कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Tuesday, 26 May 2015

बल्ली सिंह चीमा - कूलरों को क्या पता

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के जैसे-जैसे जन-जन की जुबान पर चढ़े गीत के रचनाकार चीमा की कविताओं में समय की पीड़ा और संघर्ष उसकी गहनता और बहुस्तरीयता में अभिव्यक्त होते हैं- 
ये कहानियां, ये लफ्फाजियां, तेरे मुंह से मुझको जंची नहीं
मेरे गांव में ये रिवाज है, कहा जो भी करके दिखा दिया।
कथनी और करनी के मेल की जो मिसालें अब भी गांवों में शेष हैंचीमा उन्हें स्वर देते हैं। नये जमीनों, नये आसमानोंकी इस शायरी की शिनाख्त करते वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना सही कहते हैं- ‘‘दरअसल कविता न छंद की मोहताज है न गद्य की। सूक्ष्मता, संगीतात्मकता, संवेदना और बिंबात्मकता के साथ कवि दृष्टि यानी कथ्य का चुनाव, वे तत्व हैं, जो यह तय करते हैं कि कविता संभव हुई या नहीं और यह भी कि उसमें कवि का समय प्रतिध्वनित होता है या नहीं।’’
चीमा पेशे से किसान हैं और उनकी चेतना अपनी सहजता में पर्यावरण के विनाश से पैदा संकटों को स्वर देती है- 
जब से बेच दिए हैं उसने घर के सारे पेड़
बैठ मुंडेरों पर सारा दिन गुर्राती है धूप।
चीमा अन्न उपजाने वालों के प्रतिनिधि हैं इसलिए उनका स्वर अन्न खाने वाले कवियों से जुदा है। उनके लिए जीवन-दिन-रात के निहितार्थ भी अलग हैं- 
दिन तो हमें थका देता है, करती है रात तरो-ताजा
रब मिलता तो कहते उससे तूने खूब बनाई रात।
श्रमसिक्त जीवन अलग होता है परजीवियों के जीवन से, इसलिए वहां हम एक सहज आत्माभिमान और संतोष पा सकते हैं-
अच्छे काम किए हैं, ‘बल्लीशायद इसीलिए
नींद की गोली खाये बिना ही आ जाती है नींद।
इस आत्माभिमान को इस सरलता से अभिव्यक्त करने की कुव्वत हिंदी के कितने कवियों में आज शेष है
शहर और गांव की टकराहटों के स्वर चीमा की कविता में बारहा मिलते हैं। गांव और शहर की सुंदरता के भेद को भी चीमा खूब समझते हैं कि जहां गांव का सौंदर्यबोध श्रम से जुड़ा होता है वहीं शहर का सौंदर्यबोध उस श्रम के शोषण से पैदा पैसे से जुड़ा होता है-
पीपलों की छांव में ठंढी हवाओं से मिलो
कूलरों को क्या पता बहती हवा क्या चीज है।
कभी शमशेर ने लिखा था- वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी। इतिहास के अंत और निरूत्तराधुनिकतावादी पचड़ों के बाद जिस तरह आज फिर अक्युपायी वाल स्ट्रीटका नारा बुलंद हो रहा है, उसकी पृष्ठभूमि में चीमा की पंक्तियां प्रासंगिक लगती हैं-
बाएं चलिए जिंदगी से प्यार करना सीखिए
हर सफर हर राह में बाईं दिशा मौजूद है।
कुछ भी कर गुजरने का जज्बा और संयम का द्वंद्व और जीवन के अंतर्विरोधों का संतुलन चीमा अपनी कविताओं में साधते चलते हैं खुद को आदर्श बनाने में चीमा का विश्वास नहीं है।आम आदमी बने रहना ही उन्हें सहज लगता है क्योंकि वहां उन्हें अपने सरीखे दुखी लोग मिल जाते हैं, साथ देने वाले
कहीं-कहीं कुछ पंक्तियों को पढ़ते हुए लग सकता है कि चीमा के यहां कुछ पुराने ख्यालात जड़ जमाये हुए हैं, जैसे बड़ों के पांव छूने की रवायत को वे गलत नहीं समझते, पर रूढि़यों की गुलामी उन्हें बर्दाश्त नहीं-
वो जो रूढि़यों का गुलाम है उसे क्या पता कि नया है क्या?
जिसे टोटकों पे यकीन हो, उसे क्या खबर कि दवा है क्या?
अदब और रवायत का ख्याल करते हैं चीमा, पर जहां वे रूढि़यों की शक्ल लेने लगती है, वे विद्रोह कर बैठते हैं, क्योंकि उनमें वो जज्बा है जो मझधार में भी साहिल ढूंढ सकता है-
साहिल की चाहत है लेकिन, तैर रहा हूं बीचों-बीच,
मझधारों में ही साहिल हो, ऐसा भी हो सकता है।

