कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Monday, 26 December 2016

एक बादशाह की प्रेम कहानी - कुमार मुकुल

'बाजबहादुर-रूपमती' दिशा प्रकाशन दिल्‍ली से प्रकाशित लक्ष्‍मीदत्‍त शर्मा 'अन्‍जान' की रोचक ऐतिहासिक कृति है। अन्‍जान की यह इकलौती कृति उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित हो सकी। इस विषय पर हरेकृष्‍ण देवसरे का भी 'मालवा सुलतान' नाम से उपन्‍यास है। यह उपन्‍यास शेरशाह से लेकर हुमायूं और अकबर तक के शासन काल की झलकियां दिखाता चलता है। एक अफगान शासक बाजबहादुर और एक सामान्‍य हिंदू संगीतज्ञ की बेटी रूपमती की यह प्रेमकहानी राजवंशों की प्रेम कहानियों के मुकाबले ज्‍यादा मानवीयता लिए हुए है।
कभी माण्‍डव का शासक रहा बाजबहादुर जंगलों में छुपकर मुगलों से जान बचाता फिरता है। आखिर वह जंगली जातियों और भील सरदारों की सहायता लेकर मुगलों से फिर मुकाबला करता है और अपना राज्‍य वापिस लेता है। पर जब उसे मालूम होता है कि अकबर के एक सरदार की प्रताड़ना का शिकार होकर रूपमती ने जहर खाकर अपनी जान दे दी है तो फिर राज-काज चलाने की उसकी इच्‍छा नहीं रहती।
फिर उसे पता चलता है कि रूपमती को मौत की आगोश में जाने को मजबूर करने वाले मुगल सरदार अदहम खां , जो अकबर का कोका भाई भी था, को इस क्रूरता के एवज में अकबर के हाथों मरना पड़ा तो उसका अकबर के प्रति नजरिया बदलता है। अकबर हिंदू प्रजा का भी उसी तरह ख्‍याल रखता था जैसा मुस्लिम प्रजा का रखता था। उसने रूपमती के ताबूत को उसके मादरेवतन सारंगपुर में वापिस भिजवा कर सम्‍मान के साथ दफनवाया था और उसकी कब्र पर एक खूबसूरत मजार भी बनवाई थी। यह सब जानकर बाजबहादुर का मन अकबर के प्रति बदलता चला गया। उसे बस एक दुख था कि अनजाने में अकबर से एक गलती हो गयी थी। उसने रूपमती को वादा किया था कि वह उसके धर्म का भी अपने धर्म की तरह सम्‍मान करेगा। और अगर जीते जी उसका इंतकाल हुआ तो उसे दफनाने की बजाय चिता को अर्पित करेगा। पर राज-काज के लफड़े में वह अपनी रूपमती को मरते समय देख भी न सका।
दरअसल बाजबहादुर अफगान शासक के साथ एक पहुंचा हुआ गायक भी था। रूपमती पहली मुलाकात में उसके गायक रूप पर ही रीझ गयी थी। फिर उनका प्रेम परवान चढा पर शासक पिता के दबाव में विवश बाजबहादुर को एक सरदार की लड़की से विवाह करना पड़ा पर इससे उसका प्रेम मरा नहीं। उधर रूपमती भी मन से बाजबहादुर को निकाल ना सकी। आखिर पिता की मृत्‍यु के बाद बाजबाहदुर ने रूपमती को अपनाया। इससे नाराज होकर सरदार की पुत्री ने राजमहल छोड मायके का रूख किया और फिर रूपमती के जीते जी वापिस नहीं आयी। हालांकि रूपमती ने कभी रानी बनने की इच्‍छा नहीं जतायी और बाजबहादुर के साथ संगीत की महफिलों में ही रमी रहीं।
यह उपन्‍यास दर्शाता है कि अगर बाजबहादुर इस संगीत प्रेम में ना पड़ता तो संभव था कि भारत का इतिहास कुछ और होता। क्‍येांकि बाजबहादुर लड़ाका भी जबरदस्‍त था। अपनी जिंदगी में उसने कभी किसी से हार नहीं मानी। संगीत के साज के साथ उसने सत्‍ता भी साध ली थी। पर संगीत की म‍हफिलें और बर्बरता आधारित राजसत्‍ताएं साथ-साथ कैसे चलतीं। तो मुगल धीरे-धीरे काबिज होते गए।
हालांकि बाजबहादुर ने भीलों की सहायता से मुगलों से माण्‍डव की सत्‍ता फिर छीन ली थी पर रूपमती की मौत की खबर ने उसके मानस को बदल दिया। उसने सोचा कि शासक तो अकबर भी अच्‍छा ही है। सो अंत में जीती बाजी हारते हुए उसने अकबर के दरबार में एक गायक के रूप में रहने को एक शासक के रूप में रहने पर तरजीह दी।
कहा जा सकता है कि प्रेम और संगीत के सामने बाजबहादुर ने तख्‍तो-ताज को किनारे कर दिया। उसके काल के तमाम शासकों को लोग बिसार चुके हैं तभी तो रूपमती और बाजबहादुर की कथा को लोग अपने-अपनी तरह से लिख रहे हैं।
पुस्‍तक – बाजबहादुर-रूपमती
लेखक - लक्ष्‍मीदत्‍त शर्मा 'अन्‍जान'
प्रकाशक - दिशा प्रकाशन, दिल्‍ली।

