कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Thursday, 30 April 2015

अच्‍युतानंद मिश्र - पीडा से साक्षात

ऐसे समय में जब युवा कविता सैमसंगी अकादमिक दायरों में सिमटने को बेताब और ज्ञानढीठ होती जा रही है अच्‍युतानंद की कविताएं गांधी के अंतिम आदमी की पीडाओं से साक्षात कराती हैं। विष्‍णु खरे और विजय कुमार की परंपरा में अच्‍युता की कविताओं का सच आपकी आंखों में आंखें डाल सवाल करता नजर आता है -
शोर लगाते लडके
जब सचमुच का भूख-भूख चिल्‍लाने लगे
तो पुलिस ने कहा वे खूंखार थे
नक्‍सली थे तस्‍कर थे ...
किसी ने यह नहीं कहा वे भूखे थे
और जवान हो गये थे
बूढे हो रहे देश में
इस तरह मारे गए जवान लडके।
वर्तमान में अपने समय के कडवे सचों को इतने मार्मिक ढंग से ‘रात की पाली’ की कविताओं में विजय कुमार ही दर्ज कर पाते हैं। जहां उम्र और अनुभव से आया सधाव विजय कुमार के यहां ज्‍यादा है वहीं कथ्‍य की साफगोई अच्‍युता के यहां अधिक है।
विकास के इस दौर में खानों में बंटती मनुष्‍यता पर सवाल खडे करती है अच्‍युता की कविताएं 
‘कि दूध की बोतलें लटकाता छोटुआ दरवाजे की मनुष्‍यता से बाहर’ क्‍यों रह जाता है कि ‘ क्‍या दूध की बोतलें, अखबार के बंडल/ सब्‍जी की ठेली ही/ उसकी किताबें हैं’।
अपने समय की दुश्‍वारियां कवि के अंतर को इस तरह व्‍यथित करती हैं कि उसे लगता है , और सही ही लगता है, कि वह कविता नहीं लिख पा रहा। कि उसकी बेचौनी कविता के फार्म में अंटती नहीं हे। कि वह ‘लेकर सीधा नारा’ पुकारना चाहता है किसी को। इस दौरान वह अपने समकालीनों के बारे में सोचता भी है- 
और दोस्‍त लिखते रहते हैं कविता
नीली और गुलाबी कापियां
भरती जाती हैं
भरती जाती है एक रात। 
यहां कवि की बेचौनी पाश और गोरख वाली है। वह चाहता है कि चीजें हिलें , बदलें  स्थितियां - ‘ कोई चूहा ही गिरा जाए/ पानी का ग्‍लास/ कुछ कुछ तो हिले।‘ 
यहां कवि का अपने साथियों के प्रति असंतोष वाजिब है पर ऐसी अधैर्यता भी उचित नहीं लगती कि परिवर्तन को वह चूहे-बिल्लियों के भरोसे छोड दे। अपने भीतर की इस बेचौनी को कवि को पाश और गोरख की तरह वह स्‍वर देना होगा जो अकेले पडते जाते लोगों की ताकत बन सके। ‘दर्द’ के उमडते समंदर को ‘दुनिया को बदल’ देने के ख्‍याल तक ले जाने का काम भी उस कवि को ही करना होगा।
असंतुलित विकास की विडंबनाएं युवा जमात को किस कदर कुंठित और हताश कर विद्रूपता रचती हैं , इसे कवि ने दिखाया है एक कविता ‘ सैंडी याने संदीप राम’ में। अंग्रेजी की गूलामी कैसे उन्‍हे उनकी जडों से काटती है कि वे समझ नहीं पाते कि उनकी गलती क्‍या है, और किंकर्त्‍व्‍यविमूढता में वे विकास की नवीं मंजिल से छलांग लगा देते हैं - ‘ वे हिंदी की शर्म में डूबे अंग्रेजीदां बच्‍चे थे/ वे अपने पिताओं की भी शर्म ढो रहे थे।‘
असंतुलित विकास की इस विद्रूपता को अच्‍युता की कई कविताएं अभिव्‍यक्‍त करती हैं - ‘ एक डूबे हुए गांव का चित्र / दिखाने से पहले / टीबी बजाता है एक भडकीली धुन।‘ या ‘ तुम्‍हारे चेहरे पर अफसोस है/ तुम डूबे हुए आदमी के प्रतिनिधि हो’।
हताशा और पीडा मूल स्‍वर है कवि का जो अक्‍सर पाठकों को भी डुबोता है और कभी मजबूर करता है विचार करने को कि वे देखें कि सूरते हाल बदलने की संभावनाएं कहां हैं। इस हताशा और पीडा के स्‍वर के बीच आशा का एक स्‍वर भी है। इस स्‍वर को स्त्रियां रच रही हैं। ये स्त्रियां रच रही हैं एक नया समय। ये श्रमशील स्त्रियां है जो ‘मेहदी की जगह’ मिटटी में अपने हाथ सराबोर कर रच रही हैं नया समय -
आसमान तक धरती
हो गयी विभाजित
एक टुकडा है जिसे सहेज रही हैं
स्त्रियां
जिसमें नरम दूब की तरह
उग आए हैं सपने...।
कवि विज्ञान का छात्र और शिक्षक है और उससे सहज आशा की जानी चाहिए कि वह वैज्ञानिक बिम्‍बों-प्रतीकों का इस्‍तेमाल करे। पर भावोद्वेलन जिस तरह उसकी उभिव्‍यक्तियों को अवैज्ञानिक बना देता है वह अखरता है, जैसे , सूरज की अंतडियां और गंधाती समृतियां जैसे प्रयोग।
अच्‍युता की कुछ कविताओं से गुजरते हुए केदारनाथ सिंह, मदन कश्‍यप, आलोक धन्‍वा और वीरेन डंगवाल की पंक्तियां याद आती हैं। ‘इस बेहद संकरे समय में’ और ‘निहाल सिंह’ आदि ऐसी ही कविताएं हैं। हर युवा कवि के साथ ऐसा होता है, आपने समकालीन स्‍वरों की पहचान और फिर खुद को उससे अलग जमीन पर खडा करना, सहज ही होता जाता है यहां। ‘आंख में तिनका’,’देश के बारे में’,’ लडके जवान हो गए’,’ढेपा’ आदि एसी ही कविताएं हैं कवि की जो उसे उसकी नयी जमीन दे रहे हैं, पहचान दे रहे हैं। कविता ‘सैंडी याने संदीप राम’ में उस पहचान को आगे बढाने की दिशा के संकेत भी हैं जो हमारी उम्‍मीद जगाते हैं। 

