कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Wednesday, 30 December 2015

संजय कुंदन - मुक्तिबोध के बाद कुछ वैसी ही बहुविध बेचैनी

इसीलिए मैं हर गली में और हर सड़क पर झाँक-झाँक देखता हूँ हर एक चेहरा, प्रत्येक गतिविधि, प्रत्येक चरित्र, व हर एक आत्मा का इतिहास  - मुक्तिबोध- अंधेरे में। जैसे मुक्तिबोध के बाद उसी तरह की बहुविध बेचैनी से भरा कवि हिंदी कविता को मिलने वाला हो। यह बेचैनी यूँ तो आलोक धन्वा की लंबी कविता ‘जनता का आदमी’ में शिद्दत से मौजूद है और धूमिल की कविताओं में भी। ऋतुराज के यहाँ उसके बहुत गहरे रंग हैं और विद्यानंद सहाय के यहाँ भी वह दिखती है थोड़ी तुर्श। पर इस तथाकथित उत्तर आधुनिक होते समय में संजय कुंदन की कविताओं में अभिव्यक्त बेचैनी का मन्तव्य ज्यादा साफ है। वह अतीतवेत्ताओं की शास्त्राीय बन चुकी बेचैनी (चिंता) नहीं है। वह केवल अपनी राह बनाने को उद्धत बेचैनी नहीं है, बल्कि ढेर सारे बंद रास्तों को खुलवाने के लिए लगातार चोट करती बेचैनी है। संजय की कविताओं में अपने समय के दुः-दिवास्वप्न साफ देखे जा सकते हैं। उनकी मुखालफत भी वहाँ साफ देखी जा सकती है। सिक्कों की कातिल झनकार वहाँ कवि को बराबर परेशान कर रही है तो दूसरी ओर घर का पारंपरिक स्वरूप उसे लुकाठी ले बहराने को मजबूर कर रहा है। और कवि इस सबसे दो-दो हाथ करता दिखता है। एक सच्ची जिद के बिना क्या कविता का होना संभव है, शायद नहीं। ऐसे में जब आज के अधिकांश कवि अपने समय की दुश्चिंताओं को लेकर इस कदर परेशान हैं कि उनकी चिंताएँ रिरिआहट में बदल रही हैं, संजय कुंदन साफ-साफ लिखते हैं कि इस ‘जिद’ को उन्होंने चुना है-
दुख बार-बार मुखौटे बदल-बदलकर आता है हमने ही दीं उसको ये भूमिकाएं हमने ही न्यौता उसे
हम चाहते तो सीधे रास्ते चल सकते थे अपने पूर्वजों की जलाई आग को अगोरते हुए... 
अगर तालियाँ बजाई होतीं एक विदूषक की मुद्राओं पर तो शायद मिल जाती कुर्सी...
पर हम तो जीभ निकाल उसे चिढ़ाते रहे...। (जिद्दी) 
अपने समय के विदूषकों को पहचान उसे ‘जोकर’ की संज्ञाएँ तो कई कवियों ने दी हैं पर उनमें से अधिकांश उसकी भंगिमाओं से त्रस्त दिखते हैं, यह कुंदन हैं जो भयभीत ना हो विदूषकों को ‘जीभ बिराते’ हैं। अपने समय की सांस्कृतिक दरिद्रता को भी कुंदन पूरी ताकत से उकेरते हैं। बाजार का सौंदर्यशास्त्र चारों ओर पसरता जा रहा है और सिक्कों से अहमकाना मुहब्बत के इस बाजारू दौर में भी कवि हमेशा एक नई सजी-धजी किताब पाने को उद्धत दिखता है- मेरी जिंदगी से लुप्त होती जा रही हैं किताबें जैसे रक्त में कम होता जा रहा हो लोहा- एक बिल्कुल नयी सजी-धजी किताब तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है चलो उसके पास... (किताबों के बगैर) 
अपने समय से जूझता हुआ कवि बार-बार चोट खाता है पर उसकी आशा मरती नहीं है वह खुद को एक भरे-पूरे झुके पेड़ की तरह महसूसता है। और ये आत्म-विश्वस्त मुद्राएँ समय को खिजाती हैं- वह चाहता है उसके इशारे पर रातों रात बदलें मेरी मुद्राएँ... ...वह खीझता है कि मेरे सिरहाने में एक बाँसुरी और वर्षों पुरानी इच्छाएँ पड़ी रहती हैं अब भी... (यह समय) 
