में उनका दुख भी आम दुखियों का दुख था। पहले संग्रह की कविता दुखी दिनों में वे भी लिखते हैं कि
दुखी दिनों में आदमी दिन की रोशनी में रोने के लिए अंधेरा ढूंढ़ता है।
पर लगता है जीवन के अंतिम दिनों तक उनके जीवन में उनके निष्कर्षों में आंसू भी हथियार में परिणत हो गए। और इस भगेडू समय में जब लोग आधुनिकता के बवंडर में उतराने के लिए बेचैन हो रहे हैं कवि की यह दृढ़ता नर्इ पीढ़ी को एक ढांढ़स की तरह लगती है। क्योंकि यहां आंसुओं का हथियार बनना किसी भावुक आवेग का प्रतिरोधी स्फुटन नहीं है। वह परिपक्वता के आवरण में सुरक्षित बीज है जो इन बवंडरों में टिकने की प्रेरणा देता है। कवि उन भले लोगों में नहीं है जो अपनी भलार्इ का रोना गाते हैं और सुकवि का दर्जा पाते हैं। वह साफ लिखता है कि
अच्छे लोग तो चंदन के पेड़ होते हैं जो विषधरों की जकडन में जवान होते हैं अच्छे लोग नन्हे खरगोश होते हैं और एक लोमड़ी दुनिया में मस्ती से उछलते, कूदते रहते हैं।
इस तरह वे अच्छार्इ की जिजीविषा को गाते हैं। और दुखों को हथियार की तरह उठाते हैं। सबसे अच्छी बात है कि वे दुखी दिनों में कविता करने की अय्याशी से बचते हैं और इसकी बनिस्पत फूटकर रोना बेहतर समझते हैं। और फूटकर होने का यह खुलापन और अच्छार्इ की जिजीविषा ही उनकी पहचान है।

Friday, 6 March 2015

वर्तिका नन्‍दा - जीवनानुभवों को बल देते विचार

उदासी पर चढा लेती हैं / अक्ल की चादर / गढा लेती हैं गहने / तुम्हारे दिये मुखौटे / लगा लेती हैं बेहिचक // क्या  तुम पहचान पाते हो / एक स्त्री  को / जब वह निकलती है / तुम्हारें सपनों का संस्कार पहने – वर्तिका की कविताओं से गुजरते हुए