Sunday, 26 April 2015

बद्री नारायण - अनिर्णयों का अरण्य बनती कविता

आज जब अस्थिरता विश्व-संस्कृति का दर्शन बनती जा रही हैहिंदी की कविता इससे अछूती नहीं है। एक समय थाजब साहित्य राजनीति का मार्गदर्शक हुआ करता था। अब स्थिति उलट रही-सी लगती है। एक अनिर्णयों का अरण्य हम खुद रचे जा रहे हैं। बद्री जैसे युवा कवि खुद को समय की इस मार से बचा नहीं पा रहे हैं। ये स्वयं को बचाव की मुद्रा में ला रहे हैं। ऐसे में श्रीकांत वर्मा के शब्दों में कहें तो वह अप्रासंगिक नहीं लगेगा कि- जो बचेगा वो कैसे रचेगा?’ 
बद्री नारायण की कविताओं से गुजरते हुए हम देख सकते हैं कि वे भ्रम व सच कैसे हैंबद्री के पहले संग्रह 'सच सुने कई दिन हुए' की पहली कविता है आस-पास’ (आईस-पाईस) बद्री नारायण की कविताओं में घोड़ागदहाबैल की चिंताएँ ज्यादा हैंमनुष्य की कम। राजेश जोशी अपनी एक कविता में तंग आकर कहीं उड़ चलने की बात करते हैंपर अब उसकी क्या जरूरत। आप चिंताओं को छूकर कह देंआसपासचिंताएँ छूमंतर। यह तो वही हुआ कि जब डर लगेतो अपनी आंखें बंद कर लें। बद्री के यहाँ कुछ बहुत अच्छी व ज्यादातर कच्ची कविताएँ हैं। बद्री के यहाँ ज्ञान का अभाव वस्तुस्थितियों से बच्चों-सा खिलंदड़ापन ज्यादा पैदा करता है। बद्री का निवेदन भी काफी भ्रमोत्पादक है। यहाँ कवि अतीत से आत्मस्वीकार का निवेदन कर रहा है। भविष्य से उसको क्या लेना-देना। खुद को कविता का डोम कहकर क्या कहना चाहता है कविब्राह्मणों में एक जनेऊ-संस्कार होता है। उसके पूर्व वह जन्म से शूद्र माना जाता हैतो क्या कवि उसी ब्राह्मण परंपरा में जाने को बेचैन है। वेद-पुराण के रचयिता वेदव्यास तो शूद्र थे। क्या कवि उनकी पांत से उठकर अब वेदुआ मतलब वेदों के भाष्यकार और पुरोहितों की पंक्ति में जाना चाहता है। हालांकि वे निर्दयी हैंउन्होंने कभी तुलसी को मलेच्छ कहा था। पर आगे अपनी परंपरा में शामिल कर लिया था। लगता है कवि उसी आशा से यह नम्र निवेदन कर रहा है। 
शमशेर लिखते हैं कि सच्चाइयाँ गंगा के गोमुख से मोती की तरह झरती रहती हैंयासच्चाइयाँ बहुत गहरी नींवों में जम रही हैं। मतलब सत्य एक समय सापेक्ष वस्तु है। हमेशा इसके अन्वेषण की जरूरत पड़ती है। इस मोती को ढूंढ़ना पड़ता है। सचखबरों-सा रोज सुनाई या दिखाई पड़ने की चीज नहीं है शायद। यह वह मोती हैजिसे गहरे पैठ ढूंढ़ना पड़ता है। यह अनमोल स्थायित्व क्या हैयह स्थिरता जड़ता है या कोई अखंडसनातन सत्य। उसे कवि अपने भीतर नहींपाताल में छुपाना चाहता है। ऐसे अमूर्त सवालों के जवाब तो पुरखे ही दे सकते हैं। प्रेम-पत्राहिंò आत्माएँ पहचान ली जाती हैंमत होना उदासधूप चाम और निरघिण रामसप्तर्षि आदि संग्रह की महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। 