‘घर’ कुंदन की कविताओं में एक दुःस्वप्न की तरह आता है। जिससे वह अपने ढंग से लड़ता है और उसकी रूढि़यों को परिभाषित करता है। इसके बावजूद वह बोहेमियन नहीं होना चाहता है बल्कि एक छोटे-से अपने घर की इच्छा भी वह भीतर दफन रखता है। घरों में नहीं रहते विचार एक जिद्दी शब्दकोश रहता है वहाँ जो डरता है पंख फड़फड़ाते एक नए शब्द से... मध्यवर्गीय घर के रूढि़वादी चेहरे को इससे पहले इतने साफ व तीखे ढंग से सामने नहीं लाया जा सका है- जब घरों में रहने लगते हैं विचार एक निरीह बूढ़ा उतरता है युद्ध के मैदान में ...विचार के खिलाफ पहले वह रूदन को हथियार बनाता है फिर देवताओं को, पूर्वजों को फिर अपनी हड्डियों को वज्र में बदलने को तैयार अपनी मृत्यु को हथियार बनाता है... और अंत में एक नौजवान सुलगती हुई लुकाठी की तरह धुंधुआता हुआ निकलता दिखाई देता है घर से बाहर। (घरों में नहीं रहते विचार) 
इस रूढि़वादी घर को कवि बदलना चाहता है विचारों की ताकत से, उसे बलपूर्वक तोड़ना नहीं चाहता है वह- सबसे पहले तोताराम को बाहर किया गया उस घर से... उस लोटे को देश निकाला मिला जिसने अब तक बचाकर रखा अतिथियों के लिए थोड़ा जल। (बदलता हुआ घर)
इन घरों के बावजूद कवि को ‘एक और घर की तलाश’ भी है- मुझे तो बस एक छोटा-सा घर चाहिए... जिसमें एड़ी धंसाकर कह सके मेरी आत्मा यही है मेरी डीह। ‘सचमुच का पहाड़’ कुंदन की आरंभिक कविताओं में एक है- कितना अलग है सचमुच का पहाड़ लगता है जैसे/साँस ले रहा हो। सौंदर्यदृष्टि के लिहाज से यह कुंदन की सबसे सुंदर कविताओं में है। दिल्ली जैसे महानगर में रपटते हुए वह अपने एक छोटे-से घर की इच्छा बचाए हुए है और बचाए हुए है ‘सचमुच का पहाड़’। इस सचमुच के पहाड़ को वह पहचानता है आज भी, कि वह ‘कितना अलग है।’ कितने अलग इस सचमुच के पहाड़ को पहले देखा था कवि ने कभी, अभी देखें तो वह इसी पहाड़ की चढ़ाई पर है। कभी अगर वह इसे विजित कर सका तो वह एक बार फिर अनुभव करेगा, कि कितना अलग था वह सचमुच...।

Thursday, 24 December 2015

रघुवीर सहाय की स्त्री की अवधारणा और समकालीन कविता


'' रघुवीर की कविताओं में यथार्थ उनके अपने अनुभवों तक सीमित रहता है, यहाँ तक कि अक्सर यह लगता है कि वह उन्हीं से परिभाषित भी होता है।...उनकी अधिकांश कविताओं में अगर स्त्री का करुण या दयनीय रूप ही उभरता है तो यह उनके यथार्थबोध पर एक विपरीत टिप्पणी भी मानी जा सकती है। एक बड़ा कवि सिर्फ अपनी ही तरफ और एक ही तरह नहीं देखता; अपने चारों ओर, दूसरों की तरफ और दूर-दूर तक भी देखता है। '' - कुँवर नारायण
जीवन की विडम्बना से ज्यादा विस्मय बोध के कवि सहाय जी के विस्मय की जड़ में कहीं न कहीं हल न ढूँढ़ पाना ही होता है। ‘‘गदराई लड़कियों/बच्चों में विस्मय क्षण भर को भर दो।’’ महानगर के बाहर आ देखें कवि, लड़कियाँ गदराती कहाँ हैं, और उनकी आँखों में जो विस्मय है वह अज्ञान नहीं उसका छल है। उसी एक भोलेपन के, विस्मय के छल के भीतर वे छुपाती हैं अपनी दारुणता, अपना धैर्य। रघुवीर सहाय के साथ कविता का अंत कर ही रह जाते सुधीश पचैरी, तो भला था, पर वे कविता को इतिहास में जाता देखते हैं और स्त्री को काली, दुर्गा का अवतार बता उसकी असहायता का महान दुख उनकी कविता में देखते हैं। भई, स्त्री असहाय और दुर्गा एक