Thursday, 22 December 2016

फैज - अंधेरे में सुर्ख लौ

‘फैज की शख्सियत:अंधेरे में सुर्ख लौ’ मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान,कांतिमोहन सोज आदि के संपादन में राजकमल प्रकाशन से आयी एक अच्‍छी किताब है, जिससे गुजर कर फैज्‍ के बहुआयामी व्‍यक्त्त्वि को जानने समझ में काफी मदद मिलती है। पुस्‍तक में खुद फैज अहमद फैज की आपबीती की दो‍ किस्‍तों के अलावे उनकी पत्‍नी एलिस फैज और जेल में साथ समय बिताने वाले व अन्‍य मित्रों के संस्‍मरण हैं।
आपबीती को पढकर यह जाहिर होता है कि फैज का जीवन सहज नहीं था। उन्‍होंने जिंदगी में काफी उठा-पटक देखी थी। उनके पिता उन्‍हें बताया करते थे कि बचपन में वे चरवाहे थे फिर आगे वे जिंदगी की चढान चढते गए और कैंब्रिज में पढाई आदि की और अंग्रेजों के वफादार हो गये थे और शान की जिंदगी बितायी थी। पिता को याद करते फैज एक जगह लिखते हैं कि उनका नाम सुल्‍तान था और मैं यह कह सकता हूं कि मेरे पिता राजा थे। पर विडंबना यह रही कि मरते समय तक उनके पिता ने अपनी सारी संपत्ति मौज-मस्‍ती में गंवा दी थी और विरासत में फैज के लिए संघर्ष छोड गये थे। फैज लिखते हैं कि जब पिता गुजरे तो घर में खाने तक को कुछ नहीं था।
1941 द्वितीय विश्‍वयुद्ध के समय उनका पहला कविता संकलन आया था जो खूब बिका था। पर युद्ध के बढने पर फैज ने फौज ज्‍वायन कर लिया। उस समय तक उनमें वामपंथी रूझान पैदा हो चुकी थी और उन पर फौज में शक किया जाता था। युद्ध की समाप्ति पर उन्‍होंने खुद फौज से अलग कर लिया। आगे 1947 में वे पाकिस्‍तान टाइम्‍स के संपादक हुए और चार साल संपादकी की। इसी समय अपने एक फौजी मित्र जनरल अकबर खान के साथ मिलकर सरकार पलटने के षडयंत्र में उन्‍हें जेल हुयी। जेल में पढने-लिखने का काफी वक्‍त होने के चलते उनकी कलम वहां लगातार चलती रही।
यह सब पढते जाहिर होता है कि फैज में जिंदगी को जीने का दुर्निवार जज्‍बा था जो जेल के कमरों को भी अध्‍ययन कक्ष में बदल देता था। ऐसी मिसालें हमारे यहां पं. नेहरू, गांधी आदि ने भी दी हैं जिन्‍होंने जेल में रह कर काफी कुछ पढा लिखा।
अपनी शरीफाना बनावट का श्रेय फैज महिलाओं को देते हैं जिनकी सोहबत में वे आम उज्‍जडपन से बचे रहे। फैज के पारिवारिक मित्र आफताब अहमद लिखते हैं – वो किसी से कोई कडवी या सख्‍त बात नहीं करते थे। शायद इसीलिए जीवन की कठिनइयों को वे अपने ढंग से झेल सके। जब उन्‍हें सरकार पलटने के इलजाम में जेल हुयी तो कुछ अखबारों ने उन्‍हें लेकर गद्दार विशेषांक तक निकाला। उस समय फैज ने लिखा –
जो हम पे गुजरी सो गुजरी, मगर शबे हिज्रां
हमारे अश्‍क तेरी आकबत संवार चले।
फैज की नाजुकमिजाजी की बाबत उनके साथ जेल में चार साल गुजार चुके साथी मेजर मुहम्‍मद इश्‍हाक लिखते हैं - ...यूं ही किसी ने त्‍योरी चढा रखी हो, उनकी तबीयत जरूरत खराब हो जाती है, और इसके साथ ही शायरी की कैफियत काफूर हो जाती है।
किताब फैज से जुडे कई निजी प्रसंग को सामने लाती है, जैसे कि वे छिपकलियों से बहुत घिनाते थे और आस पास दिख जाने पर बिछावन पर सो नहीं पाते थे। पाकिस्‍तान के फौजी शासन के समय जब वहां तमाम हिंदुस्‍ताने से जुडे रचनाकारों को पढने पर पाबंदी लगा दी गयी थी और रेडियो से बस इकबाल की रचनाओं का प्रसारण होता था तब फैज हिंदुस्‍तान रेडियों से अमीर खुसरो, फैयाज खां आदि को सुना करते थे।
पुस्‍तक के दूसरे खंड में फैज की खतो-किताबत और बातचीत को सं‍कलित किया गया है। जिसमें नूर जहीर और जहूर सिद्दीकी ने फैज और एलिस के खतों को सामने रखा है। इसके अलावे इब्‍बार रब्‍बी , नईम अहमद आदि से फैज की बातचीत भी इसमें शामिल है। कुल मिलाकर यह पुस्‍तक फैज को समझने में काफी हद तक मददगार साबित होती है।
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पुस्‍तक – फैज की शख्सियत: अंधेरे में सुर्ख लौ
संपादन – मुरली मनोहर प्रसाद सिंह,चंचल चौहान,कांतिमोहन सोज
प्रकाशक – राजकमल

Wednesday, 21 December 2016

पूरन चन्‍द्र जोशी - कविता की मुकम्‍मल उठान

मैं आज मरण के गीतों को कितनी तन्‍मयता से गाता ---
 
'पहाड' द्वारा प्रकाशित समाजशास्‍त्री पूरन चन्‍द्र जोशी की कविताओं के संकलन 'हिमाद्रि को देखा' से गुजरना रोचक अनुभव रहा। इससे पहले मैंने उनकी इधर की कविताएं 'इत्‍यादि जन' संकलन में पढी थीं। वहां जोशी जी  के पास न्‍यायपूर्ण विचार तो  दिखे पर कविताई कमजोर थी, पर इस संग्रह के पहले खंड 'विजन पथ' की कविताएं 1943-45  के बीच की हैं और दूसरे खंड 'नराई' की कविताएं  उसके बाद की। पहले खंड की कविताएं देख हैरत होती हैं, वे गीतात्‍मक हैं  और अपनी प्रस्‍तुति में लाजवाब हैं। उनसे गुजरते हुए लगता है कि उनके समाजशास्‍त्री ने हिन्‍दी को एक बेहतर कवि से वंचित कर दिया, खैर समाजशास्‍त्री के रूप में उनकी भूमिका ज्‍यादा जरूरी है पर कविताओं को  देख मोह तो होता है कि काश वे अपने अध्‍ययन के साथ  कविता को  भी उसी रवानी के साथा जीवित रखते तो ...।
संग्रह का पहला गीत है - ' मैं न हार मानता'।
'कंटकों के बीच में
डगमगा रहे  चरण
ज्‍योति की नहीं किरण,
...तुमुल तिमिर चीर-चीर
...प्रण अखण्‍ड ठानता
मैं न हार मानता ...'

गजब का जीवट है इन पंक्तियों में। शायद यही जीवट था, जिसने उन्‍हें अपने पतनोन्‍मुख समाज के करकों के अध्‍ययन को प्रेरित किया और कडी आत्‍मालोचना का प्रण उनके भीतर जीवित रखा। इन कविताओं में प्रकृति और जीवन का सौंदर्य अपनी सांद्रता में अभिव्‍यक्‍त हुआ है। 'दर्शन' कविता की पंक्तियां देखिए -
'पुलक कंपित देह में
नीला वसन था
अरूण अधरों में मधुर
स्मिति की झलकती दामिनी
स्‍वप्‍न में दीखी मुझे कल
मधुर मेरी  मोहनी।'

कवि को पता है कि वह जिस राह पर चला है वह कठिन है, 'बटोही' कविता में वह खुद को चेतावनी भी देता है -
'अन्त है जिसका नहीं कुछ दीखता ए स्‍वाभिमानी
उसी पथ में तू चला यों अटल तू ने टेक ठानी।'

पर अपनी अटल टेक के भरोसे चला है इसे भी वह जानता है।
अपनी उस किशोर उम्र में कवि जब गहन अंधकारा में फंसता है तो किसी प्रभु को याद करता है, उसका प्रभु प्रकृति की शक्त्‍िा है-
' हे ज्‍योतिर्धर, तुम भरते हो ज्‍याति चन्‍द्र में, तारों में
वही ज्‍योति भर दो प्रभु मेरे उर के अन्‍ध कगारों में।'