वर्तिका नन्‍दा की कविताओं में एक स्‍वतंत्रचेता स्‍त्री का विविधता से भरा संसार उभरता है, जिसमें वह अपनी पीडा, कचोट, आशा और जीवट के नये रूपों के साथ सामने आती है। अनामिका के बाद वर्तिका ही हैं जिनके यहां विषय का ऐसा विस्‍तार मिलता है। अनामिका की तरह उनके विचार उनके जीवनानुभवों को बल देते कविता में आते हैं। वे साफ साफ कहती हैं -
ये कविताएं नहीं आत्‍मकथा है इसमें मेरी ही आत्‍मा है...
उम्‍मीद का चेहरा वर्तिका के यहां कुछ ज्‍यादा साफ और संभावनाशील है। उम्‍मीदों की चिडिया इन कविताओं में बारहा सर उठाती दिखती है, और  स्‍त्री जीवन की टूटन पर आशा का स्‍वर भारी पडता है –कई बार टूटने के बाद जब जुडता है कोई तो कोई अनूठा अध्‍याय लिख जाता है।
टूटन और प्रतिरोध वर्तिका की कविताओं के मुख्‍य स्‍वर हैं। वर्तिका पाती हैं कि पौरूष की कायराना मार जब स्‍त्री पर पडती है तो दूर तक कोई साथ नहीं देता। आरंभ में माता‍-पिता साथ देते हैं कभी बहनें साथ देती हैं पर राखी की कसमें खाने वाले भाई साथ नहीं देते। तंज करती वर्तिका कहती हैं -राखी की कसम/महिला अपराध शाखा तक साथ देने की बात कहां कहती है ...। अकेला पडकर भी पीडित स्त्रियां आती हैं थाने, कि – थके मन की आस का पंछी तो बैठ सकता है न किसी भी डाल पर। पीडा में भी वर्तिका का कवि कुपित नहीं होता, उसके स्‍वर में आत्‍मीयता बनी रहती है, हदों से गुजरकर दर्द आखिरकार दवा बन जाता है, ऐसे में भी जब आंसू और पीडा की नदी उसे डुबो देने को होती हैं, हिम्‍मत नहीं हारती वह, क्‍योंकि – मारे जाने की सदियों की धमकियों के बीच/मन ठहरा था आज।
मार तमाम प्रतिबंधों में भी अपना जीवट बनाए रखती है स्‍त्री। प्रार्थना के स्‍वर के भीतर वह अपनी जिजीविषा बचा लेती है। स्‍त्री की मनोव्‍यथा को प्रकट करने वाली कविताओं में स्त्री की निजता को बचाने की युक्ति वे रचती हैं। नेलपालिश और आह ओढनी जैसी कविताओं में स्‍त्री की निजता की अभिव्‍यक्ति को देखा जा सकता है। मंगलसूत्र कविता में वे स्‍त्री मन की कचोट को अभिव्‍यक्‍त करती, तंज कसती कहती हैं कि एक ओर जहां पत्‍नी को पति के बास और उसके कुत्‍ते तक का नाम याद रहता है पति को कुछ भी याद रखने की मजबूरी नहीं होती आखिर परमेश्‍वर की याददाश्‍त सही हो यह जरूरी तो नहीं।
शकरपारे का जिक्र निराला की कविता में है। पर क्‍या आप नमकपारे की बाबत कुछ जानते हैं, इस बारे में स्त्रियां ही बता सकती हैं पुरूषों की तो याददाश्‍त यूं ही कमजोर होती है। यह आंसुओं को लेकर एक तीखी कविता है - देखो तो अभी जो बूंदें गिरीं ... उन से फिर बिखर तो नहीं गई कहीं मेरी ही क‍ब्र।
पारंपरिक प्रेम कविताएं खूब लिखी जा रही हिंदी में, श्रृंगार रस बढता जा रहा है पर प्रेम का जज्‍बा गायब हो रहा है। वर्तिका के यहां वह जज्‍बा मौजूद है अभी -कुछ सपनों का भी कभी अन्‍त नहीं होता आन्‍‍तरिक सुख के खिले फूलदान में मुरझाती नहीं वहां कोई किरण।
अंदर-बाहर, निजी-पराया आदि का द्वंद्व और जीवन की विडंबनाएं भी आकार पाती हैं इन कविताओं में। अंतस और अंतरमन के कई आत्‍मीय चित्र हैं यहां – दिल के अंदर चलने वाली यात्रा से बडी/दूसरी कोई यात्रा नहीं। या अन्‍दर इतनी मछलियां, इतनी चिडिया, इतने घोंसले/बताओ तुमसे बात कब करती/और कयों...। कवयित्री जानती है कि एक ही अंतस चाहे जिंदगी बिताने को काफी हो पर बाहर झांकने के लिए कम है एक पूरी जिंदगानी भी।
एकला चलो को लेकर हम रवीन्‍द्रनाथ टैगोर को बराबर याद करते हैं पर वर्तिका के यहां एकला चलो अपने मानी खो देता है, एक स्‍त्री के लिए शब्‍द वही अर्थ नहीं रखते जो पारंपरिक ढंग से एक पुरूष के लिए रखते हैं। कहती हैं औरतें पुस्‍तक में एक जगह अनामिका लिखती हैं – भाषा के महीन लकरपेंच, टूटे-फूटे पुश्‍तैनी गहनों की तरह औरतों के कोष में सुरक्षित रहते हैं और वक्‍त पडने पर वे उन्‍हें अस्‍त्र भी बना लेती हैं वर्तिका भी कई कविताओं में ऐसा कर पाती हैं –
एकला कोई नहीं चलता
साथ चलते हैं अपने हिस्‍से के पत्‍थर।
वर्तिका पत्रकार जीवन की विडंबनाओं को भी बखूबी उकेरती हैं। टीआरपी की दौड इस चौथे खंबे को कैसे कसाई के ठीहे में बदल डालती है इसे अच्‍छी तरह जानती हैं वर्तिका – हम पेशे के पहले चरण में ही/उतर आए हैं कसाईगिरी पर। इस कसाईगिरी पर वे अंगुली रख सकीं क्‍यों कि उनका फलसफा रोटी का फलसफा है और दिल का फलसफा भी। जय हो और आहा जिन्‍दगी के फलसफे से वे साफ तौर पर इनकार करती हैं क्‍योंकि यह फलसफा पहले से ही समृद्ध लोगों के लिए और अंग्रेजी स्‍कूल के प्‍लास्टिकनुमा साहबजादों के लिए ही समृद्धि लाता है, आम जन के लिए नहीं।  