साथ कैसे हो जाती है। वे दिखलाते हैं कि किस तरह सहाय जी गरीब लड़की की व्यथा से साक्षात्कार कराते हैं- एक लड़की जिसकी बाढ़ मारी गई है डर के मारे नहीं बताती मुझको यह अपना दुख। पचैरी बताते हैं कि जैसी अमूर्त सहाय जी की कविता है वैसा ही अमूर्त यह दुख है। जिसे लड़की समझा नहीं सकती। उनके अनुसार औरतों का खत्म होता भविष्य सबसे पहले सहाय की कविता में दिखता है। तो वह दुर्गा किसकी खोज है। यहाँ डर का कारण अमूर्तता है या परिवेश, वेश-भूषागत अलगाव। स्त्री की करुणा का बेहतर स्वरूप आज के युवा कवियों मदन कश्यप, विमल कुमार की कविताओं में नज़र आता है। वहाँ केवल आतंक नहीं एक अन्वेषण भी है। मदन कश्‍यप - एक का रोना सुनती हैं स्त्रियाँ और रोने लगती हैं रोने लगती हैं स्त्रियाँ कि क्या उनकी अपनी व्यथा ही कम है रोने के लिए। या विमल कुमार के यहाँ देखें- वे किताबें पढ़-पढ़कर आँखें फोड़ती रहीं फिर भी अनपढ़ कहलाईं। ‘पढि़ए गीता बनिए सीता’। 
 विडम्बना बोध की स्पष्ट कविता भी सहाय जी ने लिखी है। वही उनकी सीमा भी है। जबकि आलोक धन्वा, अरुण कमल के यहाँ स्त्रियाँ इस मध्ययुगीन असहायता से मुक्त होती हैं। सहाय जी के यहाँ वह चित्त ही रहती हैं। हम रोटी और फल बचाएँगे यह उसके सीने में एक दिन उदय होगा। यह जिलाने की, बचाने की मनोवृत्ति कैसी है? आज भी इस दया की जरूरत है या उसे पूरा साथ; पूरा अधिकार चाहिए। क्या फल इसलिए बचाएँ कि उभर आए सीना और भोग्या तैयार हो! वह था उसका सीना आँखों के सामने उसकी अकेली असहाय और गैरबराबर औरत का वह सर्वस्व था और मेरे बहुत पास। सहाय जी का दर्द गजब क्यूँ हो गया है! ‘असहायता सीने में क्यूँ है? असहाय लड़की गदरा क्यूँ जाती है? आँखों में उसकी विस्मय क्यूँ आ जाता है? लड़की का सीना तो घास-भूसा खाकर भी गदरा जाता। ये लड़कियाँ मायकोवस्की की सात साध्वियाँ तो नहीं हैं। जरूरत है कि कवि की दृष्टि सीने से उठकर आँखों में देखे। वहाँ विस्मय नहीं, पीड़ाएँ ढूँढ़े, सामथ्र्य ढूँढ़े। अरुण कमल की कविता में जब मजदूरन कवि से लगकर सोती है, तो उसे तो डर नहीं लगता। आलोक धन्वा के यहाँ भी स्त्रियों का सामथ्र्य दिखता है। वे असहायता के कारण नहीं, अपनी सामथ्र्य के कारण जलाई जाती हैं। वे रुकी, गदराई, विस्मयबोध ग्रसित, अजूबी स्त्रियाँ नहीं हैं। वे गतिशील हैं। उनकी गतिशीलता से ग्रसित डरा वर्ग है जो हमलावर है। यह हमला प्रमाणिक है, वह विकास प्रमाणिक है। यह कविता का ही नहीं हमारे जीवन का भी सच है। वे अचानक कहीं से नहीं बल्कि नील के किनारे-किनारे चलकर पहुँची थीं यहाँ तक। ये कविताएँ यह छूट नहीं देतीं कि आप आदि-मध्य, अन्त से बचाकर उनकी व्याख्या करें। श्रम, समय, समाज से जोड़कर ही इनकी व्याख्या संभव है। शायद इसीलिए पचौरी के सुविधापरक घेरे में ये कवि नहीं आ पाते। स्त्री को एक जाति के रूप में पेश करते-करते सहाय जी उसका साधारणीकरण करने लगते हैं। वह माँ, बेटी, पत्नी क्यूँ नहीं होती। कहीं उसकी चीख नहीं होती। जबकि आंकड़ों में सबसे ज्यादा वह दिल्ली में ही जलाई जाती है। त्रिलोचन ‘चम्पा’ और ‘चित्रा जाम्बोरकर’ से चरित्र रचते हैं। ‘एक सूरज माँ के लिए’ में कुमारेन्द्र पारसनाथ उसके श्रम को दर्शाते हैं। सहाय जी ऐसा कुछ नहीं कर पाते। वहाँ अमूर्तता की जातीय अवधारणा के सवाल से काम चलाया जाता है। यह अनामता, शक्लहीनता समाज सापेक्षता की गहन कसौटी से बचाव का तरीका नहीं तो और क्या है। तब पचैरी बताएँ सहाय जी के यहाँ नारी संपूर्णता में कहाँ आ पाती है? ‘भागी हुई लड़कियों’ से लेकर ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ तक आलोक धन्वा जो एक समर्थ नारी चरित्र रचते हैं, क्या वह आधुनिक नहीं। स्पष्टतः नारी की जातीय अवधारणा: अमूर्तता व उससे जुड़े सवालों से बचने की मुद्रा है। वह उसके श्रम की ताकत को मापना नहीं चाहते। क्या किसी की पहचान मिटा देना ही आधुनिकता है।
मैं ऐसा नहीं कहता कि सहाय जी ने नारी की बाबत नया नहीं लिखा, पर सबल नहीं लिया। एक डर, एक हाय उससे जुड़ी है। वह भी उलझी हुई। जबकि हिंदी की युवतर पीढ़ी की कविता में नारी की जुझारू छवि उभरती है। जो अपनी शैली में भी महत्त्वपूर्ण है। गोरख की ‘कैथरकला की औरतों’ से लेकर निलय की ‘रामकली’ तक इसका उदाहरण हैं। छोटे-छोटे ही सहीे नारी के गतिशील चरित्र बनते हैं। उनकी सपाटता सहाय जी की आदि-अंतहीन सपाटता से बेहतर है। ये गतिशील नारी चरित्र विकास की राह में मील के पत्थर हैं। जबकि सहाय जी के यहाँ नारियों की ‘कचोट और कुंठाओं से अमीर होता’ उनका कवि है। इन कुंठाओं को तोड़ने का प्रयास वहाँ नहीं मिलता। अपने जीवन में तो वो सामर्थ्‍यवान पुत्रियाँ पैदा करते हैं। पर कविता में समर्थ चरित्र क्यों नहीं रच पाते। ‘वह जवान थी उसके जिस्म में जान थी/ पर क्या चीज टूटी पड़ी थी उसके चेहरे में’‘थोड़ा-सा गोश्त और वह ज़रा ताकतवर हो जाती/ देह से।‘तब मैंने देखा कि उसे इतने करीब/पाकर यह क्या हुआ इतना अजीब दर्द।’ इन पंक्तियों पर गौर करें। जान थी तो थोड़ा गोश्त क्यों चाहिए, थोड़ा साहस क्यों नहीं चाहिए। ताकत देह से क्यों, मन से क्यों नहीं चाहिए। सुबह से शाम हाड़ तोड़ती औरतों के पास ताकत की कमी नहीं, मानसिक हौसले की जरूरत है। उसके अजूबे दर्द को समझने की जरूरत है। जब वह घुटने मोड़ कर करवट लेटी हो तब देखोगे कि तुम देख रहे हो कि उस पर अन्याय होंगे ही। ‘पर उसका चेहरा उसका विद्रोह है/ यह कितनी कम औरतें जान पाती  हैं।’ आप जब अन्याय होते देख रहे हैं तो उसे अपने विद्रोह के बारे में कौन बताएगा?  
यहां घुटने की असहायता, चेहरे के विद्रोह को पूरी तरह बाँट कर अपनी सुविधा के लिए उपयोग किया गया है, ऐसा नहीं लगता क्या? रघुवीर सहाय की ‘तारसप्तक’ की कविताओं में स्त्री और प्रकृति के प्रति वैसी असहज दृष्टि नहीं मिलती। उनमें एक सरलता, कच्चापन और मिठास मिलती है। 1950 के आसपास वे लिखते हैं-‘वसंत’ कविता में- पकी फसल सा गदराया जिसका तन अपने प्रिय को आता देख लजायी जाती। या और कभी जब गौरैया-सा मन घर के आँगन में खेलने का हुआ मैंने थामा उसे कह के बचपना न करो। पर 1960 में ‘सीढि़यों पर धूप में’ के प्रकाशन तक लगता है अज्ञेय का असर होने लगा था। उनकी सहजता टूटने लगती है। वे एक नई समझ पाते हैं जिसमें नारी की अकुलाहट या बेचैनी क्षुद्र लगने लगती है। वह कवि की महान करुणा से जुड़कर ही ऊपर उठ सकती है। सयाने कवि का मन गौरैया-सा नहीं रह जाता। वह कर्मठ हो जाता है और सलज लड़की, छोकरी में परिणत