बद्री की कविता रूढि़गत पारंपरिक संस्कारों की रचना और पुनर्रचना का अच्छा उदाहरण है। जहाँ वह संस्कारों की पुनर्रचना करती नजर आती हैवहाँ रचना परंपरा को अतिक्रमित करती पुनर्रचित होती है। पर जहाँ स्मृतियों को ज्यों का त्यों रख दिया जाता हैवहाँ कवि अक्सर अपनी कमजोरी को भाषिक चमत्कारों के भ्रम से ढंक देना चाहता है। आज के छल-छद्म भरे जीवन में भक्तिन-सा सादा चरित्र जीवित नहीं है। जहाँ वह जीवित हैवहाँ वह भक्तिन नहीं है। फिर कवि सूरज से खेतों में श्रम करते हुए पुट्ठे में उगने को कहता है। पर इतने से उसे संतोष नहीं है। वह उसे तमगा बना हर माथे पर चिपक जाने को कहता है। 
तमगा एक सामंती प्रतीक हैयहीं परंपरा कवि की चेतना को रूढ़ बना देती है कलसूपकांचघनदतमगादियरी आदि शब्द कविता में ठेठियत की जगह भावुकता पैदा करते हैं। जैसे कोई अतीत की प्रेेेेमिका को याद कर उस जमाने के शेर पढ़ रहा हो। शेर तो वजनी हैंपर जमाना उसके लायक नहीं रहा। आज शमशेर हो चुके हैं। 
मत होना उदासस्मृतियों की पुनर्रचना का बेहतर उदाहरण है। इसमें जूनजुलाईनदीपहाड़ सब मिलकर मूंज की रस्सी बुनते हैं। तब रस्सी में इतनी ताकत आ जाती है कि उससे प्रभु की प्रभुता बांधी जाती हैहाथी का बल बांधा जाता हैसोने-चांदी का छल बांधा जाता है और बांधा जाता है विषधर का विष। कवि को विश्वास है इस पर। वह रीति को चुप रहने को कहता हैवह नीति को कहता है कि वह उदास न हो। 
पर इस विश्वास को कवि खुद खारिज कर देता है दूसरी कविता में। यहीं पर कवि की स्वालंबनहीनता समय के दबावों को बखूबी दर्शाती है। इस दबाव में भटककर उस पर एक फितूर सवार होता है कबूतर पालने का। वह हिटलरों से लड़ेगा नहींजब वह मारा जाएगाउसके कब्रिस्तान में कबूतर पालेगाउसकी आत्म की शांति के लिए। सुकरात के मरणोपरांत वह विष की कटोरी में कबूतर पालेगा। आवाज़ में मिसरी घोलने वाले कबूतर। कवि का विश्वास है कि साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का जाल उसके प्रेम की पाती ढोने वाले जातक कथाओं के कबूतर लेकर उड़ जाएंगे। कबूतर न हुए सर्वशुद्धिकारक मंत्र हो गए। बद्री के पास एक चमत्कारी रचना शिल्प है पर एक आत्महीनता भी है। यहाँ एक निरंतरता जीवन से एक गहरा लगाव साफ नजर आता हैजो एक विश्वास पैदा करता है। भाषा की सरलताजीवन की जटिलताएँ व जिजीविषा का स्वर इनमें साथ-साथ देखा जा सकता है। अंततः ये कविताएँ समय के आतंक को बखूबी सामने ला रही हैं। बद्री जैसे कवि इससे जूझ रहे हैं। टूट रहे हैं। टूटना बुरा नहीं है। मुक्तिबोध भी टूटे थे। पर बचाव के लिए समझौते करते जाना बुरा है। या बुरा है टूटकर अपनी आवाज बदल डालना। टूटकर बिखर जाना जर्रों में बुरा नहीं है। अगर जर्रों का स्वर नहीं बदलातो समय की आग उसे गलाकर पुनः एक कर देगी। पर अगर उनका स्वर बदल गयावे शीशे की तरह नहींजल की तरह टूटे व गैसों में बदल गएतो फिर उनका अस्तित्व कहाँ रहेगा। 