Friday, 22 May 2015

निर्मला पुतुल - बहती बयार के खिलाफ


निर्मला पुतुल की कविताएँ अपने अस्तित्व की तलाश में भागती एक स्त्री की कविताएँ हैं-
मैं होती हूँ स्वयं एक घर 
जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त 
गर्भ से लेकर बिस्तर तक के बीच 
इस स्त्री की त्रासदी यह है कि 
वह घर के कण-कण में बसी है 
पर उसके बाहर ‘नेम-प्लेट’ पति के नाम की है। 
स्त्री-पुरुष में भिन्नता है, इसे मानती हैं पुतुल और इस भिन्न्ता के साथ स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को जानने की माँग करती हैं। वह पूछती हैं-
क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत... 
घर, प्रेम और जाति से अलग एक स्त्री को 
उसकी अपनी ज़मीन के बारे में बता सकते हो तुम ...
बता सकते हो सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता
क्या तुम जानते हो’ कविता की ये पंक्तियाँ वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की बहुचर्चित कविता ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ की याद दिलाती हैं। आलोक लिखते हैं- जला दी गई स्त्रियों के बारे में- 
वे इतनी सुबह काम पर आती थीं 
उनके आँचल भीग जाते थे ओस से और तुरंत डूबे चाँद से... 
वे किस देश के लिए आती थीं इतनी सुबह
सवाल वही है कि स्त्री का घर है कोई या देश या दुनिया? पुतुल की तमाम कविताएँ इस दुनिया को बदल देने की इच्छा से लिखी गई कविताएँ हैं? बदलाव की यह बेचैनी कई-कई रंग-रूपों में प्रकट होती है। ‘बाह्यमुनी’ कविता में वह लिखती हैं- 
तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारों 
पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट।
 ...जिन घरों के लिए बनाती हो झाड़ू 
उन्हीं से आता है कचरा तुम्हारी बस्तियों में?
यह बहुत पुराना सवाल है कि घरों में उनको बनाने वाले क्यों नहीं रहते या सड़कें बनाने वाले खुद किन पगडंडियों पर चलते हैं? धूमिल की एक कविता बहुत पहले इस सवाल को पहचान के स्तर तक ले जा चुकी है कि वह तीसरा आदमी कौन है, जो न रोटी बेलता है न खाता है बल्कि उससे खेलता है। वे संसद से पूछते भी हैं इस तीसरे आदमी की बाबत, पर संसद मौन है। संसद पुतुल के इन सवालों पर भी मौन रहेगी जब तक व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक लंबी लड़ाई का आरंभ नहीं होता। पुतुल की कविताएँ उन्हीं मौलिक और परिवर्तन-कामी सवालों को उठा रही हैं जिन्हें हिंदी कविता में कवियों की एक बिरादरी लंबे समय से बड़े धारदार ढंग से उठाती रही है? हाँ, पुतुल की ज़मीन नई है, जो भाषा को नया औजार दे रही है, एक नई उम्मीद जगा रही है जो कविता का मुख्य काम है। 
 हिंदी के युवा कवि मनोभ्रंशजनक स्थितियों से उपजी अपनी कविताओं से बाहर निकलें। ‘वे’ और ‘थे’ वाली शैली का मनोबुझौवल बहुत हुआ अब समय आ रहा है फिर चीज़ों को सीधा नाम लेकर पुकारने का। पिछली सदी के अंतिम दशक में पाश की कविता ने हिंदी कविता को उद्वेलित किया था। उससे थोड़े अलग ढंग से पुतुल की कविताएँ भी वही काम कर रही हैं। वे बताती हैं कि आज भी कविता की तमाम संभावनाएँ जीवित हैं। हाइटेक हो चुकी हिंदी कविता को वे फिर से बता रही हैं कि अभी भी जीवन के लिए प्रकृति के पास वैसा ही विपुल वैभव है। पुतुल की कल्पना में ‘आज भी यह प्रकृति रंग भर रही है?’ 
उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!’ कविता में वह खुद को वैसी जगह ब्याहने की बात करती हैं, जहाँ खुला आँगन हो और मुर्गे की बाँग पर सुबह होती हो, जहाँ वह हर शाम पहाड़ी पर डूबता सूरज देख सकें। उन जगहों को वह सख्त नापसंद करती हैं जहाँ मन से भी ज़्यादा तेज दौड़ती हैं गाडि़याँ; जहाँ आदमी से ज्यादा ईश्वर बसते हैं। उन हाथों को भी वे नापसंद करती हैं जिन्होंने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया या बोझ नहीं उठाया, किसी का। इस कठिन समय में भी पुतुल को विश्वास है कि आग फैलेगी आदमी के जंगल में और खामोश समाधिस्थ पेड़ जल उठेंगे। उसे विश्वास है कि ‘उसकी बस्ती के बच्चे’ एक दिन ‘बहती बयार के खिलाफ’ ‘समय की रफ्तार से भी तेज दौड़ेंगे’। हिंदी की युवा कविता के सामने एक चुनौती की तरह हैं ये कविताएँ कि वो भी बहती बयार के खिलाफ अपने कदम उठाएँ कि ‘चाँद पर नाव’ चलाकर और ‘मिट्टी के फल’ खाकर हिंदी कविता का काम नहीं चलने वाला। कि 21वीं सदी में स्त्रियाँ झाडू-पोंछा के अलावा ढेर सारे काम कर रही हैं। वह किन्हीं ‘अधम कोनों’ तक सीमित नहीं हैं। कि ‘कुछ भी खाकर पवित्र गोबर नहीं दे रही हैं गाएँ (अनिमेष)’ बल्कि पाॅलिथीन खाकर बेमौत मर रही हैं।