हो, मसखरा बन जाती है। स्वेटर बुनने की अनन्तता में दुनिया एक चिपचिपी चीज़ हो जाती है। यह भी कोई काम है, पुरुषों को गर्मी पहुँचाना उनका नैतिक दायित्व जो है। यहाँ मलयज की ‘प्रेम’ और ‘लड़की’ कविता द्रष्टव्य है- बंद अंधेरे में दो सफेद चमकते बटन थोड़ा-सा लाल फन थोड़ा सा नीला और कुछ बुनने को मचलती दो सुनहली सलाईयाँ। (या) जैसे पशु पर गर्म लोहे की मुहर लगा दी जाती है उस कमसिन लड़की की गोद में एक बच्चा आ गया। ऊपर भी तो स्त्री के प्रेम, करुणा का ललित व यथार्थवादी दो चित्र सामने है, क्या वह पिछड़ा लगता है। पर सहाय की कविता में अब बक-बक करती स्त्रियाँ प्यारी लगने लगती हैं और प्रेम ऊब का खेल हो जाता है। साली में नयापन मिलता है। और तन से क्षुधित मन से मुदित नारी अंत में चित्त हो जाती है। उसकी अभिव्यक्ति का कोई भी ढंग कवि को गुस्सा दिलाता है। देखें- चिटखती क्यों हो एतना गुस्सा! बोसा भी तो नहीं लिया है सिर्फ बुस्सा।
अब 1980 के बाद की कविताएँ देखें- हाँ, मारी नहीं गई तो विधवा रोती है। क्या आज भी विधवा के पास मृत्यु के सिवा कोई विकल्प नहीं है। अभी औरत की आज़ादी सहने लायक नहीं हुआ है पुरुष और कविता पश्चिम की तरह आधुनिक हो गई। क्या हत्या की संस्कृति का पर्दाफाश करने को केवल स्त्री ही मिलती है। और वे भी राजकमल की तरह पतिव्रता और रखैल के द्वंद्व में उलझ जाते हैं। ‘पागल औरत’ कविता में पागलपन के कारण क्या हैं? कौतूहल में मोटर संभालते कवि को ‘चदरा खोले नंगी स्त्री’ का नंगापन ज़्यादा दिखता है, वे लिखते हैं- पागल विरोध में तन खोले रहता है जुल्म की शक्ल सिर्फ औरत बताती है। ‘रंगों का हमला’ कविता में तो कवि जुल्मी की शक्ल दिखाने की बात कहता है फिर किस मजबूरी में वे औरत में जुल्म की शक्ल खोजते हैं। तब रिकार्ड खत्म इस तरह हुआ जैसे पतुरिया ने महफिल में झुककर सलाम किया हो। यही है औरत की महान जातीय अवधारणा, कि एक रद्दी-सी चीज के  जस्टिफिकेशन के लिए कवि को; औरत का यह पतित रूप मिलता है। पतुरिया की जगह भड़ुआ या लौंडा शब्द भी आ सकता था। उससे पुरुष के अहम को ठेस जो लगती। पर भड़ुआ शब्द में पतुरिया-सा सौंदर्यबोध कहाँ मिलता, मुँह का जायका ही बिगड़ जाता। रघुवीर सहाय की महानगरीय मनोवृत्ति, जो उन्हें अकेला करती जाती है, का प्रमाण ‘हम दोनों’ कविता भी है। जिसमें अहम और प्रेम का सामंजस्य खो जाता है। फिर पत्नी के साथ सोना भी बड़प्पन में बाधक लगता है, जिसे वे थकान और युद्ध जैसे शब्दों से ढंकना चाहते हैं। दिन भर संग्राम में करता हूँ युद्ध मैं, रात को, अकेला मुझे छोड़ दो, कहता हूँ मैं तुम भी यही कहती हो। सहाय की इस आधुनिकता का अंधाधुंध प्रयोग असद जैदी के यहाँ भी देखा जा सकता है। असद के पहले संग्रह की स्त्री में उसके प्रति एक तन्मयता है। बहनों की दारुणता कतर लेती है हमारा धैर्य, हालाँकि वहाँ भी अंत में वह अति उदात्त होे स्त्री की पारंपरिक अवधारणा से जुड़ जाती है और हमें भावुक और कमजोर करती है। बावजूद इसके कविता का पक्ष प्रबल होता है वहाँ। ‘आयशा के लिए कविताएं’ 13  की पंक्तियाँ हैं- पत्थर धूल चीड़ और धोक और तेंदू उभरे उन;;;;के बीच से गुजरती लौटी फिर एक बार आयशा मैंने कहा था उठो जीवन सहना दुश्वार था और तुम मेरे विषय मेरे समय मेरे संग्राम मुझसे अब नहीं होगा समीक्षा का काम। यहाँ आयशा के लिए जो उन्मेष है, संग्राम का, उसकी तुलना सहाय जी के जुदाकारी संग्राम से करें तो बातें स्पष्ट होती हैं। पर दूसरे संग्रह में असद के यहाँ भी सहाय जी का स्त्री के प्रति जो उखड़ा-राग है वह चिलकने लगता है ‘और उन्हें एक विवाहिता प्रौढ़ा पर प्यार आने लगता है।’ 