Thursday, 23 April 2015

कुमार वीरेंद्र - आज की तरह कल का भी पता नहीं

कुमार वीरेंद्र की कविता में  मुंबई की खोलियों का जीवन अपनी त्रासद स्थितियों के साथ अभिव्यक्त हुआ है। कविता से निकाल दिया गया जीवन ही जैसे लौटा है वीरेंद्र के यहाँ
एक आदमी को मालूम नहीं 
आज क्या खाने की इच्छा है 
क्या बनना चाहिए 
या क्या बनेगा घर में 
सब्जी कि मछली कि कुछ और 
ठीक आज की तरह कल का भी 
उसे पता नहीं...। (मुहल्ले में कोली लोग) 
कवि-आलोचक विजय कुमार का यह कथन सही है कि कुमार वीरेंद्र की कविताओं में-‘...उस मनुष्य का लगातार संघर्ष है, जो आदमी से एक दर्जा नीचे का जीवन जीने के लिए विवश है।’ वैसे कुमार वीरेंद्र की कविता  में भोजपुर के खेत-खलिहानों और मौसम से संबंधित ढेरों कविताएँ हैं पर कवि की पहचान उन कविताओं से बनती है जो उसने मुंबई में एक दर्जा नीचे की जिंदगी जीते हुए दर्ज की हैं। मुक्तिबोध अभिव्यक्ति के जिस खतरे को उठाने की बात करते हैं, वह इन कविताओं में उठाया गया है। इनसे कविता के गढ़ और मठ चाहे न टूटें, पर कविता की दुनिया से गायब होती जाती ‘आदमी होने की तमीज’ ज़रूर पैदा होगी
मैं यहाँ इतनी रात
लौटता रहूँगा 
और कुत्तों के अलावा पता 
किसी को नहीं होगा 
...और गली में किसी दिन 
निकली अगर मेरी भी चीख 
तब भी वे ही भौंकेंगे 
जिनका भौंकना अंततः 
रुदन-स्वर में बदल जाएगा। (कुत्ते) 
अंग्रेज चले गए पर अंग्रेजों की गुलामी आज भी कई-कई रूपों में जारी है। कुमार वीरेंद्र की एक कविता ‘इंडिया टुडे’ आज भी चली आ रही इस गुलामी का एक चेहरा सामने रखती है। इसमें मुंबई भ्रमण पर निकले चार गोरों के क्रूर कारनामों को दर्ज किया गया है। घूमने के दौरान गोरे टैक्सी ड्राइवर की कमीज को जलती सिगरेट से मजाक-मजाक में बार-बार दाग कर छेद  डालते हैं। बाद में ड्राइवर पुलिस में जाने की धमकी देता है, पर जाने की हिम्मत नहीं कर पाता। यह त्रासदी ही है कि आज भी सबकुछ अंग्रेजों का बनाया चला आ रहा है। हम उसमें खास रद्दोबदल नहीं कर पाए हैं, तभी तो- गोरे मजा लेते भ्रमण पर थे जैसे बिफोर नाइंटीन फोर्टी सेवन के इंडिया में घूम रहे हैं। 
कुमार वीरेंद्र की मुंबई की त्रासद जीवन स्थितियों को उद्घाटित करती कविताएँ तो अपना एक जुदा चेहरा रखती ही हैं, भोजपुर के खेत-खलिहानों के अनुभवों से उपजी उनकी कविताएँ भी अपना अलग टोन रखती हैं। कुआर मास आदि ऐसी कविताएँ हैं जिनमें कवि गाँव-जवार की स्थितियों को याद ही नहीं करता, कई बार उनका बारीक विश्लेषण भी करता है
कुएँ तो रहे ही नहीं 
धरती के घाव थे जैसे 
भरना था भरते चले गए...। 
वीरेंद्र को पढ़ते हुए केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे और ज्ञानेंद्रपति की काव्य शैलियाँ याद आती हैं। हालाँकि ये शैलियाँ अभी कवि की ताकत नहीं बन पा रही हैं। हाँ, इनसे यह बोध जरूर होता है कि कवि कविता की विभिन्न सरणियों से वाकिफ है। विष्णु खरे अपनी कविता में आत्मकथा, संस्मरण सबको समेटे चलने में एक हद तक समर्थ दिखते हैं। वीरेंद्र भी कई जगह ऐसा करते दिखते हैं। पर इन विधाओं को कविता में समेटने के लिए जो कलात्मक प्रविधियाँ अपेक्षित हैं वो उम्र और अनुभव से आती हैं। वीरेंद्र की वैसी कोशिशें सपाट बयानी नजर आती हैं, वरना अभी ही जीवन को इस तरह खोलकर दिखाने की हड़बड़ी कैसी
वीरेंद्र कई जगह करुणा से डबडबाते जाते हैं। उसे जज्ब करने की जरूरत है, तभी वह गालिब की आँखों से चूता लहू बन पाती है। इधर की कविता में चीजों को पुनर्परिभाषित करने का चलन बढ़ा है। यतींद्र मिश्र की कविता ‘लंगड़ा आम’ हो या रमण कुमार सिंह की कविता ‘ताला’ या फिर कुमार वीरेंद्र की ‘डोंड’, ‘तला’ इन सबमें कवि चीजों को अपनी निगाह से देखता है और अपने-अपने निष्कर्षों पर पहुँचता है। ऐसी कविताएँ कवि की रचनात्मकता को निखारने का काम करती हैं। ‘लालटेन जलाना’ विष्णु खरे की चर्चित कविता है। खरे अपनी लालटेन इस धैर्य से जलाते हैं कि उसकी चमक से हिंदी कविता अलोकित होने लगती है, ‘मेरी यह लालटेन’ शीर्षक से एक कविता वीरेंद्र के इस संग्रह में भी है। वीरेंद्र की यह लालटेन चाहे कविता में वो चमक पैदा न कर पाती हो पर उनके धैर्य और साहस को बयाँ जरूर करती है, अपनी चमक पर चैंधियाने की बजाय- मुझे लालटेन की रोशनी में अंधेरे के बहुत बड़े-बड़े पाँवों के न गिने जा सकें उतने चिह्न साफ-साफ दिखाई पड़ते हैं उसका मुँह ढूँढ़ता हूँ तो घर के छप्पर पर होने का एहसास देता है मैं जानता हूँ अभी मुझे समय लगेगा उसकी आँखों में लालटेन के साथ प्रवेश करने में...। 
‘बाधा’  एक त्रासद कविता है। इसे पढ़कर मायकोवस्की की आत्महत्या के पूर्व लिखी कविता याद आती है। वीरेंद्र के यहाँ प्रताड़नाएँ जुदा हैं पर मुक्ति के इस दरवाजे पर उनकी दस्तक बहुत भारी और बैठती हुई है- छत पर बिल्लियाँ झगड़ रही हैं गली में रो रहे हैं कुत्ते एक आदमी शायद आज की रात भी आत्महत्या का निर्णय नहीं ले पाएगा। इस कविता को पढ़कर गोरख पांडे की पंक्तियाँ याद आने लगती हैं- आँखें हैं या दर्द का उमड़ता हुआ समंदर जितनी जल्दी हो इस दुनिया को बदल देना चाहिए। 