Thursday, 14 May 2015

विमल कुमार - जनता का दुखडा

इस लगातार असंवेदनशील होते समाज में आदमी का दुख आज उपेक्षा की वस्तु बनता जा रहा है। पर दुख तो दुख है उसकी चिल्हकन छिपाए छिपती नहीं। बाजार की अमानवीय चमक के विरूद्ध दुखों की यह चिल्हकन अकेले पड़ते आदमी की लड़ाई की संक्षिप्त अभिव्यक्ति है। विमल कुमार की कविताएँ उसी दुख की अभिव्यक्ति हैं। उनके यहां पानी का दुखडा के नाम पर आम आदमी का दुखड़ा है-
कि अब तक सबसे ज्यादा भरोसा रहा
मनुष्य का सूर्य पर
पर सबकुछ इसी तरह चलता रहा 
तो धूप भी डरावनी हो सकती है।
धूप डरावनी हो चुकी है। पर्यावरणीय असंतुलन ने धूप की जगह अल्ट्रावायलेट किरणों के लिए स्पेस बढ़ाना शुरू कर दिया है और यह आदमी का वैश्विक दुखड़ा है-
वे इतने उद्यमशील हैं
कि संवेदनहीन हैं
वे इतने सभ्य हैं
कि हत्यारे हैं।
पत्रकारिता के पेशे में रहने के कारण विमल सत्ता और समाज के उस संतुलन बिंदु पर काम करते हैं जहाँ समाज के दुख की चिल्हकन सत्ता के सुखों के राग को हमेशा चुनौती देती रहती है। विमल की सबसे अच्छी व प्रभावी कविताएँ वहीं पैदा होती हैंवहाँ विमल समाज की इस चिल्हकन को समझने और उसके पक्ष में आवाज उठाने से कभी पीछे नहीं हटते। 'प्रिय संपादकजी,' 'व्यवस्था का प्रश्न', 'संसदीय गरिमा', 'नाम', 'परिवर्तन', 'रोने का विज्ञापन', 'खुशीआदि ऐसी ही कविताएँ हैं जिनमें आम आदमी का दुख व्यवस्था के प्रश्न के नीचे दम तोड़ता रहता है। व्यवस्था का प्रश्न सत्ता का सनातन डंडा है जो आम आदमी की जुबान जाबे रहता है-
देश में सारे सवाल
स्थगित कर दिए गए हैं
क्योंकि संसद में अभी
व्यवस्था का प्रश्न है।
''प्रिय संपादक जी'' विमल कुमार की प्रभावी कविता है जिसमें कवि मीडिया के जनविरोधी चेहरे को बेनकाब करता है-
प्रिय संपादक जी
सब कुछ छापिएगा
मगर सूखे की खबर मत छापिएगा
अगर छापिएगा...
तो यह मत लिखिएगा
सूखे के कारण भुखमरी है
कि भुखमरी के कारण लोग मर रहे हैं
इस तरह जनता का दुखड़ा विमल कुमार की कविताओं में बारहा अभिव्यक्त होता हैपर वह दुखड़ा ही रह जाता है, सत्ता के मुकाबिल वह एक ठोस चुनौती की शक्ल नहीं ले पाता है। इसका कारण संभवतया कवि का पेशा है जो उसे इस दुख को पचाकर उसे प्रतिकार के औजार में बदलने का मौका ही नहीं देता। 
अपने वैश्विक दुखों से त्रस्त इस समाज में विमल की कविताएँ ढाढस या आश्वासन की तरह हैं। पर इससे आगे जाकर वे परिवर्तन का औजार बनें इसके लिए जरूरी है कि अपने सृजनकर्म को ठोस रूप देने के लिए वे स्पेस पैदा करें। दुखों को तुरंत अभिव्यक्त करने की हड़बड़ी से बचें वे। कवि की हड़बड़ी ठोस रूप में भी दिखती है। वह इस बात का ध्यान तक नहीं रख पाता कि कहाँ क्या लिख रहाअपना संकलन वह ठीक से देख तक नहीं पाता। नतीजा कई जगह बातें दुहराता चलता है वह। पानी का मुखडा  संग्रह की 'मुखौटाऔर 'चार कविताएँमें एक पूरे पैरे को वह करीब-करीब ज्यों-का-त्यों लिख डालता है।
अपने जीवन दर्शन और नये विचारों द्वारा उसमें पैदा की जा रही खलल को भी कवि साध नहीं पाता शब्दों में। इससे कई बार जब वह कोई कथा रचता एक दर्शन अभिव्यक्त करना चाहता है, अंतिम वक्तव्य एक जुमले में बदलकर रह जाता है जो चौंकाता भर है-जैसे अंत में यह कहकर चलते बनना कि-''हमें मालूम है आप किनकी आँखों में चमक देखने आए हैं।'' यहाँ नमक की तुक चमक से मिल एक चमक पैदा करती है पर कविता अपने पूरेपन में बिखरी सी है। 
कुल मिलाकर कवि की ताकत यही है कि व्यवस्था के प्रश्न के मुकाबिल कवि अपनी उलझनों को कुछ ठोस सवालों की शक्ल दे पाता है और उसे आगे इसी पर ध्यान देना चाहिए। विचारक और दार्शनिक होने की जिद में जिस तरह वह अपने कवि को बेवजह दबावों में डालता है वह आगे उसके लिए परेशानी का कारक ही बनेगाविचार अंतरधारा की तरह बहें वही बेहतर हैउजबुजाकर प्रकट होने की बजाय।