Tuesday, 22 December 2015

लीना मलहोत्रा राव - सपनों के गर्म बाजार में इच्छाएं


विष्णु खरे ने हिंदी कविता को करुणा की अकर्मण्य लय से मुक्त किया था तो सवितासिंह ने प्रेम की रूढि़यों को पहली बार पहचाना था, अब लीना मलहोत्रा राव की कविताएं उस पहचान को आगे बढ़ाती दिख रही हैं-
‘‘आह! मुझे तुमसे नहीं
उन दिनों से प्रेम था
बहने से प्रेम था, उड़ने से प्रेम था, डूब जाने से प्रेम था’’  
या कह सकते हैं कि जीवन से प्रेम था। प्रेम को जहां से हम जीवन से काट कुछ जुदा आभासी शै के रूप में सामने रखना चाहते हैं वहीं से वह जड़ होने लगता है, रूढि़ बनने लगता है। इस जड़ता को पहचानने के लिए अपनी चाहत और मोह पर नियंत्रण पाना होता है, तभी हम सामने वाले को उस रूप में देख पाते हैं, जो कि वह है, तभी हम उसकी वस्तुस्थिति को उसे बता उसके साथ न्याय कर पाते हैं, बजाय इसके कि अपनी आकांक्षा और खुशफहमियां उस पर थोपकर, तराशकर उसे जड़-चमकीला पत्थर या मूरत बना देने के। लीना के पास अस्वीकार का साहस और और स्वीकार का विवेक है। प्यार और विवाह के नाम पर एक खूंटे से बंध जीवन जीते उसके कशीदे काढ़ना उनके वश का नहीं। वे जीवन को उसके तमाम संदर्भों में स्वीकार करती हैं और कह पाती हैं- 
‘‘नहीं बन पाई सिर्फ एक भार्या, जाया और सिर्फ एक प्रेयसी
नहीं कर पाई जीवन में बस एक बार प्यार।’’
यहां हम आलोक धन्वा को याद कर सकते हैं, जो पूछते हैं कि क्या तुम ब्याह लाए एक स्त्री को और एक ही बार मेें खरीद लाए उसकी तमाम रातें, उसके निधन के बाद की भी रातें। यहां महत्वपूर्ण यह भी है कि परंपरा की घृणाको अनदेखा करने का यह विवेक एक क्षमाभाव लिए हुए है-
‘‘नदी की लहरों! 
मैं नहीं बन पाई मात्र एक लहर..
तुम्हारे जैसा पानिग्रहण नहीं निभा पाई मैं 
इसलिए क्षमा मांगनी है तुमसे।’’
आज जब मध्यवर्ग की मिट्टी पलीद हो चुकी है, उपभोक्तावाद उसकी चेतना की जड़ में मट्ठा डाल चुका है, लीना उसके अंतर्विरोध को सामने लाती हैं- ‘‘...आलमारियों में बंद सोने-चांदी और हरे नोट/ सिर्फ डर, चिंता और उपभोक्ता ही पैदा कर सकते हैं/ ...उनके पसीने से भरे चेहरे और मैले कपड़े उनकी गरीबी का नहीं/ बल्कि उनके बीच एक अनोखे समाजवाद की घोषणा करते हैं/ और हमें उनके जैसा होने के लिए सिर्फ धूप और मिट्टी चाहिए।’’
लीना की खूबी यह है कि क्रांति की रौ में वे खुद को एक मीडियाकर परचम नहीं बन जाने देतीं, बल्कि धूल-मिट्टी में धंसकर उसे जानने-समझने और उसमें घुलने-मिलने का साहस दिखाती हैं। यह साहस उन्हें नया जीवन देता है, अनजाना सुख देता है। शहर की बिल्लियों से उनकी दोस्ती हो जाती है और साइकिल रिक्शावाला उनका आत्मीय हो जाता है और भरोसे के कितने ही फूल अचानक खिल उठते हैं।’’