कवि की आलोचना दृष्टि आरंभ से खुद को भी बराबर सवालों के घेरे में रखती है। 'मेरे घर का तोता' कविता में वह अपने परिवेश की ही आलोचना करता है जिसने एक पंछी को पराधीन, परवश  बना डाला है, इसे कवि 'मनुष्‍य की अकरूण  हृदयहीनता' के रूप  में चिन्हित करता है। मानव जीवन को ग्रसता अंधेरा हमेशा कवि को परेशान करता है, प्रकृति का वर्णन करते भी वह इस अंधकार को भूल नहीं पाता -
'जागरण आज, आनंद आज, खिल उठी मधुर मंजुल लाली
पर यहां आज अंधेरी सी, छाई मानव जग में काली।'

संग्रह की कई कविताओं में किशोर उम्र की आशा, निराशा, मोह, भय आदि तमाम भाव अभिव्‍यक्‍त हुए हैं। जिज्ञासा की उधेडबुन हमेशा उसे परेशान करती है, मानव जीवन की वेदना उसे कहीं से छिपकर आवाज देती लगती है , उसे वह जानना चाहता है -
'मैं नहीं जान पाता हूं, मेरा मन मेरी आंखें
हैं किसे खोजती उठती कल्‍पना विहग की पांखें?'

उस उठती उम्र में किसी प्रिय के आने की  अकांक्षा भी कवि को परेशान करती है और वह सोचता है कि उसकी प्रियतमा आए तो कैसे आए...। कि जब वह अपने अपरिचित दुख से पीडित बैठा हो तो वह उस दुख में शामिल हो  कर आए ना कि अपनी खुशी उस पर थोपती आए। कवि को सहज साथ पसंद है , धूम धडाके साथ  किसी साथी का आना कवि को  पसंद नहीं -'तुम मंथर डग धर आना मत आना धूम मचाकर।'
'आशा' कविता में कवि ने आशा के सुखकर और निष्‍ठुर दोनों रूपों को अभिव्‍यक्‍त किया है, यह द्वंद्व हमेशा कवि को मथता है और आगे बढाता है-
'तुम खींच मधुर मादक कितने जीवन के चंचल चित्र घने
फैलाकर चारों ओर तिमिर छिप जाती निर्मम निष्‍ठुर हो।'

मनुष्‍य , मनुष्‍य के बीच बढती विषमता की खाई जोशी जी को हमेशा चिंता में डालती रही है, यह उनके अभी आये कविता संग्रह 'इत्‍यादि जन' की कविताओं को पढकर जाना जा सकता है। विषमता के प्रति यह भाव कवि में किशोर वय से ही रहा है-
'आह , जीवन के जगत में दीखती कितनी विषमता...
खिल उठी सुंदर अधर में वह मिलन मुस्‍कान मोहन
झट झुलस देती जिसे दुर्दम विरह की अग्नि भीषण...।'

यह विषमता जीवन जगत में तो है ही वह भाव जगत में भी है, प्रेम का पुष्‍प खिलता नहीं है हुलसकर कि विरह की विषम अग्नि उसे झुलसने को धधक उठती है।  हालांकि इस व्‍यथा को भी अपने किशोर वय की माधुर्य से ओत-प्रोत चेतना से कवि मधुर बनाने की कोशिश करता है -
'व्‍यथा,व्‍यथा , हां मूक व्‍यथा का , कैसा सुंदर मधुमय भार...।'

इस मधुर भार के भीतर से जगत में व्‍याप्‍त विषमता को दूर करने वाली चेतना भी जोर मारती है और कवि अपनी किशोर वय का सहज तर्क इस तरह प्रस्‍तुत करता है -
' चिर हास विलास कुतूहल की आनंद मोद का मधुर भार
उतरेगा क्षण भर में उर से किसका है ऐसा निष्‍ठुर मन...।'

इस सब  के बावजूद कवि की जनोन्‍मुख चेतना हाथ में ज्‍याति किरण लिए उर उर का अन्‍वेषण करने को उद्धत दिखती है-
'है कहां स्‍वर्ग की प्रभा भरी बाहर तो अब कंकाल जाल
वह लिये हाथ में ज्‍योति किरण , करता उर उर का अन्‍वेषण।'

अपनी एक  कविता में सुख और दुख  दोनों को कवि समान भाव से लेने की भारतीय परंपरा की सीख  को नये स्‍वर देता है -
'संध्‍या प्रभात और विरह मिलन, यह जन्‍म मरण का क्रम सुंदर
मानव जीवन में सुख सुंदर, मानव जीवन में दुख सुंदर।'

यहां कवि पारंपरिक भावों को नयी आभा देता सा दीखता है। दुख को इस तरह सुंदर इससे पहले किसी ने नहीं कहा है। अज्ञेय ने लिखा है कि दुख मांजता है। पर यह दुख को सुंदर कहना नया है, यह 'स्‍वीटेस्‍ट सॉंग्‍स ऑर दोज व्हिच सेज ऑफ सैडेस्‍ट थॉट्स' जैसे कथन के निकट का भाव है। एक कविता में  कवि जीवन को लता की उपमा देता है जो राह की कण्‍टकित डाल से उलझ सुलझ, उठ गिर कर आगे बढती जाती है। कवि का यह दुखों के प्रति और मरण तक के प्रति अनोखा लगाव का भाव बराबर ध्‍यान खींचता है। वह मरण के स्‍वर में भी प्रिय की पगध्‍वनि सुन पाता है -' मैं आज मरण के गीतों को कितनी तन्‍मयता से गाता।'
पुस्‍तक के पहले खंड से उद्धत उपर का यह सारा राग विराग जो अपने रसोद्रेक में छायावाद के किसी भी कवि का मुकाबला करता दिखता है, दूसरे खण्‍ड 'नराई' में कमजोर हो जाता है। ये बाद की कविताएं हैं। पहली ही कविता में कवि अपने आप से सवाल करता है -
'बौद्धिकता के किस मरूथल में
कहां खो गयी मेरी कविता...'

हांलांकि इसी कविता के अगले पैरे में कवि को लगता है कि उसने पुन: उस रसमय श्रोत को पा लिया है -'दिल दिमाग का द्वंद्व मिट गया,सजग हुयी प्रबुद्ध सहृदयता।' पर आगे  की कविताओं में अपने पुराने राग रस से पुष्‍ट भावों को कवि फिर नहीं दुहरा पाता, यह संभव भी नहीं। पर आंरभ की कवि की उठान एक मुकम्‍मल उठान है, जो इतने लंबे कालखंड को पार कर अब तक अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और आगे भी बनाए रखेगी।

Wednesday, 7 December 2016

अरूण कमल का भोगवादी गद्य – पारचूनी परचम

'मैं तो चारण हूं ...अरूण कमल' 