Sunday, 10 May 2015

प्रतापराव कदम - ‘मेरे भूत भविष्‍य दोनों’ हैं

धूमिल ने कहा था कि कविता एक मुकम्‍मल बयान भी हो सकती है। अपनी बेधकता में प्रताप की कविताएं एक मुकम्‍मल बयान सी लगती हैं – 
तुम्‍हारे चमत्‍कार के चक्‍कर में
एक बालक चल बसा, पीछे-पीछे मां
बाप पागल सा बकता है आंय-बांय-सांय
तुम्‍हारी खोपडी में तुम्‍हारे खडाउं से लगाता नहीं चार...।
साधुओं, बाबाओं, बापुओं के बढ रहे पोंगापंथ पर खडाउं की यह मार जरूरी है। यह दुनिया किसी चमत्‍कार से नहीं चलती, चीजों का हिसाब-किताब साफ है। प्रताप के अनुसार ‘जीते जी का संसार यह’, नहीं तो आत्‍महत्‍या के बाद अनुकम्‍पा की चर्चा क्‍यों करते हितैषी। अपनी एक अन्‍य कविता में भी कवि कुछ ऐसे ही विचार व्‍यक्‍त करता है – जीते जी कैसा भी रहे हमारा व्‍यवहार/मरने के बाद श्राद़ध का ही चलन है।
मनोविज्ञान की अच्‍छी समझ है कवि को। घटनाक्रमों के बारीक आकलन से वह जीवन-जगत के जटिल प्रसंगों को एक सवाल की तरह ला खडा करता है, कभी-कभी। जच्‍चा–बच्‍चा वार्ड, दुम  ऐसी ही कविताएं है। इसमें वार्ड के आगे बैठने वाला चौकीदार हर बच्‍चे या बच्‍ची के जन्‍म पर मिलनेवाले इनाम को घटाता-जोडता हुआ उन्‍हें समझाता भी  है कि क्‍या फर्क है दोनों में पर फिर सोच में पड जाता कि उसके यहां भी चौथी जचगी है। जनमानस में चलने वाली रूढियों और विकासोन्‍मुख विचारों की टकराहट का अच्‍छा उदाहरण है यह कविता।
कवि में अपने परिवेश की हर स्थिति पर सवाल खडा करने की आदत है। यहां तक कि मुहावरों को भी सवाल की जद में खडा करने से बाज नहीं आता वह। आसमान टूट पडने के मुहावरे  को वह बडे रोचक ढंग से उठाता है कि - चमगादड को तो भ्रम है  जिस दिन नहीं होंगे पेड सचमुच आसमान ही टूट पडेगा। कवि के ढेरों वाजिब सवालों को जब ‘समय साला...हिकारत से देखता’ है तो खीज में कवि उसे गालियां देने से भी बाज नहीं आता। धर्म को लेकर जैसे सवाल कवियों को परेशान करते हैं वे प्रताप को भी परेशान करते हैं फिर उन सवालों को कवि जवाब की तरह सामने रख देता है कि ‘बकरा और दासी के बीच धर्म कहां’ है।