वर्तिका के पास बाल सुलभ चेष्‍टाएं करने को आतुर एक मन भी है जो अभी भी न जाने क्‍या क्‍या... करने को करता है। इसलिए बडी हो जाने के बाद भी बालपन को छोडने का मन ही नहीं करता। यही ताकत है उनकी, जो तमाम संकटों में भी उनमें एक खिलंदडापन बचाए रखता है, मनमानी करने की एक सच्‍ची जिद को जिंदा रखता है, यह जिद ही पहचान है कविता की जो अपनी पीर को कबीर तक ले जाना चाहती है, देखना है यह जिद आगे और क्‍या क्‍या रचती है। 

कुमार अंबुज - कुछ मूलभूत प्रश्न

'मेरे पास थोडे से पत्‍थर थे
और कुछ सूखे बांस
जिनके सहारे मुझे
अपनी सभ्‍यता का रास्‍ता तय करना था ' 
अंबुज की कविताओं में जीवन से संबद्ध कुछ मूलभूत प्रश्नों पर विचार किया गया है। वहाँ अस्तित्व के सवालों से जूझती एक टीस है, जो सच्ची है। यह कविताएं परंपरागत रूढ़ियों पर एक चोट हैं। यहाँ कवि शाप की तरह पीछा करते वरदानों से पीछा छुड़ाना चाहता है। अंबुज के यहाँ मनुष्य और उसके अतीत-भविष्य से संबंधों का अंतरज्ञान है, पर कहीं परंपरा का मोह भी है, जो कुछ भ्रम में डाल देता है। अंबुज के यहाँ भय है, पर वह अरूण कमल के भय की तरह निरूपाय नहीं करता, क्यों कि वहां उसे भेदने की इच्छा भी है।
संबंधों की अंतरंगता व जीवन की लय को उजाड़ते आधुनिकता के पाखंड को अपनी कविताओं में कुमार अंबुज ने अपनी सजगता व जिजीविषा के बल पर अभिव्यक्त किया है। कृत्रिम और अकृत्रिम दोनों तरह के उजाड़ के वैभव को ये कविताएँ दर्शाती हैं। जीवन में बहुत सारी जरूरी चीजों की उपेक्षा का जो दौर चल रहा है उसकी क्रूरता पर चेतावनी हैं उनकी कविताएं। अपनी चेतावनी को वे अपने डर की तरह अभिव्यक्त करते हुए ‘क्रूरता’ के बारे में बतलाते हैं कि, ‘‘यही ज्यादा संभव है कि वह आए।’’ पर क्रूरता उनका स्थायी भाव नहीं है। इस अरोपित ‘क्रूरता’ के विरुद्ध कौन-कौन सी चीजें कैसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं। और वे चीजें और उनकी स्मृति भी कैसे देती है नया जीवन यही उनका ध्येय है। वे लिखते हैं -
'
इस जीवन में जीवन की ओर वापस लौटने के
इतने दृश्य हैं चमकदार कि उनकी स्मृति भी देती है एक नया जीवन।'
जिजीविषा के सौंदर्य और उसकी स्मृति पर आधारित हैं कविताएं अंबुज के पास, कवि देखता है कि जीवन में जहाँ उजाड़ ज्यादा है वहीं धूप भी गिरती है बराबर और उदासी को उद्भासित करती है-
धूप तेज थी
और उजड़ गई चीजों पर गिर रही थी
चीजों की उदासी चमक रही थी धूप में

उजाड़ का ऐसा सौंदर्यबोध हिंदी कविता में और शायद ही कहीं मिले। यह उजाड़ ही है जिसमें स्थित है ‘चाय की गुमटी’। हालांकि गुमटी आधुनिकता की मुख्य सड़क के एक किनारे पर है पर बहुत बड़े जन-समुदाय के रास्ते के बीच में पड़ती है। विद्यार्थी, रिक्शावाले, अध्यापक, दफ्तर के बाबुओं और मजदूरों के लिए वहाँ पर्याप्त जगह है-
वहाँ पचहत्तर पैसे की चाय है
चीजों को दुर्लभ होने से बचाती हुई
विद्वानों को पता नहीं होगा
लेकिन वह गुमटी वाला पिछले कई सालों से
वित्तमंत्री की खिल्ली उड़ा रहा था।
अंबुज की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि उन्‍होंने केदारनाथ सिंह और आलोक धन्वा की सौंदर्य दृष्टि की विरासत को बखूबी संभाला है और विकसित किया है। धर्म के नाम पर अंधविश्वासों का जो नया बीजारोपण हो रहा है उसे भी कई स्तरों पर कई ढंग से अपदस्त करने की कोशिश की है कवि ने। ‘साध्वियाँ’ कविता में वह लिखता है-
'
उनकी पवित्रता में मातृत्व शामिल नहीं है
संसार के सबसे सुरीले राग में नहीं गूंजेगी उनके हिस्से की पीड़ा'
अंबुज को पढ़ते हुए कभी रघुवीर सहाय का लहजा याद आता है कभी केदारनाथ सिंह का यूँ कुमार अंबुज की अपनी शैली विकसित हो चुकी है। उनकी कई कविताओं में सौंदर्य और समझदारी का दबाव खुद अंबुज की मनोवैज्ञानिक शैली की सीमाओं को तोड़ता है।