 “कविता और समय´´ पुस्तक में संकलित `कविता का आत्म संघर्ष´ शीर्षक टिप्पणी में मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष को याद करते हुए अरुण कमल लिखते हैं- “कौन-सा शब्द हम चुनें और कौन-सा छोड़ दें। यह बहुत महत्‍वपूर्ण होता है।…बहुत बार तो हम सिर्फ शब्दों के प्रचलन को जांच करके पता लगा सकते हैं कि कवि का समाज से संपर्क कैसा है, कौन से विषयों को वह चुनता है और फिर उसकी पूरी दृष्टि कैसी है। यानी विषय से शुरू करके एक शब्द का, बल्कि हम तो कहेंगे एक मात्राा तक का जो चुनाव होता है वहां तक यह बहुत ही महत्‍वपूर्ण प्रक्रिया चलती रहती है।´´
उपरोक्त गंभीर वक्तव्य पुस्तक की `टिप्पणियां´ के अंतर्गत संकलित अपेक्षाकृत हल्के माने गए निबंधों में से एक से है। पुस्तक के आरंभिक `आलोचना´ खंड का अंतिम आलेख `हिंदी के हित का अभिमान वह´ नामवर सिंह पर है। आलोचना खंड में ही रघुवीर सहाय पर `न्याय की लड़ाई के पक्ष में´ शीर्षक से लिखते हुए अरुण कमल कहते हैं- “किसी भी कवि की निपुणता और उसके संपूर्ण काव्य-आचार तथा जीवन-दृष्टि की जांच एक उपयुक्त कविता के जरिए हो सकती है।´´ इसी को ध्‍यान में रख मैंने अरुण कमल के गद्य विवेक को समझने के लिए नामवर सिंह पर लिखा उनका यह आलेख चुना है। ध्‍यान से पढ़ने पर यह आलेख व्यंग्याभिनंदन लगता है। यानी व्यंग्य और अभिनंदन का मिश्रण। नामवर सिंह पर लिखित यह आलेख ग्यारह पृष्ठों में है जिसमें तीन पृष्ठ सीधे उनकी पुस्तक `कहना न होगा´ से उद्ध्‍ृत हैं।
अपने अभिनंदनालेख के अंतिम पैरों में गंभीर होते हुए अरुण कमल लिखते हैं- “आलोचक पर लिखा जाए और कुछ भी आलोचना न की जाए तो शोभा नहीं देता। आलोचना तो पवित्री (बोल्ड लेटर में) है जिसके बिना कोई भी साहित्य-भोज न तो आरंभ हो सकता है, न पूर्ण, न पवित्र।´´
लेखन में मात्रा और ध्‍यान की महत्ता बताने वाले अरुण कमल की ध्‍वनियों का संसार बाजारपरक और खाऊ किस्म का लगता है। वे आलोचना शोभा बढ़ाने (अभिनंदन) के लिए लिखते हैं। फिर आलोचना उनके लिए पवित्री (चरणामृत-परसादी) भी है और साहित्य भोज। अगर अरुण कमल मलयज से उनके समय के विवेक की सफाई मांग सकते हैं तो क्या हमें भी यह अधिकार मिलता है कि हम उनसे इन महाप्राण ध्‍वनियों का निहितार्थ पूछें? इसी पुस्तक में अरुण कमल रघुवीर सहाय की कविता पंक्ति पर आपत्ति करते लिखते हैं कि “यह कहने का भद्दा ढंग है´´ आलोचना पर बात करने का अरुण कमल का उपरोक्त ढंग कैसा है? क्या वह भोगवादी है? और पूंजीवादी भी, जिसका अच्छा खाका मुक्तिबोध अपनी `पूंजीवादी समाज के प्रति´ कविता में खींचते हैं।
“इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छन्द-जितना ढोंग, जितना भोग है निबंध।´´
आगे अरुण कमल नामवर सिंह द्वारा अपने प्रिय आलोचक एफआर लिविस पर की गई टिप्पणी को ही नामवर जी के लिए उद्धृत कर देते हैं। इस तरह घर से एक पाई (शब्द) लगाए बिना ही रंग चोखा कर लेते हैं। फिर वे लिखते हैं, “हो सकता है डॉ नामवर सिंह में कई भटकाव हों…भटकना पसंद करूंगा। नामवर सिंह के साथ…।´´ `हो सकता है´, `शायद´, `संभावित´, `लेकिन´ के बहुप्रयोग वाली अरुण कमल की यह भाषा ही भटकाने वाली है। भटकना अरुण कमल को पसंद भी है! पर क्या यह अभिनंदन नामवर सिंह को भटका सकेगा! या वह पहले ही भटक चुके हैं? कहीं पर एक बार नामवर सिंह ने अपनी खूबी बताते हुए लिखा था- “मेरी हिम्मत देखिए मेरी तबीयत देखिए, सुलझे हुए मसले को फिर से उलझाता हूं मैं।´´
काव्य भाषा की समझ अरुण कमल को चाहे जितनी हो पर अपने समय की समझ खूब है। तभी तो बाजार की भाषा पर हमले की तेजी को देखते उन्हें प्रतिकार में कविता पर `अंधाधुंध टिप्पणी करने की जरूरत पड़ती है। इस टिप्पणी का शीर्षक `पारचून´ देते हैं वे। `पारचून´ में वे लिखते हैं “यदि ईश्वर है तो यह पूरी पृथ्वी उसके लिए पारचून की एक दुकान ही तो है, कविता भी ऐसी ही अच्छी लगती है, ढेर-ढेर चीज़ें, बेइंतहा, सृष्टि की एक अद्भुत नुमाइश-पारचून की दुकान।´´
कुल लब्बो-लुआब यह कि आलोचना अगर पवित्री (परसादी) है तो कविता पारचून की दुकान। चलिए कविता की कुछ तो इज्जत रखी। परसादी की तरह `मोफत´ की तो नहीं कहा। यूं आज मोफतखोरों का ही बोल-बाला है।
अकादमी पुरस्कार मिलने के बाद एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में अरुण कमल खुद को माक्र्सवादी बताते हैं। चलिए माक्र्सवाद का नया अर्थशास्त्र `पारचून´ में दृष्टिगोचर हुआ। पर सवाल उठता है कि फिर वे कवि श्रीकांत वर्मा को बाजार और उदारीकरण की पक्षधर कांग्रेस के प्रवक्ता होने के चलते क्यों कोसते हैं!