दिल्‍ली बलात्‍कार कांड के बाद जिस तरह देश भर में स्त्रियों के खिलाफ हिंसा बढी दिख रही है वैसी स्थितियों को लेकर कवि भी परेशान रहता है कि ऐसे मामलों में ‘कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक भारत एक है।‘ अखिल भारतीयता की यह विडंबना कितनी मार्मिक है, जिसके सामने विकास के तमाम दावे सफेद झूठ की तरह लगते हैं, कभी दिनकर ने लिखा था – ‘झड गई पूंछ, रोमांत झडे, पशुता का झडना बाकी है, उपर उपर तन संवर चुका, मन अभी संवरना बाकी है।‘ प्रताप भी लिखते हैं – ‘पशुओं की उतनी नहीं, जितनी हमारी बपौती है घृणा।‘
क्‍या विचारों के लिए भी अब औकात जानने की जरूरत पडने लगी है, ‘विचार’ कविता तो यही कहती दिखती है – तंगहाल के यहां जैसे/खूबसूरत समझदार लडकी/उसके गुरूर और परेशानी का सबब/वैसे ही उसके पास विचार। क्‍या वह समय बीत गया जब ‘महामारी की तरह’ फैलते थे विचार और सत्‍ता डोला करती थी उसके प्रताप से। एमएफहुसैन पर एक अच्‍छी कविता है प्रताप की जिसमें वे देखते हैं कि – या हुसैन हाय-हाय हुसैन/से बाहर है हुसैन की दुनिया।
’कुछ लोग’ कविता में समाज के कुछ ऐसे लोगों का चित्र है जो यूं तो पांत में पीछे, गौण से बैठे रहते हैं पर हर हारी-बीमारी-शोक की घडी में ढाढस की तरह बिना शोर-शराबे के हमारी बदहवासी को संभालने के लिए आगे चले आते हैं। आज के बदलते कातिलना माहौल में समाज की निचली पांत के प्रतिरोधी स्‍वर को पूंजी प्रसूत सभ्‍यता ने कैसा हास्‍यास्‍पद बना दिया है कि वे बिना नाडा के पाजामा हो गये हैं जिनकी पूरी ताकत अपनी लाज बचाने में ही खप जा रही, अपनी मुटठी वे कब कैसे तानें।

आज के इस ग्‍लोबल विश्‍व में धोखधडी भी ग्‍लोबल हो गयी है – ‘ साहब/अज्ञात से अखबार में/नौकरी का इश्‍तहार देंगे/एक ही आवेदन आएगा भतीजे का।‘ कुलमिलाकर निराशा की तमाम तस्‍वीरों के बाद भी कवि कह पाता है कि वह पानी का बुलबुला नहीं, उसके ‘भूत भविष्‍य दोनों’ हैं।