Thursday, 16 April 2015

निलय उपाध्याय - हम रहेंगे, तुम डांट देना दुख को

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलामी और अश्लीलता की मार से जकड़ते हमारे फेफड़ों को निलय की कविताएँ ताजी हवा-सी ताकत देती हैं। केदारनाथ सिंह की कविता में जो जीवन की धारा का मर्मर संगीत है और केदारनाथ अग्रवाल के यहाँ प्रकृति का जीवन, दोनों का सामंजस्य निलय की कविताओं में हमें मिलता है-
सुनो हमें घर ले चलो 
हम दाने हैं मकई के 
हम तुम्हारा घर 
खुशियों से भर देंगे 
भगा देंगे साल के दुख।’
हम रहेंगेतो बनिया तुम्हें उधार देगा 
हम रहेंगेतुम डांट देना दुख को 
हम रहेंगेतुम सो लेना नींद भर...
ले चलो 
ले चलो 
नहीं तो लुटा देगी हमें धूप...
ओ किसान हमें घर ले चलो 
हम तुम्हें बिजूखे से आदमी बना देंगे 
लंबी कविता के अंतिम भाग की ये कुछ पंक्तियाँ निलय के दृष्टि संपन्न सौंदर्यबोध, ग्रामीण महाजनी सभ्यता के अवशेषों की मौजूदगी, एक विज्ञान सम्मत दृष्टि और जीवन की परिवर्तनशीलता में जीवट की निरंतरता को जितनी सरलता से उद्घाटित करती हैं वह एक साथ आज की तारीख में हिंदी कविता में दुर्लभ है। 
गांवों के देश भारत की ग्रामीण सभ्यता आज भी उधार-खाते पर आधारित है और आदमी बनने के लिए आज भी भारतीय किसान को साल भर बिजूखे की जिंदगी जीनी पड़ती है। पर फसल को खलिहान से घर ले जाते वक्त और उसके आसपास के भरे-पूरे सप्ताहों में ही जो थोड़ी सी खुशी भारतीय खेतिहर वर्ग (जिसे कथित सभ्य समाज ‘अगहन का राड़’ कहता है) के हिस्से आती है। उसी के बल वह साल भर की बिजूखे की जिंदगी गुजार देता है। क्योंकि घर के आगे चारों ओर बाजार फैला है, सात समुंदर पार तक, जो बार-बार आदमी को बिजूखा बना देता है। 
साल में एक बार आदमी बन पाने की खुशी को ही निलय की कविताएँ अपनी ताकत बनाती हैं और उसी के भरोसे वे इस महाजनी सभ्यता से लड़ने की बात करते हैं। इस खुशी में भी उनकी वैज्ञानिक दृष्टि मौसम के मिजाज के प्रति सचेत होने का ध्यान रखती है। वे कहते हैं कि-हमें घर ले चलो, नहीं तो धूप लुटा देगी हमें।’ यह धूप बहुराष्ट्रीय बाजार का हमला है जो हमारे सत्व का पेटेंट करा लेना चाहती है। पर निलय यहाँ अपने ढंग से सोचते हैं और विज्ञान का सहारा ले फिर एक मुकम्मल जवाब देते हैं-  विषाक्त घोलों से रक्षाक्षमता विकसित करते जैसे ढीठ हो जाते हैं कीड़े ढीठ हो जाएँगे हम सब। 
वस्तुतः बहुराष्ट्रीय बाजार के विषाक्त हमले से रक्षाक्षमता विकसित कर चुकी है निलय की कविता। ‘मोटांजा’ कविता में मोटे अनाजों को याद करते वे लिखते हैं-  बाजरे’ के बज्जर लोग और उनके खेत घिर गए हैं सिक्के और स्वाद से। हालांकि बहुत से रथी-अर्धरथी स्मृत्तियों, गाथाओं और माता के अंचल के हवाले खुद को करने लगे हैं पर एक लड़ाकू पीढ़ी भी सामने आ चुकी है और उनकी पीठ पर कुछ प्रौढ़ हाथ भी हैं। तभी तो युवा कवि संजय कुंदन सिक्के व स्वाद के घेरे को इस तरह महसूसते हैं। ‘सिक्के’ कविता में वे लिखते हैं - उन्हें नहीं मालूम कि बिना कोई युद्ध लड़े उन्होंने कैसे जीत ली पूरी दुनिया। वस्तुतः सिक्के के इस छद्म अस्तित्व पर उठी यह अंगुली ही इसका जवाब है। क्योंकि सिक्के के इस रहस्यवादी दर्शन से हार मानना अपने वैज्ञानिक विकास को झुठलाना और अज्ञान के छल को मान लेना है। इस छल की पहचान ज्ञानेंद्रपति के यहाँ गहरी मिलती है- एक बैंक के मुंडाकार वाॅल्ट में से निकलकर चली आती हैं आइंसटाइन की अगाध आंखें नीलामी पर चढ़ने उनकी बगल में पिकासो की यशस्वी कूची है। अपने समय की इस उधेड़बुन को निलय अपनी एक पंक्ति में अपदस्थ करते हैं, जब वे लिखते हैं -  ‘जैसे ढीठ हो जाते हैं कीड़े/ ढीठ हो जाएगी यह पृथ्वी।’ 
निलय की एक महत्त्वपूर्ण कविता है- ‘बेहया’। बेहया की झाड़ पर लिखते वे बाजार की बेहयायी बड़ी सफलता से दिखलाते हैं- किसी काम का नहीं इनका हरापन मवेशी भी नहीं खाते इन्हें वस्तुतः अपने सहज आकार से बड़े व बे-स्वाद टमाटरों, आलू, करैले, और अन्य जिंसों की पेटेंट प्रजाति जो आज हमारे यहाँ फैलती जा रही है उसे जानवर भी खाना पसंद नहीं करते और हमारे यहाँ उपजने वाली फसलों की सुगंध को नष्ट करती यह पैदावार बाजार के द्वारा बीहड़ की तरह फैलाई जा रही है- ये बीहड़ हैं बीहड़ों के बाड़ नहीं होते।  पर इस बाजार की प्रकृति व सीमा को भी पहचानता है कवि, वह जानता है कि यह फसल नहीं- दो फसलों के बीच का परती समय है यह खेत की चमड़ी दबाते कंधों तक चढ़ आए हैं बेहया  कवि को आशा है कि जल्द ही मौसम अनुकूल होगा। इस बाजार से हम निपट लेंगे क्योंकि अपनी छाती पर उग आए बेहया और जंगली बाजारू घास को नष्ट कर देने के प्रयास में- किसी नवजात को जन्म देने के लिए ऐंठ रही है पृथ्वी की कोख’। ग्रामीण परिवेश पर आए इस बाजारू संकट से निपटने का रास्ता भी बतलाता है कवि। यहाँ कवि की सोच गांधी व शास्त्री की असहयोगी व स्वावलंबन पर आधारित सिद्धांतों पर टिकी लगती है। वह लिखता है- एक मुट्ठी अन्न रोज कम खाएंगे और बचाएंगे बीज। ‘मकड़ी’ कविता में कवि एक चेतावनी भी देता है- तड़कते आसमान से बिजली की रास पकड़ कूदने वालेपछताएंगे सूखे नारियल में पानी की तरह बचा रहेगा जीवन। 