`मगध´ पर लिखते अरुण कमल लिखते हैं“मैं लगातार किंचित विस्मय के साथ सोचता रहा कि एक समर्थ कवि जो शासक दल का उच्चािधकारी और प्रवक्ता है, वह आज कैसी कविताएं लिख सकता है…एक कवि जो तत्कालीन जीवन के कष्टों और विडंबनाओं का साक्षी नहीं हो सकता, अन्याय और संहार का प्रतिवाद नहीं कर सकता। वह काल और शाश्वत जीवन के बारे में लिखने का अधिकारी है? पता नहीं ये विचार कवि द्वारा श्रीकांत वर्मा पुरस्कार लेने के पहले के हैं या बाद के। पुरस्कार के निर्णय में क्या आज भी श्रीकांत वर्मा की कांग्रेेसी सांसद पत्नी की भागीदारी नहीं है! क्या श्रीकांत वर्मा के बेटे की जालसाजी उजागर होने के बाद कवि के विचार उस पुरस्कार के प्रति बदले हैं? नहीं, तो श्रीकांत वर्मा से ऐसे सवालों के मानी क्या हैं? श्रीकांत वर्मा की पुस्तक `मगध´ उनके विवादास्पद व्यक्तित्व के बाद भी जिस निर्विवादिता को प्राप्त कर चुकी है, क्या उससे अरुण कमल को जलन होती है?
फिर अकादमी पुरस्कार भी क्या उसी कांग्रेसी या भाजपाई संस्कृति का एक हिस्सा नहीं है जिसके लिए अरुण कमल श्रीकांत वर्मा के कविता के अिèाकार को ही सवालों के घेरे में ला देते हैं। अकादमियों के स्वरूप पर प्रकाश डालते नामवर सिंह लिख चुके हैं- “नेहरू की दृष्टि में संस्कृति एक `एलीटिस्ट´ अवधारणा थी और उन्होंने रवींद्रनाथ की परंपरा में ही भद्रवर्गोचित अकादमियों की स्थापना की।´´
अरुण कमल की भाषा में `भोग´ और `चारण´ वृत्ति को बढ़ावा देने वाली ध्‍वनियां सर्वाधिक हैं। उनके लेखन का अधिकांश आपको एक किंकर्तव्यविमूढ़ता में ला खड़ा करता है। वे नामवर सिंह पर लिखते हैं कि `आलोचक का सबसे पहला काम शायद यही रहा है और है भी- लोगों को जगाए रखाना, जब सब सो रहे हों तब जाकर कुंडी पीटना।´ क्या साहित्य में जगाने से मतलब नींद खराब करना होता है! फिर `पहला´ के पूर्व `सबसे´ का अनोखा प्रयोग! दरअसल कहने को बातों का टोटा होने पर ही ऐसी जड़ाऊ भाषा गढ़नी पड़ती है।
अरुण कमल के अनुसार नामवर सिंह हिंदी के हित का अभिमान हैंµ“पूंजीभूत मेधा, नाभि, बंजारा, अकेले ही संपूर्ण प्रतिपक्ष हैं।´´ “और अविस्मरणीय अनुभव है उन्हें सुनना-निष्कम्प स्वर और `सस्वर गद्य´। `विचार दुर्भ्रिक्ष´ में विचारों का छप्पन भोग। इस छप्पन भोग के बिना शोभा ही नहीं बनती अरुण कमल के पैरे की। आखिर दुर्भिक्ष में भी `छप्पन भोग´ की पुरोहित कामना किस मानस को दर्शाती है?
मतलब साफ है कि कहीं आलोचना पवित्राी है, कहीं छप्पन भोग, कहीं दुधारू। या यूं कहें कि जो दुधारू है, वही आलोचना है। कहावत भी है कि दुधारू गाय की दो लात सही। सो अरुण कमल की नजर गाय के दूध पर रहती है। जब तक प्रशस्ति है तब-तक दुधारू है। फिर उन्होंने कविता को खूंटा बना डाला है। भला खूंटे से बंधे बिना, दुधारू हुए बिना आलोचना कैसे हो सकती है! जाने खुद पर ऐसी दुधारू शैली में आलेख देख नामवर सिंह क्या सोचते होंगे? क्योंकि “वागाडंबर भाषा का सबसे बड़ा दोष है´´ यह नामवर सिंह का ही कथन है।
कभी आलोचना को वे सिल (सिलबट्टा) बताते हैं जिस पर विवेक की छूरी सान चढ़ती है, कभी उसे ऐसा शिकारी कुत्ता बताते हैं जो सूंघ नहीं सकता। कुल मिला कर अरुण कमल के नामवर सिंह पर लिखे इस लेख के आधार पर आलोचना पर एक पॉप गीत तैयार किया जा सकता। वो जो गाना है ना गोविंदा वाला, “…मेरी मरजी। आलोचना तेरा ये करूं वो करूं मेरी मरजी।´´
फिर वे लिखते हैं कि नामवर सिंह के निष्कर्ष रचना के निष्कर्ष हैं। पर वे कौन से निष्कर्ष हैं, इस पर वे एक पंक्ति नहीं लिखते। भई जैसे `कहना न होगा´ से लेकर तीन पृष्ठ भरे वैसे ही नामवर सिंह पर `पहल´ के अंक से कुछ पृष्ठ निष्कर्ष पाठकों को उपलब्ध करा देते उद्धरण के रूप में। जैसे- एफआर लिविस पर टिप्पणी उपलब्ध कराई है।
आगे वे आलोचक के कर्तव्य की गंभीरता बतलाते हुए लिखते हैं“ढेर सारी कविताओं के, बीच ऐसी कविताओं को पहचानना भी दुष्कर है, जो कि एक श्रेष्ठ आलोचक को करना होता है- गाड़ी दौड़ में सबसे तेज दौड़ने वाली गाड़ी के साथ-साथ नजर टिकाए हुए – दौड़ना।´´ यहां कविता लेखन को घुड़दौड़ बना दिया गया। और आलोचक सट्टेबाज। नामवर सिंह का जो वक्तव्य अरुण कमल को मार्मिक लगा वह यह है कि “मैं तो चारण हूं, प्रत्येक राज-कवि का गुण गाने को तत्पर।´´ अकादमी पुरस्कार के बाद राज-कवि होने में काहे का संदेह।
आगे अरुण कमल लिखते हैं, “सृजन का अर्थ है शिष्ठ-भाषा को लोकभाषा के पास गर्भाधान हेतु ले जाना।´´ मतलब एक सांड भाषा दूसरी गाय भाषा। आगे वे दो तरह की आलोचना भी बताते हैं। एक पत्रकारी आलोचना जो दाएं-बाएं मुंह मारती चलती है, दूसरी अफसरी आलोचना जो गठिया पीिड़त बिना देह हुक्म चलाती है। क्या उनका आशय अज्ञेय, रघुवीर सहाय और अशोक वाजपेयी से है! और नामवर सिंह को वे दोनों के विरुद्ध पाते हैं। `कहना न होगा´ पर वे लिखते हैं, इसमें है, “विचार की एक मुख्यधारा और फिर सहायक नदियां। एक मुख्य घर और दालान बैठका।´´ गतिशील नदी और घर-बैठका का तुलनात्मक भानुमतीय विवेचन अरुण कमल के वश की ही बात है। वे कहते हैं कि नामवर सिंह की इस किताब के आधार पर `गाइड´ या `मैनुअल´ तैयार किया जा सकता है। कुल मिलाकर अरुण कमल कविता की अकादमिक पढ़ाई से बाहर आलोचना का काम समझ ही नहीं पाते। अंत में वे नामवर सिंह को तालस्तोय बताते हुए उनमें `लोमड़ी´ और `साही´ की क्षमताएं एक साथ देख पाते हैं। अच्छा है `साही´ पर एक केले का थंब गिरा देने की जरूरत है और लोमड़ी की बाजारू मुफ्तखोरी से तो लड़ने की जरूरत पड़ेगी ही।