Tuesday, 5 May 2015

प्रकाश - वर्तमान के मुहाने पर भूत की शिला

युवा कव‍ि प्रकाश की कविताओं में जैसी उलटबांसियां बारहा मिलती हैं, हिन्दी की युवा कविता के लिए इस तरह की उलटबांसी नई है, पर भारतीय कविता और दर्शन ऐसी अलटबांसियों से पटा पड़ा है। दरअसल प्रकाश की कविताएं एक युवा की अपनी कथा कह न पाने की बेचैनी की कविताएँ हैं पर चूंकि यह कहना भूतकाल में है सो वर्तमान में यह संभव नहीं हो पाता। कविता में नयी जमीन तोड़ने का साहस नहीं है कवि में इसलिए अतीत का घटाटोप खड़ा कर देता है वह। क्योंकि अब अतीत का तो कुछ किया नहीं जा सकता।
यूं अपनी कुछ कविताओं में कवि अपने 'या'  के अबूझ दर्शन से बाहर आकर कुछ रचने की कोशिश करता है,  पर वहाँ वह झुककर नमस्कार करने या जो है उसे स्वीकारने के अलावा कुछ अलग नहीं कर पाता-'नदी भागी जाती है
सागर की ओर
पाँवों पर झुककर
लीन हो जाती है
यह नमस्कार की नित्य लीला है।
यह नदी आपके लिए नहीं है कविवर, सागर के लिए है। यह नमन आपका है, नदी की लीला नहीं? प्रकृति पर ऐसे आरोपन बहुत हैं संग्रह में और कथ्य का दुहराव भी। नदी सागर की ओर जाती है यह बात प्रकाश की कई कविताओं में है। मूलतः यह कथ्य अज्ञेय के यहाँ से आया है। 'कितनी नावों में कितनी बार' कविता संग्रह में अज्ञेय ने लिया है एक कविता में कि नदी सागर में मिल गयी, मैं किनारे पर खड़ा रह गया। इसी तरह संग्रह की कविताओं में 'या' की शैली में जो दर्शन उलटबांसी की रह टेरता है पाठक को वह भारतीय परंपरा की छायाएँ हैं, जिनका प्रभाव ग्रहण किया है कवि ने और उसे वर्तमान में पुनर्रचित ना कर पाता है तो 'या' की शैली में कह जाता है।
'सुनने के बारे में कुछ पंक्तियाँ', नामक कविता में कवि लिखता है- 
'सुनो वह
जिसे सुनने के द्वार पर
तुमने शिला लुढ़का रखी है
और एक भी दूब खिलने नहीं दी।
सही लिखा है कवि ने पर सत्य तो यह है कि कवि ने खुद वर्तमान के मुहाने पर भूत की शिला खड़ी कर रखी है। सुनने में कुछ विशेष प्रयत्न न था, कवि की पंक्ति है। यही कवि स्वभाव भी है। प्रयत्नहीनता कवि का मूलभाव है बस अतीत की छायाओं का संग्रहण हैं प्रकाश की कविताएँ है, सुनना है पर प्रयत्न हीन, सक्रियता नहीं है, जीवन नहीं है कहीं इनकी कविताओं से फड़कता या साँसें लेता।
हालांकि कवि को पता है कि सक्रियता ही आखिरी उपाय है, जीवित आदमी के लिए। 'धन्यवाद' कविता में वह बताता भी है कि बंद दरवाजे की कुंडी खोल खुले आकाश को धन्यवाद देना ही आखिरी उपाय था, पर कवि ने यह उपाय किया या नहीं उसका पता नहीं देता वह। यूँ है की शैली में जहाँ कवि कोशिश करता है अपनी प्रयत्नहीनता के बाहर आने की, वहाँ वह अच्छी कविता लिख पाता है। 'हँसी का बीज' जैसी ऐसी जीवंत कविता भी है प्रकाश के पास और उसे अपने इस बीज को आगे विकसित होने देना चाहिए, अतीत के भूत से पल्ला छुड़ाकर, तभी कविता में वह कुछ पन्ने जोड़ पाएगा।
'हँसना शुरू होते ही
मैदान में हँसी के बीज पड़ जाते हैं।
'
कवि को अपनी इस हँसी के श्रोत ढूँढ़ने होंगे। उसे अपनी भाषा का व्याकरण जो 'करता या करता था' की ध्वनियों से पूरित है, उससे बाहर निकलना होगा, तभी उसके दुखों का निस्तार होगा।