Tuesday, 3 March 2015

विद्यानंद सहाय - लोकभाषा की ताकत

पोंछे हुए ब्लैक बोर्ड से झाँकने लगते हैं फिर से अक्षर बीजगणित के प्रश्न कुछ भी हल नहीं होता कभी मोतियाबिन्द वाली आँखों को भीतर-भीतर लगता है दीखने उल्टा लटका स्मृति बैताल नहीं थका पाता है जिसे कोई विक्रमादित्य।
ऐतिहासिक जीवन संदर्भों को पुनर्परिभाषित करती ये कविता पंक्तियाँ बतलाती हैं कि कवि का विश्वास जीवन संघर्ष की निरंतरता में है। जहाँ कुछ भी आखिरी तौर पर स्थित और तय नहीं होता। जहाँ नए-नए सवालों के ‘बैताल’ चक्रवर्तियों को परेशान करते रहते हैं। ‘न्याय की रूढ़ होती परिभाषाओं’ पर आरूढ़ विक्रमादित्य को चाहे वे सवाल बिना सुर व ताल के लगते हैं। पर आम जन का विश्वास हमेशा उसके बेताली सवालों में अभिव्यक्त होता रहता है। विद्यानंद सहाय की जनपक्षधरता उनकी कविताओं में मुकम्मिल ढंग से सामने आती दिखती है। शैली के लिहाज से देखें तो सहाय की कविता में हम धूमिल और केदारनाथ सिंह को एकाकार होते देख सकते हैं। इस सबके बाद भी सहाय के पास उनके अपने पर्याप्त जीवनानुभव हैं, जो लोक भाषा और लोक संगीत की लय के साथ बराबर अभिव्यक्त होते दिखते हैं। एक व्यापक-बहुरंगी दुनिया है उनके पास, जो आज की हिंदी कविता के लिए दुर्लभ होती जा रही है। जिसकी भरपाई लोग इतिहास के उदाहरणों और मनोविज्ञानी विश्लेषण से कर रहे हैं। इस लिहाज से सहाय की कविता धूमिल व आलोक धन्वा के बाद सर्वाधिक सक्रिय दिखती है।
फुटपाथों से हटाई जा रही थीं सत्तू और भात की दुकानें उजाड़ी जा रही थीं झोपडि़याँ उड़ रहे थे तिनके धुआँ धूल फटे हुए कलेंडर फिल्मी सितारों के बदरंग कागज के फूल शुभ-लाभ के साथ भागी जा रही थी गुदड़ी में लिपटकर सोई हुई हवा।
सत्ता के संघर्ष की बहुत साफ समझ है सहाय के पास और परंपरा व रूढि़ के प्रति एक सतर्क दृष्टिकोण भी। तभी वे फुटपाथों से शुभ-लाभ के साथ भागी जा रही हवा को पहचान पाते हैं और सत्ता को चेतावनी दे पाते हैं कि वह बसाने और उजाड़ने का अपना खेल बंद करे। जोकर-1 और जोकर-2 सहाय की गहरे राजनीतिक व्यंग्यार्थों वाली कविताएँ हैं। जिसमें बिहार के वर्तमान सत्ताधीशों की पोल-पट्टी उतारी गई है। जोकर पर पहले मदन कश्यप ने एक कविता लिखी थी। फिर निलय उपाध्याय ने। थोड़ा-थोड़ा अंतर के साथ तीनों कवियों की जोकर शीर्षक कविताएँ वर्तमान सत्ताधीशों को ही इंगित कर लिखी गई हैं। इन कविताओं में निलय की कविता सबसे छोटी पर तीखी है। जोकर की निर्लज्जता, क्रूरता को वे सबसे ज्यादा अभिव्यक्त कर पाते हैं और कविता को एक खास सत्ताधीश पर