पटना से प्रकाशित पाक्षिक न्‍यूज ब्रेक में यह टिप्‍पणी अरसा  पहले प्रकाशित हो चुकी है।

Thursday, 17 November 2016

कैलाश मनहर - अच्छाई के नर्क का आनंद

कैलाश मनहर भावाकुल कवि हैं। मदन कश्यप की कविता पंक्तियां हैं -

एक का रोना सुनती हैं स्त्रियाँ

और रोने लगती हैं

रोने लगती हैं स्त्रियाँ कि क्या उनकी अपनी व्यथा ही

कम है रोने के लिए।

कुछ इन्हीं स्त्रियों का सा ह्रदय पाया है कैलाश मनहर ने। कोई भी दुख टिकता नहीं है जहन में उनके। आखों के रास्ते या भाषा में कविता के रूप् में बह आता है।

छोटो से जीवन में उन्होंने जो दुख झेले हैं और दुखद दृष्यों से दो चार हुए हैं वह उन्हें लगतार विचलित करता रहता है। उसे वे बारंबार संस्मरणों की शैली में अभिव्यक्त करना चाहते हैं पर टीस है कि जाती नहीं। महादेवी वर्मा के ‘शापमय वर‘ की तरह वे धुंआते रहते हैं, भीतर ही भीतर।

अपनी अथाह बेचैनी को लेकर उन्होंने एक जगह राजाराम को सही उद्धृत किया है - यही तो तुम्हारी काव्य-रचना का आधार है कैलाश, क्योंकि इन्हीं अंतरद्वंद्वों की प्रश्नाकुलता में छनकर तुम्हारा चिंतन प्रक्षालित होता है और वही तुम्हारी मौलिकता की भाव-भूमि का निर्माण करता है।

जीवन जगत का सारा संगीत अंतरवेदना का ही गान है। इसे समझते हैं कैलाश और लिख पाते हैं -

जीवन एक कामना है मात्र

न मिटे जिजीविषा

कि वही हो सकती है सदाजयी

निरर्थक मृत्यु से युदध में जो

अनिवार्य है सनातन।

इस दर्द को कई रूपाकारों में बारंबार अभिव्यक्त करता है कवि और उसे सकारात्मक ढंग से सामने रखने की कोशिश करता है -

उदासी और उदारता सगी बहनें हैं

कदाचित

एक साथ जन्मी होंगी दोनों

जब डूब रहा होगा सूरज

समय सेतु पर।

पर जब इस कोशिश में वह सफलत होता है तो अवसाद का शिकार होता वह लिखता है -

मौन है ध्वनियां और उडा़नें अभिशप्त हैं

पक्षियों की

देह में मन है मरा हुआ जहां

जीवन बस एक विवशता है अनिवार्य।

हालांकि दर्द के इस पेचोखम में उलझकर भी कवि की चेतना जोर मारती रहती है - अपनी लडाई वह जारी रखता है-

हमारे पाप ही हैं

हमारी प्रार्थनाओं का धरातल

जहां

अहंकार की फसल उगाते हैं हम

स्वार्थपूर्ण ।

पुण्यात्माएं नहीं करतीं प्रार्थना

और प्रभुओं की पवित्रता पर भी

नहीं करतीं असंदिग्ध विश्वास।

कैलाश भाषा में किसी तरह का खेल नहीं करते। वह जो शमशेर ने कहा है -

लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अन्तिम आशाओं की सन्ध्याओं से?

तो शमशेर का वह कौन कैलाश जैसे कवि का कठजीव ही है। विकास की चौड़ी-चिकनी सड़कों के बीहड़ में अपना रास्ता कैलाश भूल जाते हैं बार-बार पर अपनी आत्मदृष्टि पर विश्वास है जो उन्हें बराबर अंधेरे में चीजों को पहचानने की ताकत देती है। उस पहचान को वे अपने निराले ढंग से अभिव्यक्त करते हैं -

हमारी मनुष्यता के लिए

अनिवार्य है सफलता के स्वर्ग से बचकर

अच्छाई के नर्क में आनंद लेना

और उपेक्षणीय रहना समय के छल से।

पर उनकी जिजीविषा है कि हार नहीं मानती -

अंतिम नहीं हैं हत्यारों के छल-घात

और अंतिम नहीं है हमारा संघर्ष भी।

जीवन के अंतरद्वंद्वों को कविता के मुकाबिल गजलों में वे ज्यादा गहराई से उतार पाते हैं। 'आज फिर...' नामक छोटी सी गजलों की पुस्तिका में ऐसी तमाम पंक्तियां हैं जो उनके तल्खी भरे मुकम्मल मिजाज को सामने लाता है -

जिंदगी है, कि नहीं है, शायद

और है भी, तो सांस भर, क्यों है।

हालांकि उनका चिरंतन दर्द यहां भी अपने लिए जमीन तलाश लेता है और खुद को शिद्दत से जाहिर करता है -

आज फिर आंखों में नमी सी है

बूंद टपकी नहीं, थमी सी है।

या

वे अगर संग-दिल हैं तो भी क्या

पत्थरों पर निशान सा हूं मैं।

गजलों की पुस्तिका में एक अनोखा सा प्रयोग किया है कैलाश ने। कविवर कृष्ण कल्पित से आग्रह कर उन्होंने हर गजल के अंत में एक शेर कहलवाया है। इस तरह यह एक रोचक जुगलबंदी सी लगती है। ऐसे ही एक शेर में कल्पित कहते हैं, और दुरूस्त कहते हैं -