Monday, 13 April 2015

प्रेमरंजन अनिमेष - कविता की तीसरी पीढ़ी में ‘उधार’

मैंने धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिडि़या से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी
मैंने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन...
बस एक प्रश्वास
लहर से; एक रोम सिहरन-भर उल्लास। ...
सबसे उधार मांगा, सब ने दिया। 
यों मैं जिया और जीता हूँ...
(कितनी नावों में कितनी बार अज्ञेय)
अपना क्या है इस जीवन में 
सब तो लिया उधार 
सारा लोेहा उन लोगों का 
अपनी केवल धार
(अपनी केवल धारअरुण कमल)
रखता हूँ बढ़ई के कुछ औजार 
लोहार का घन रखता हूँ 
मरझतियों के जोड़
कुली का माथा 
धुनिए की धुन 
जिन-जिन के ये हुनर 
सबका आदर सबकी बाकी है गुरु दक्षिणा 
सबसे सीखा 
आंख बचाकर
(मिट्टी के फल - प्रेमरंजन अनिमेष) 
यहाँ आप हिंदी कविता की तीन पीढि़यों में एक ही कथ्य को बदले आवरणों में अभिव्यक्त होता देख सकते हैं। तीनों कविताएँ  इन तीन कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ भी हैं। इनमें जीवन और कविता के विभिन्न मुक्त श्रोतों के प्रति एक चतुर और विनम्र कृतज्ञता को स्वर दिया गया है। उधार से काम चलाने वाली ऐसी जमात को याद कर बांग्ला कवि शक्ति चट्टोपाध्याय ने लिखा है -  
शब्दों ने गढ़ लिया है 
अपना एक शहर 
अक्षर ही हैं घर-द्वार 
वर्णमाला से कुछ-कुछ लेकर उधार 
उन्होंने अपने लिए निकाल ली है एक पूरी वनभूमि 
पर यह सब सच नहीं है। 
अज्ञेय और अरुण कमल के कथ्य से समानता रखने वाली अनिमेष की कविता का उपरोक्त अंश  कविता ‘साज-बाज’ से है। अपने इन दो अग्रज कवियों के मुकाबले अनिमेष एक ‘चुप्पा’ कवि हैं। वे अपने समय से संवाद बना पाने की बजाय उससे ‘आंखें बचाकर’ अपना काम करते हैं। अनिमेष की कविताओं के कई रंग हैं। इनमें सबसे गहरे प्रकृति से संबंधित विषयों पर लिखी कविताओं के हैं। शायद प्रकृति को गुरु दक्षिणा देने का झंझट नहीं है इसलिए उसके मुक्तहस्त साहचर्य को अनिमेष ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। ‘सूर्यास्त’, ‘सूर्य संभव’ और ‘पूरे चांद की रात’ जैसी कविताओं में उनकी काव्यकला अपने जोर पर है - 
पूरे चांद की रात है यह 
चांद खींच रहा अपनी ओर 
जितना कुछ बहता हुआ तरल। 
‘छाता’ अनिमेष की एक अच्छी कविता है। इसके माध्यम से वह नागर जीवन की विडंबनाओं को उसके कई आयामों के साथ अभिव्यक्त कर पाते हैं - इस शहर के लोगों के पास जो छाता है उसमें कोई एक ही आता है बराबर लगता है छाते रिश्ते-नाते हैं बरसात में काम आते हैं और अक्सर छूट जाते हैं। 
आजकल कविता का पचास फीसदी ऐसा लिखा जा रहा है। जिसके तहत कवि ऐरे-गैरे किसी भी विषय पर कविता लिखने की भूख  का इस्तेमाल कर कुछ रच दिया करता है। इस रौ में कविता से इस तरह काम लिया जा रहा है, जैसे वह एक प्रयोजनीय वस्तु हो। ये कविताएँ वैसे गीतों की तरह लगती हैं जिन्हें किसी गीतकार से डंडे के जोर पर गवाया गया हो कि चलेगा नहीं तो पड़ा डंडा तेरे सर। अनिमेष के यहाँ भी ऐसी कविताओं की भरमार है। ‘झिनझिनी’, ‘गालियाँ’ आदि ऐसी ही कविताएँ हैं। जब तक झिनझिनी रही मुझे कोई ले गया मेरे हाथ से घड़ी, अव्वल तो झिनझिनी तब होती है, जब आदमी निश्चित घर-द्वार पर बैठा होता है लगातार। जहाँ से घड़ी छीनने तथा साइकिल चुराने जैसी बेसिर-पैर की घटनाएँ नहीं घट सकतीं। झिनझिनी ऐसी भी नहीं होती कि अगर आपको होने लगे तो चोर-उचक्कों को वह दिख जाए। 