व्यंग्यात्मक हमले तक सीमित नहीं रखते। एक ही सत्ताधीश को केंद्रित कर लिखी गई सहाय और कश्यप की कविताएँ भाषा में विरोध की एक जरूरी कार्रवाई की तरह हैं। इस कार्रवाई में कश्यप जहाँ जोकर से काफी त्रास्त दिखते हैं और उसकी जोकरई उजागर कर रह जाते हैं, वहीं सहाय उस जोकर को उसकी जमात के साथ पहचानने की कोशिश भी करते हैं। इसीलिए वे जोकर को उसकी भूमिका सौंपने वालों को भी पहचान पाते हैं। कश्यप की कविता में जोकर के प्रति एक आश्चर्यमिश्रित घृणा का भाव है, कि जाने कहाँ से यह दो टके का आदमी जाकर राजा की कुर्सी पर बैठ गया है, जिसे कोई तमीज ही नहीं है। पर सहाय जोकर को जोकरई से भरते समाज की उपज के रूप में देखते हैं। इसीलिए उनका जोकर सिंहासन पर पालथी मारे बैठा है। और कवि को बच्चों का (भविष्य का) विश्वास है कि वे खेल-खेल में ही जोकर का रंग एक दिन उतार देंगे। पर कश्यप का जोकर अंत में सब कुछ पर काबिज होता कवि का सुकून छीनता दिखता है। जबकि सहाय ‘जोकर संस्कृति’ का भविष्य देख पाते हैं। इसीलिए वे जोकर को इतिहास में मुँह छुपाता दिखा पाते हैं।
एक दिन अचानक ताश की गड्डी से उछलकर सिंहासन पर जा बैठा जोकर देखते रह गए बादशाह-बेगम...(जोकर, मदन कश्यप, 1995)
रंगे-पुते चेहरे और उटंग कोट के साथ सिंहासन पर पालथी मारे बैठा है जोकर... (जोकर-1, विद्यानंद सहाय, 1998)
ऐसा ही होता है हर बार जब कोड़े के साथ जोकर असली घोड़ों पर सवार होता है गिरता है मुँह की खाता है चेहरा छिपाए फिरता है इतिहास में (जोकर-2, विद्यानंद सहाय, 1998)
मगध (वेद विरोधियों की भूमि) की धरती (पटना) से हिंदी कविता में अभिव्यक्ति के नए-नए मानदंड स्थापित होते रहे हैं। ज्ञानेन्द्रपति, आलोक धन्वा, अरुण कमल, विद्यानंद सहाय, मदन कश्यप से लेकर युवा कवि संजन कुंदन तक ने हिन्दी कविता में लगातार नयी जमीन तोड़ी है। सबके नए-नए रंग हैं। ज्ञानेन्द्रपति की मुक्तिबोधीय लय, आलोक धन्वा का जीवनधर्मी क्रांतिकारी रोमान, अरुण कमल की सरल धीरे-से हाथ पकड़ती अभिव्यक्ति, विद्यानंद सहाय की लोक-संगीतमय चित्रमयता, मदन कश्यप की ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे छिपी प्रेमाभिव्यक्तियाँ और संजय कुंदन की बाजार से लड़ती, झुकती और फिर उठती अंतरलय, ये सब मिलकर एक पूरा संसार बनाते हैं। इन कवियों में विद्यानंद सहाय और मदन कश्यप को आप उनकी लोक और जन के प्रति पक्षधरता के लिए अलग से याद कर सकते हैं। यूँ दोनों में एक अंतर भी है, कि जहाँ विद्यानंद सहाय के यहाँ यह पक्षधरता शमशेर की ‘बात बोलेगी’ की तर्ज पर आंतरिक