इस धूल-मिट्टी-गर्द से भरे जीवन में जब वे धंसती हैं, तो केवल अपने लिए नई अनजानी खुशियां ही नहीं तलाशतीं, वहां छुपे दर्दो-गम भी पाती हैं-
‘‘उनके सपनों के गर्म बाजार में/ नंगे पैर चलकर इच्छाएं घुसती हैं उनींदी आंखों में/ ईश्वर की उबकाई से लथपथ पत्थर पर लेटे हुए।’’
यहां विजय कुमार याद आते हैं जिनके यहां शहरी फुटपाथ के बच्चों के दुख दरारों से झांकते नजर आते हैं और आता है ईश्वर विडंबनाओं से घिरा, लाचार। 
लीना की कविताओं पर वरिष्ठ कवि विजेंद्र लिखते हैं- ‘‘आज आम आदमी में विदू्रप दुनिया को नष्ट करने की आंचभले न हो। उसमें उजाला फैलाने की चिनगारीजरूर है। इसी अर्थ में लीना समकालीन हैं। लोकधर्मी हैं। संघर्षशील हैं।’’ लीना की यह संघर्षशीलता हमारे वरिष्ठ कवि आलोकधन्वा और विजय कुमार की परंपरा में है और यह हमें आश्वस्त करता है।

Sunday, 20 December 2015

अनीता वर्मा - आपका इतना साजो-सामान ही क्यों हो


सुखी घर के लिए हर सामान बिकता है यह बात सब छिपाते हैं कि उनसे जीवन का क्या बनता है। अनीता वर्मा  की ‘इस्तेमाल’ कविता की ये पंक्तियाँ कवयित्राी के मनो-मिजाज के बारे में बहुत कुछ बताती हैं। बाजार के मुकाबले जीवन की सच्चाई को वे तरजीह देती दिखती हैं, यहाँ। हालाँकि यह सच्चाई बहुत कम जगह इतनी साफगोई से सामने आ पाती है अनीता के यहाँ। इसके बरक्स आत्मा का भूरा-नीला प्रकाश ज्यादा फैला है, वहाँ। संग्रह की पहली और अंतिम कविता ‘प्रार्थनाएं’ है। ‘प्रार्थना’ कविता में वे लिखती हैं- भेद मैं तुम्हारे भीतर जाना चाहती हूँ।’ यह जानी हुई बात है कि भेद को मात्र उसे जानने की प्रार्थनामय इच्छा से नहीं भेदा जा सकता, इसके लिए जिजीविषापूर्ण जिज्ञासा की जरूरत पड़ती है। परअनीता की कविताएँ यह जाहिर करती दिखती हैं कि कवयित्राी को रहस्यों की कुहेलिका ज्यादा रास आती है। ‘मंच’ कविता में वे लिखती भी हैं- सब कुछ देख लेने से रहस्य खत्म हो जाता है और सबकुछ दिखाया नहीं जा सकता...।’ लगे हाथ ‘विज्ञापन’ कविता में वे पर्दे के पीछे का सच दिखाने की माँग भी करती हैं- सब कुछ दिखता है कहकर भी पर्दे के पीछे का सच नहीं दिखाया जाता।’ जबकि ‘मंच’ कविता में वे नेपथ्य की वकालत करती दिखती हैं- और सब कुछ दिखाया नहीं जा सकता इसलिए मंच के पास होता है नेपथ्य।’ लगता है दिनकर वाली समझदारी की कायल हैं अनीता। ‘संसद में’ कविता में दिनकर लिखते हैं।-‘...जब होता हूँ जहाँ उसी ध्रुव से बोला करता हूँ...।’ संदर्भ का बहाना तो मिल ही जाता है। हो सकता है, यह सब कवयित्राी के अनजाने हो रहा हो, पर उसे जानना तो पड़ेगा। 
क्योंकि चाहे आत्मा का ‘भूरा-नीला प्रकाश’ जितना भी चैंधियाए, रुख से नकाब तो हटानी पड़ेगी, नहीं तो ‘रिक्शावाले की फटी कमीज’ तो खलल डालेगी नींद में और वहाँ आप उससे प्रभु की दिव्यता का उपहास उड़ाकर मुक्ति नहीं पा सकतीं। क्योंकि आप ही के शब्दों में- मैंने समय को दे दी है मात निकल आई हूँ उसके भारी लबादे से इस खुले सुंदर संसार में...। (अब भी विरोध) जब तक रिक्शेवाले की कमीज आपकी नींद में टेबुल साफ करने का कपड़ा बनती रहती है, आप किसी भी समय को मात देने का दावा कैसे कर सकती हैं? समय को मात आप अपने बूते देती हैं, पर रिक्शेवाले को देख पैदा ग्लानि से मुक्ति प्रभु का उपहास दिलाएगा! कैसी विडंबना है! 