ऐसी कविताएँ कवि की कहानी को ज्यादा दर्शाती हैं, उचक्कों से भरे समय को कम। ‘गालियाँ’ में भी ऐसी गड़बडि़याँ बहुत हैं, जैसे - ईमानदार तीर की तरह हैं गालियाँ’। यह ईमानदार तीर क्या होता है? एक जगह कवि रिश्तों को छाते की तरह छोड़ देना पसंद करता है, तो यहाँ वह गालियों में रिश्तों की आत्मीयता बचाए रखने की जिद भी करता है। ऐसी कविताएँ दृष्टि का अभाव दर्शाती हैं। 
अनिमेष की स्त्रियाँ भी पिछड़े सामंती समाज की हैं। हार न मानने वाली स्त्री के पास नाखूनों के सिवा उसका हथियार हैं गालियाँ ही, नयी रोशनी कवि तक पहुँची नहीं है। पूरे संग्रह में इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। कवि के पिछड़ेपन के और भी दर्जनों उदाहरण हैं। ‘जूते का मुँह’ कविता को ही लें। ‘मेरी आत्मा को स्वीकार नहीं/ किसी की खाल में पांव डालना/ चाहे वह मरी ही सही’। गाय पर लिखी एक कविता में अनिमेष की पंक्ति है कुछ भी खाकर/ गोबर करती पवित्र’। गाय पर ही कुमार अरुण की काव्य पंक्तियाँ देखें तो अनिमेष के यहाँ जो द्वंद्वात्मक चेतना का अभाव है उसे पहचान सकते हैं। अरुण लिखते हैं - गाय का मुँह बहुत सुंदर होता है। बाबू कहते हैं उसका चमड़ा बहुत उम्दा...।
‘स्वतंत्र हरकत कर रहे हैं, मेरे अंगूठे/जूते के भीतर बेपरवाह’। यहाँ भी कवि व्यक्तित्व के निर्माण की पोल खुलती है। वह कपड़ों के जूते के भीतर ही स्वतंत्र और बेपरवाह हो पाता है। बिना किसी खोल या आवरण के कवि कहीं रह नहीं पाता। धूमिल के पांव तो जूते में महकने लगते थे। यूँ कैनवस के जूते को फाड़ बाहर रहने वाले अंगूठे का प्रसंग प्रेमचंद के यहाँ का है। चुप्पा वृत्ति की जो एक सीमा है, वह कवि की भी है। वैसे इन बातों को आप कवि की दृष्टि का प्रमाण भी मान सकते हैं कि वह अपने समय की बयार के हिसाब से ही अपनी पीठ घुमाए  है। समय के पीछे रूढि़यों की ओर लौटने की जो जद्दोजहद अभी चल रही है, राजनीति और इतिहास के क्षेत्र में, उसे अनिमेष कविता की दुनिया में ले आये हैं और वहाँ आप खोल के बाहर आकर रचने की मांग एक कवि से ना करें तो ही बेहतर। 

Friday, 10 April 2015

सुदीप बनर्जी - जंगल तुम कितने पेड़ों से उदास हो

पश्चिमी जगत में आई वैचारिक स्थिरता के संदर्भ में जिस तरह कविता के अंत की चर्चा होती रहती है वह दक्षिण अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप के संघर्षपूर्ण विकासशील दौर में अप्रासंगिक साबित हो चुकी है। भारतीय कविता जीवित है। सारे हंगामे के बाद भी। जैसे बुश की हार, मेल्विन के समझौतावादी रूपक, मंडेला की रिहाई और अमेरिकी जातीय दंगों के अंतर्द्वंद्वों से पैदा वैचारिक शून्य के भीतर समाजवाद जीवित है।