ताकत की तरह अभिव्यक्त होती है, वहीं मदन जी के यहाँ यह आलोक धन्वा के शब्दों में ‘छोटी सी जरूरी बात का विशाल प्रचार’ करती दिखती है। 

मदन कश्यप - राजनीतिक कविताओं की जरूरत

जब समाजवाद के विनाश का ढिंढोरा पीटने के बाद राजनीति से ज्यादा साहित्य में पाला बदल धमा-चैकड़ी मची थी और अपने पिछले चेहरों पर कालिख पोतते साहित्यकार व आलोचक ब्रह्मराक्षसों के शरणागत हो रहे थे और काव्य-जगत में प्रेम और प्रकृति के छद्म चमत्कार सामने आ रहे थे; ऐसे हालावादी समय में राजनीतिक भाषा की संवेदनशील दृढ़ता के साथ कविता में जमे रहना यही मदन कश्यप की ताकत है। जब वे लिख रहे होते हैं कि
‘‘योरोप के सारे बूचड़खानों पर सौंदर्यशालाओं के बोर्ड लग गए हैं।’’
तो वे रघुवीर सहाय की तरह ग्लोबलाइजेशन के योरोपीय, अमेरिकी षड्यंत्र का पर्दाफाश कर रहे हैं। योरोप शीर्षक कविता में -  सहाय जी ने लिखा था
टेबल पर गोश्त ही गोश्त, बस खाने का ढंग सभ्य है, काँटे चम्मच से।
इस संदर्भ में जब हम खुलेपन के नाम पर पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर आयातित भौंड़ेपन पर निगाह डालें, तो पता चलेगा कि हम किस कदर फिर गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। और ऐसे समय में राजनीतिक संदर्भों वाली कविताओं की जरूरत और भी बढ़ जाती है। क्योंकि आतंक और विकृत सौंदर्यबोध का प्रभाव हमारी युवा पीढ़ी पर बढ़ता जा रहा है तभी तो अपनी शेखी के लिए चर्चित युवा कवि बद्रीनारायण लिखते हैं - ‘इस पूरी सदी में छाये रहे हत्यारे।’
जिस सदी का चौथाई हिस्सा वे प्रेमगीत लिखते गुजारते हैं, पुरस्कार व अनुदान प्राप्त करते हैं उसे हत्यारों की सदी कहते हैं। लेनिन, विवेकानंद, गाँधी, नेहरू, भगतसिंह, सुभाष, माओ और मंडेला की सदी के बारे में ऐसा कहना क्या हमारी सोच का दिवालियापन और राजनीतिक रूप से हमारे आतंकित होने को नहीं दर्शाता है। ऐसे समय जब बद्री रिरियाते हुए लिख रहे होते हैं - ‘रोको। रोको... ।’ उसी समय मदन रात के इस आतंक को चुनौती देते लिख रहे होते हैं
वह पार कर लेगी रात और रास्ता भी कोई भी जंगल कविता का रास्ता नहीं रोक सकता।
वे उसकी ताकत के प्रति आश्वस्त करते लिखते हैं कि  -
शब्द कोई डोडो नहीं कि मारते मारते आप मार ही डाले उन्हें।
जब अवसरवादी लोग प्रेम और प्रकृति के छायावाद की ओर भागने लगे और रघुवीर सहाय का उत्तराधिकारी अशोक वाजपेयी को घोषित किया जाने लगा। साक्षात्कार के स्वकेंद्रित अंक में वाजपेयी ने लिख रहे होते हैं -  
कुछ बदलता नहीं है सिर्फ़ लगता है बदल गया जैसे शब्द-चयन या पराये शहर का मौसम।
और ऐसा वे पेरिस से लिख रहे होते हैं। स्पष्ट है उन्हें पेरिस और दिल्ली में अंतर नहीं महसूस होता। यह सच भी है, दुनिया भर के सत्ता प्रतिष्ठानों में कोई अंतर नहीं है, सबका चेहरा एक है। भला उसके लिए, मौसम कैसे बदल सकता है जो एक एअरकंडीशंड कमरे से दूसरे में यात्रा करता फिरता हो। विभेद की दीवार तो इस प्रतिष्ठान से बाहर आने पर ही दिखेगी। पर सवाल उठता है कि इस भटकाव के उत्तरदायी क्या वाजपेयी हैं। नहीं, वे तो बस एक खालीपन को भरती हवा की सनसनाहट की तरह हैं। इस खालीपन को फिर हरेपन से भरा जा सकता है। हरियाली इस हवा को सोखकर सन्नाटे के संगीत को खत्म कर अपना जीवंत संगीत पैदा कर लेगी। और तब हम फिर वाजपेयी से सहमत हो सकते हैं कि ‘‘कुछ बदलता नहीं है।’’ बस संघर्ष के तेवर बदलते हैं, हथियार बदलते हैं। इस हरियाली के बीज मदन कश्यप, निलय उपाध्याय आदि की कविताओं में साफ दिखते हैं। जब मदन लिख रहे होते हैं कि -  
अभी भी बचे हैं कुछ आखिरी बेचैन शब्द जिनसे शुरू की जा सकती है कविता
तब मुक्तिबोध याद आते हैं - ‘नहीं होती कहीं भी खत्म कविता नहीं होती।’

यूँ कविता को राजनैतिक-गैर राजनीतिक जैसे चौखटे में नहीं बाँधा जा सकता। पर सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर मदन कश्यप की कविताओं को राजनीतिक कविताओं का संबोधन प्रदान किया जा सकता है, जैसे कि कभी धूमिल, गोरख पांडेय आदि को राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध कवि के रूप में पहचाना गया था। जैसे आलोक धन्वा के यहाँ रेटारिक और संघर्ष के सौंदर्यबोध वाले पहलू को रेखांकित किया जा सकता है, अरुण कमल के यहाँ मध्यवर्गीय अंतद्र्वंद्वों की पहचान की जा सकती है, ज्ञानेंद्रपति के यहाँ सूक्ष्म विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि को महसूस किया जा सकता है, निलय को लोक संवेदना को अभिव्यक्त करने वाला माना जा सकता है, उसी तरह मदन कश्यप को राजनीतिक-ऐतिहासिक निहितार्थों की प्रमुखता का कवि माना जा सकता है।