समझ आया नहीं आता नहीं है

ये जीवन जैसे कोई फलसफा है।

Friday, 29 July 2016

नामवर सिंह - प्रेमचन्‍द और भारतीय समाज

प्रेमचन्‍द और भारतीय समाज नामवर सिंह की आठ पुस्‍तकों की श्रृंखला में एक है। यह योजनाबद्ध रूप से लिखी गयी कोई कृति नहीं है।  2005 से 2010 के बीच के पांच सालों में इस श्रृंखला के संपादक आशीष त्रिपाठी ने प्रो.कमला प्रसाद की प्रेरणा से पिछले साठ सालों में नामवर सिंह के छपे पर असंकलित आलेखों और वक्‍तव्‍यों से इसे तैयार किया है।
जैसा कि नामवर सिंह कहते हैं कि – मेरी ज्‍यादातर पुस्‍तकें अपने समय की बहसों में भागीदार होकर लिखी गयी हैं। यह पुस्‍तक भी कई बहसों पर अपने अंतरविरोधों के साथ पाठकों के सामने आयी है। एक बहस यही है कि प्रेमचन्‍द गांधीवादी थे या नहीं। इस संदर्भ में पुस्‍तक में पहली टिप्‍पणी, बीबीसी को दिए गए बयान में, नामवर सिंह ने यह की है कि –‘यद्यपि लोग उन्‍हें गांधीवादी कहते हैं, लेकिन वे गांधी से दो कदम आगे
बढकर आन्‍दोलन और क्रांति की बात करते हैं। प्रेमचन्‍द अपने जमाने के साहित्‍यकारों से ज्‍यादा बुनियादी परिवर्तन की बात करते हैं।‘
यहां नामवर जी की बातें स्‍पष्‍ट नहीं हैं। यह तो ठीक है कि प्रेमचन्‍द अपने जमाने के साहित्‍यकारों से ज्‍यादा बुनियादी परिवर्तन की बात करते हैं पर गांधी से भी दो कदम आगे बढकर आंदोलन की बात ही करते हैं,
जबकि गांधी आंदोलन भी करते हैं। केवल बात नहीं करते। एक लेखक के रूप में प्रेमचन्‍द से हम उस तरह से आंदोलन की अपेक्षा भी नहीं करते।
इस टिप्‍पणी के बाद वाले आलेख में नामवर सिंह ने गांधी और प्रेमचन्‍द को उनके सही संदर्भों में देखा है। गांधी-टैगोर के विवाद के परिपेक्ष्‍य में वे लिखते हैं – ‘ गांधी जी के इस क्ष्‍ुाधित पक्ष को साहित्‍य में यदि किसी ने पूरी ममता के साथ स्‍थान दिया तो प्रेमचन्‍द ने, क्‍योंकि गांधीजी के समान ही प्रेमचन्‍द की दृष्टि भी यथार्थ पर
थी...। राजनीति को गांधी यदि संघर्ष की नई भाषा , नई प्रणाली और नई दिशा दे रहे थे तो साहित्‍य को भी प्रेमचन्‍द  उसी प्रकार नई भाषा ,नई प्रणाली और नई दिशा दे रहे थे।‘
प्रेमचन्‍द को नामवर सिंह हिन्‍दी का पहला प्रगतिशील लेखक मानते हुए उनकी भूमिका को कबीर की भूमिका के समतुल्‍य बताते हैं। यशपाल, नागार्जुन और एक हद तक रेणु को वे प्रेमचन्‍द की परंपरा को विकसित करने
का श्रेय देते हैं।
पुस्‍तक चूंकि संकलन है सो इसमें एक तरह का बिखराव है। कुछ लेख इसमें ऐसे भी हैं जिनका प्रेमचन्‍द से कोई संबंध नहीं है, उन्‍हें हम उनके समय से जुडे व्‍योरे के रूप में पढ सकते हैं। पुस्‍तक मे प्रेमचन्‍द को लेकर चली और चल रही कई बहसों पर नामवर सिंह के विचार हम पढ सकते हैं। पुस्‍तक के अंत में प्रेमचन्‍द और तोल्‍सतोय शीर्षक से एक टिप्‍पणी है जिसमें नामवर सिंह ने दोनों रचनाकारों के पारस्‍परिक संबंधों को समझने के ग्‍यारह सूत्र दिए हैं। गांधी जी की तरह प्रेमचन्‍द भी तोल्‍सतोय के प्रभाव में थे पर नामवर सिंह का निष्‍कर्ष है कि इसके बावजूद दोनों के विकास की दिशा एक दूसरे के विपरीत है। किसानों के पक्षधर तो दोनों थे पर तोल्‍सतोय के किसान चरित्रों में अंतर्विरोध ज्‍यादा हैं, दूसरी ओर तोल्‍सतोय के औसत किसानों के मुकाबले प्रेमचन्‍द के किसान अधिक निभ्रांत और लडाकू हैं।
एक आलेख में दलित साहित्‍य और प्रेमचन्‍द विषय पर भी विचार किया गया है। नामवर सिंह का स्‍पष्‍ट मत है कि प्रेमचन्‍द कोई दलित साहित्‍यकार नहीं थे। यह अलग बात है कि संभवत: वे पहले उपन्‍यासकार हैं हिन्‍दी के, जिनके उपन्‍यास का  नायक ‘सूरदास’ जाति का चर्मकार है। प्रेमचन्‍द की रचनाओं से गुजरने के बाद यह पता चलता है कि दलितों के मंदिर प्रवेश को वे दलित समस्‍या का समाधान नहीं मानते थे। वे उन्‍हें भी
किसान-मजदूर की तरह देखते थे और उनका आर्थिक और सामाजिक उत्‍थान चाहते थे। गांधी जी से अलग प्रेमचन्‍द का मत यह था कि जबतक जाति-पांति की व्‍यवस्‍था नहीं तोडी जाएगी तबतक दलितों को मुक्ति नहीं मिलेगी।
सांप्रदायिकता के सवाल पर प्रेमचन्‍द के मतों पर भी एक आलेख में विचार किया गया है। सांप्रदायिकता पर चोट करते प्रेमचन्‍द लिखते हैं कि वह हमेशा संस्‍कृति की दुहाई देती है। प्रेमचन्‍द कहते है कि आज संसार
में बस एक ही संस्‍कृति है आर्थिक संस्‍कृति। आर्य संस्‍कृति,ईरानी संस्‍कृति और अरब संस्‍कृति नाम की चीज तो है पर ईसाई,मुस्लिम या हिन्‍दू संस्‍कृति नाम की कोई चीज नहीं है।
इस तरह प्रेमचन्‍द के तमाम विषय पर विचारों को जानने के लिहाज से पुस्‍तक अच्‍छी बन पडी है। इसमें प्रेमचन्‍द के आलोचकों की भी अच्‍छी खबर ली गयी है। प्रेमचन्‍द को सही संदर्भों में समझने में यह पुस्‍तक एक हद तक मददगार हो सकती है।
शुक्रवार में प्र‍काशित
 

Saturday, 23 July 2016

देवी प्रसाद मिश्र - मुसलमान

(बहस की कड़ी में यह टिप्पणी 1989 के नवभारत टाइम्स में छपी थी)