दरअसल यह गड़बड़ी दृष्टि के उलझाव से होती है। रघुवीर सहाय भी ‘घोड़े’ और ‘सवारी’ को साथ-साथ बिठाने की कला विकसित करने में लगे थे जबकि इसका हल लोहिया के पास था। राजनीति विज्ञान के हमारे प्राध्यापक लोहिया को याद करते रहते थे कि लोहिया जब स्टेशन आते तो लोग टमटम खोजने दौड़ पड़ते थे। उनका कहना था कि-‘आदमी आदमी को खींचे, यह मुझे बर्दाश्त नहीं होता।’ यूँ घोड़ा ही क्यों खींचे? आपका इतना साजो-सामान ही क्यों हो कि किसी दूसरे को खींचना पड़े? खींचने भर सामान लेकर आप कोल्हू के बैल की तरह चक्कर लगा सकते हैं, किसी यात्रा पर नहीं निकल सकते। 

Friday, 18 December 2015

इंदु जैन : जीवन की मुठभेड़ से पैदा आलोक

ऐसे में जब हिंदी की युवा कविता पीढ़ी एकांतिक संलापों को तरजीह देती विचारहीनता की सीढि़याँ चढ़ रही है, सत्तर की उमर को छूती कवयित्री इंदु जैन की कविता में जीवन की मुठभेड़ों से पैदा आलोक काफी आश्वस्त करता है। इंदु जैन को पढ़ते हुए यह साफ होता है कि जब पुरुषों की दुनिया में विचारों का दिवाला निकल चुका है, स्त्रियों के यहाँ विचार अपनी जमीन तलाश रहे हैं। ‘दृष्टांत से परे’ कविता में वह लिखती हैं - खतरा टलने के बाद भी जमीन के नीचे घंटी बज रही है माक्र्स करवट ले रहा है भूख में धर्मांधता में...। पुरुषों की असीमता के मिथक को चुनौती देती ‘चुना था उसने’ कविता में वह स्त्राी अस्मिता को नए ढंग से परिभाषित करती हैं: उनकी लंबी बाँहों से कहीं लंबी हो रपट निकली नदी अपने किनारे तोड़ती-बनाती
निःसीम आकाश को उसके अपने विस्तार में बंधा छोड़कर। स्त्राी की अस्मिता के साथ वह कविता को भी नए ढंग से परिभाषित करती हैं। ‘कविता’ शीर्षक कविता में वह कहती हैंµ कविता हिम्मत नहीं दिलाती कभी-कभी हिम्मत न कर पाने वाले की सिर्फ आवाज बन जाती है...। ऐसे समय में जब साहित्य के सठियाए हुए दिग्गज अपने-अपने सिद्धांतों पर ही सवारियाँ गाँठ रहे हैं, इंदु जैन सवाल खड़े करती ‘चलोगी?’ कविता में कहती हैं- जहाँ तुम्हारी सदाशयता बेमानी है दिमागी ऐय्याशी? ...क्या करोगी वहाँ जाकर जहाँ क ख ग पढ़ने के बाद भी चिट्ठी नहीं आती। ‘जिन्स’ कविता में वह बाजारवाद के हमलों को शिद्दत से पहचान उन पर तीखे प्रहार करती हैं: एक दिन तय हुआ हवा- हवा नहीं रहेगी आजादी बोतलों में बिकेगी। भूमंडलीकरण के शोर-शराबे के भीतर किस तरह बाजार ने अपने दस्तूर बदल लिए हैं और किस तरह उसकी भूमिका एकाँगी होती चली जा रही है- इसे इंदु जैन अच्छी तरह पहचानती हैं: पहले बाजार को देते थे और लेते थे अब हजूम देता है- खुद को निचोड़कर और लेता है कोई अदृश्य... (नए कायदे) नई सदी किस तरह तेजी से प्रकृति को नष्ट करने के उद्यम में लगी है, सब कुछ मशीनी होता जा रहा है, उससे कवयित्राी चिंतित हैं। वह मानती हैं कि यह अर्थ दोहन एक दिन सब कुछ नष्ट कर डालेगा और व्यक्ति आदिम व्यवस्था में लौट जाएगा। सूरज धुएँ के पीछे हंसेगा समुद्र सोखता हुआ मूर्ख मनुष्य पर जानता है आदमी एक न एक दिन आदिम प्रार्थना में झुकेगा। (निश्चय) प्रकृति से गहरा लगाव है कवयित्राी को। वह मात्रा प्रकृति के दोहन के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाती हैं, बल्कि खुद उसमें रमती भी हैं। वह देखती हैं कि प्रकृति में कुछ भी असार नहीं है, ठूंठ और खोखल भी नहीं। वे भी जीवन के स्रोत हैंµउनकी अपनी भूमिका है। विकलांगता नहीं है प्रकृति में, एक पूरक अवलंबन है हर जगह: ठूंठ भी बसेरा है किसी न किसी का खोखल भी मृगशावक चर लेते झरी पड़ी पत्तियों का हरा हिस्सा...। मृत्युदंड देने की प्रक्रिया पर कवयित्राी के विचार मानवीय हैं। हिंसा का जवाब वह हिंसा से देना उचित नहीं समझतीं। दुनिया के बहुत-से देशों में मृत्युदंड पर रोक है। भारत में भी इस पर बहस चलती है, कई लोग इसे जारी रखने की पुरजोर वकालत करते हैं। यह यहाँ जारी है पर इसका त्रासद पहलू यह है कि आज फाँसी देने वाले जल्लाद भारत में नहीं मिल रहे। कोई नया आदमी जल्लाद का पेशा अपनाना नहीं चाहता:
हत्या कर दी जाए हत्यारे की खून के उबाल और सिरफिरेपन को समझदार संयोजन से अंजाम दिया जाए सभ्य समाज के यही हैं नियम तराजू पर झुका है कानून का पक्ष हत्या पर मोहर है...। (मृत्युदंड) कुल मिलाकर इंदु की साफगोई प्रशंसा योग्य है। चाँद और मंगल की यात्राओं पर निकल रहे युवा कवियों को इन्हें पढ़ना चाहिए और अपने समय को जानना चाहिए।