हिंदी में विनोद कुमार शुक्ल की अपनी सरलता में जीवन के जटिल सदर्भों को लेकर चलती कविताएँ और ‘पहल’ में आईं, पाकिस्तानी कवि अफजाल अहमद की अपने रोमानीपन में भी जीवन के प्रति एक अन्वेषण दृष्टि को लेकर चलती कविताएँ कविता के नए संदर्भों में खुद को बदल कर जीवित रखने की शक्ति की द्योतक हैं।
सुदीप बनर्जी की आरंभिक कविताएँ भाषा और शिल्प के स्तर पर एक हद तक समर्थ परिवर्तनों का प्रमाण हैं। समकालीन संदर्भों में ये कविताएँ संप्रेषण के स्तर पर जटिल होती गई हैं। कहीं-कहीं वह असद जैदी की तरह मोहभंग की किंकर्तव्यविमूढ़ शैली के निकट भी पहुँच जाती हैं। पर सामान्यतः भाषा की तहों के भीतर जाने पर कई अर्थ खुलते हैं जो कविता को उसकी संघर्षशील परंपरा से जोड़ते हैं। इस संदर्भ में ‘पैदल-पैदल चलकर’ तथा ‘वह दीवाल के पीछे खड़ी है’ इन दो कविताओं का विश्लेषण किया जा सकता है। दोनों कविताओं में स्त्री के उत्पीड़न को दर्शाया गया है। पर जैसे दोनों कविताओं में भारतीय स्त्री का मूर्तन किया गया हो। ऊपर से वह नदी की तरह चंचल, सौंदर्यमयी है। पर भीतर उसकी पीड़ाएँ ऐतिहासिक हैं। पहली पंक्ति में गली-कूँचों में कूड़े के ढेर में जीवन तलाशती औरतों का चित्र है तो दूसरी में रसोईघर की दीवारों में घिसती, जीवन के रंग-बिरंगे चित्र उकेरती खिरती जाती भारतीय स्त्री है-
 पैदल-पैदल चलकर
नदी पहुँची है उस कस्बे में 
नंगे पैर उसके 
पैरों का माहावर घुल गया है 
मटमैले पानी में 
वह कोयले से आँक रही है दुनिया 
दीवाल में अपनी तरफ 
जो सदियों से उसी तरफ खड़ी है दीवाल के 
पीछे गायब संसार की बेवजह नोंक पर। 
यह सदियों से दीवार के पीछे खड़ी मध्यवर्गीय भारतीय स्त्री है। जिनके बारे में कवि का कथन है कि उसकी पीड़ा को वह भी कितना पकड़ पा रहा है कि वह नाकाफी है। भीतर दीवार पर कोयले से वह  अपनी कल्पना को घिसती वन-उपवन, पशु-पक्षी, देश-विदेश चित्रित करती है, उसी में वह अपनी दृष्टि खोती चली जाती है, और बाहर दुनिया झुलस रही है? उसे मरहम की जरूरत है जो ये स्त्रियाँ ही दे सकती हैं? समकालीनता का जहर वह भी बाँट सकती हैं? अगर उन्हें बाहर की दुनिया में बराबरी की हिस्सेदारी दी जा सके?
जंगल और उसके प्रतीकों को लेकर कई कविताएँ हैं सुदीप बनर्जी की। जिसमें सत्ता और व्यवस्था के कई चेहरे सामने आते हैं? और कवि उनके आगे प्रश्नचिद्द लगाता है? कवि खुद व्यवस्था का एक पुरजा है और जब उसका साथ व्यवस्था की विकृतियों से पड़ता है तो कभी तो वह खुद उसमें शामिल होने की कैफियत से खुद से सवाल करता है। कभी उसकी दिशा बदलने के लिए हस्तक्षेप की कोशिश करता है-
पेड़ों को कहा राजा आपने 
दरख्त कहा, आग कहा 
पर वे टाल बन गए ईंधन के 
समय के इस दोमुँहेपन को कवि ईमानदारी से उजागर करता है। वह व्यवस्था की सूरत को सामने लाता है। और चेतावनी देता है कि लोग पहले तो डर को समझते नहीं और जब वह उन्हें खाने लगता है तब घबराकर जगह छोड़ने लगते हैं- ...जो रह गए थे दूसरे मोहल्लों की तलाश में चल पड़े। पर इस तरह भागने से तो समस्याओं से निजात मिलने से रही, लड़ना तो पड़ेगा ही आपको? एक ओर व्यवस्था जीवों के लिए आभयारण्य बनाती है। तो दूसरी ओर चोर-बाजारी में बिकने को उनकी छाल पहुँचा आती है। जंगल से वापिस अगर लौटेंगे शहर में तो शहर पूछेगा ही आपसेे? क्या बताएंगे उसे आप शेर के बारे में?
‘टेम्स’ को लेकर बच्चन ने भी कुछ रोमानी कविताएँ लिखी हैं। टेम्स को लेकर एक कविता है सुदीप बनर्जी की जो अपने छिटपुट ऐतिहासिक संदर्भों के बावजूद एक रोमानीपन लिए चलती है।
उसकी खूबसूरत कमीज में 
शरीर को क्षत-विक्षत कर गुजर गई 
बिजली जमाने भर को रोशन करती रही 
सुदीप की कुछ कविताएँ एक दूसरी ही जमीन की कविताएँ हैं। जिनमें संवेदना की लय कुछ ज्यादा ही तीव्र है। जहाँ चिता गहरी है, लगता है कवि एक अंधी सुरंग में फंसा हुआ है पर वह रोशनी को देख रहा है। पहचान रहा है, उस ओर बढ़ रहा है। इसमें कभी तो वह ऊपर को जाता है। कभी डूबने लगता है। कभी हाथ-पाँव मारता किनारे की और बढ़ने लगता है-
आसमान तुम्हारे कितने तारे तुम्हें परेशान करते हैं, 
जंगल तुम कितने पेड़ों से उदास होते हो 
लगता है कवि की संगत में जंगल, आकाश सब शालीन हो रहे हों सबकी चिंताएँ कवि की चिताएँ बन जाती हैं?