देवी प्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ कविता तटस्थ ढंग से अधूरी बातें रखकर भावोद्वेलन कर पीछे हो जाती है। ऐसी कविताएँ पाठकों को किंकत्र्तव्यविमूढ़ बना देती हैं। पाठक चैराहे पर रह जाता है और कविता खिसक जाती है। 
कविता एक ऐसी विधा है, जिसमें चालाकी के लिए सर्वाधिक मौके होते हैं, अक्सर बहुत से लोग उन चालाकियों की बदौलत ही कवि बन जाते हैं। 
जहाँ तक कविता में उठाई गई बातों का सवाल है, वे सच तो हैं, पर अधूरी हैं। यूँ क्रिकेट हमारे जीवन का यथार्थ नहीं है, ये सब बातें क्षणिक भावोद्वेलन पैदा करती हैं पर उसे लेकर मुसलमान पाकिस्तान जाने की बात सोचे यह भ्रम है। ऐसे लोगों को ‘बदीउज्जमा’ की पुस्तक ‘छाको की वापसी’ पढ़नी चाहिए। पाकिस्तान बनने से पूर्व कुछ मुसलमानों के सपने जरूर ऐसे थे, पर वे सपने ही रह गए। भारत के अनपढ़ मुसलमानों की सोच यह हो सकती है, जो उन्हें भारतीय होने से रोकती है, पर औसत हिंदू भी उतना ही रूढ़ है और अभारतीय। 
वे अगर इमरान से खुश रहते हैं, तो ये जायसी-अकबर को पसंद नहीं करते। यूँ कोई प्रगतिशील मुसलमान ऐसा नहीं सोच सकता। यह मुद्दा हमारी अशिक्षा से जुड़ा है, न कि किसी विचार से। अशिक्षा के कारण ही ये दोनों वर्ग वर्तमान की भूमि से नहीं, भूत की भूमि से भविष्य देखते हैं और भूत से भविष्य कैसे देखा जा सकता है। 
मिश्र जी की कविता तस्वीर तो सामने रख देती है, पर उसकी पृष्ठभूमि बचा ले जाती है। और कविता में इसे ही अक्सर शिल्प कहा जाता है। यह तो मालूम हुआ कि औसत मुसलमान ऐसे होते हैं, पर उनकी सोच क्या है, वे मुसलमान क्यों बने यह छिपा लिया गया। भारत में मुसलमानों की संख्या दुनिया के किसी भी मुल्क से ज्यादा है। शानी जी सही कहते हैं कि वे मूलतः हिंदू हैं पर ऐसा कहकर वे उन्हें अपमानित करते हैं। 
भारत का अति निम्न वर्ग सवर्णों के अत्याचारों से तंग आकर मुसलमान बना था। क्या उन्हें मालूम नहीं कि मुसलमानों का छुआ पी-खा लेने से भी हिंदू धर्म से वे बहिष्कृत कर दिए जाते थे। जिस धर्म में छाया के छूने से लोग अपवित्र हो जाते हैं (थे) उसे छोड़कर उन्होंने गलती नहीं की थी, जिसे सुधारने का प्रयत्न कर बुद्धिजीवी उन्हें अपमानित करें। जिन कारणों से तंग आकर वे मुसलमान बने थे, वे कारण परिवर्तित रूप में आज भी मौजूद हैं?  
सवर्णों की घृणा आज भी कहाँ कम हुई है। कभी वे रथ-यात्रा की भावुकता को हवा देते हैं, कभी आरक्षण विरोध के नाम पर किशोर-युवकों को गुमराह कर जलने को विवश करते हैं। पर क्या औरतें, जिनके जलने के आँकड़े कँपाने वाले हैं, कभी इस तरह हंगामे का कारण बनती हैं कि प्रधानमंत्राी को इस्तीफे की बात सोचनी पड़े। 
मर्द और औरत का, हिंदू-मुसलमान का यह अंतर किसका पैदा किया है, उसे कौन दूर करेगा। अतः मुसलमान बनकर चाहे वे घृणा से मुक्त नहीं हुए, पर घृणा कम तो हुई है। उसका रूप तो बदला ही। तब शानी जी उन्हें हिंदू कहकर क्यूँ पुनः इतिहास की उसी ऊब और सीलन भरी मृत-भूमि में ले जाना चाहते हैं, जिससे बचने को वे मुसलमान बने थे। 
वे मुसलमान बन गए, पर घृणा और अत्याचार की परंपरा खत्म नहीं होती, तो क्या उसका दोष हमारे सिर नहीं जाता कि हम जो उनकी या अपनी तस्वीर बना देते हैं, पर तस्वीर बदली कैसे जाए इसे भूल जाते हैं इस डर से कि तस्वीर टूट नहीं जाए। यही डर हमें अपंग बनाता है और भागीदारी के नाम पर हम एक मकड़जाल बुनते रहते हैं और खुश हैं कि निर्णयकारी भूमिका अदा कर रहे हैं। उन्होंने अपने घोड़े सिंधु में उतारे और पुकारते रहे हिंदू-हिंदू-हिंदू। 
कविता की ये पंक्तियाँ जो अपने रेटारिक के चलते सर्वाधिक प्रभावी हैं, उनकी ध्वनि वही संकेत देती हैं जो आडवाणी और सिंघल अपने भाषणों में रूढ़ ढंग से प्रक्षेपित करते हैं। यहाँ मैं शानी जी से सहमत हूँ। यह एक प्रभावी बिंब है, जो हमारा ध्यान ऐसी खोखली चुनौती की ओर ले जाता है, जो हममें बदले की भावना पैदा करती है और यह कवि के अनजाने नहीं होता, क्योंकि वह सिंधु की जगह हिंदू का प्रयोग करता है। 
मुसलमानों ने सिंधु के किनारे रहने वालों को सिंधु पुकारा और चूंकि सिंधु का उच्चारण वे हिंदू करते थे पर अपनी समझ में वे सिंधु ही कहते थे अतः उनकी भूल को या ध्वनि की गलती को चुनौती की प्रतिध्वनि हिंदू की तरह प्रयोग करना गलत है। चूंकि अगर हिंदू की जगह सिंधु रखा जाता, तो कविता का मूल ही समाप्त हो जाता। अतः कविता का उद्देश्य ही हिंदू पर जोर देना है। यह भयानक भूल है। 
वर्तमान की कोई जीत, भूत की हार को बदल नहीं सकती, जबकि वर्तमान की जीत असंभव, अप्रासंगिक तथा पीछे ले जाने वाली है। जहाँ तक नामवर सिंह का सवाल है उन्होंने एक बेहतर रचना का चुनाव किया। जहाँ सफल रचना का ही अकाल है, वहाँ सार्थक कहाँ से लाएँ वे और रचना करना तो उनके वश का नहीं। 
वे बस बता सकते हैं कि अर्जुन मोह के वश में है या सिजोफ्रेनिया से पीडि़त है। उसके मोहनाश के लिए लंबी-चैड़ी आलोचना की गीता थमा सकते हैं वो, पर लड़ना अर्जुन को है। हिंदू-मुस्लिम द्वेष के कारण ऐतिहासिक हैं, साथ-साथ तात्कालिक भी, जो इसे एक विडम्बना में बदल देते हैं। जिसका अंत सद्प्रयासों से ही संभव है। इसी विडम्बनाओं ने हमसे गाँधी को छीना, गणेशशंकर विद्यार्थी को छीना और अभी भी बरकरार है। 




Wednesday, 29 June 2016

उमा – पिता की अदृश्‍य होती सत्‍ता

युवा उपन्‍यासकार उमा के ज्ञानपीठ से आए उपन्‍यास जन्‍नत जाविदां को गूगल देवता के प्रकोप के बाद के दौर के प्रतिनिधि लेखन के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। अंतरजाल में उलझते विश्‍व में हमारे संबंध किस तरह बदल रहे हैं कि मां बेटे के संवाद मित्र संवाद की तरह हो गए हैं, अत्‍याधुनिक। पर श्‍यामली और आर्य के मध्‍य के आधुनिक संवादों के बरकस हमारी दुनिया तो अभी भी वहीं है, सामाजिक स्‍तरों और तमाम खांचों में घूंघट के पीछे वह आज भी अपने देवता गढ रही है। पर मुक्ति की तलाश में पीडित स्‍त्री से देवता खिलानेवाली देवी के रूप में बदली तुलसी की मुक्ति कहां है। ऐसे बहुत से सवाल छोडता यह उपन्‍यास नयी पीढी के अंतरद्वंद्वों और सोच को उनकी कुंठाओं और नये विचारों के साथ सामने लाता है। करीब 200 पृष्टिों के छोटे आकार में यह उपन्‍यास समाज के जितने रंगों को उसके विभिन्‍न शेड्स के साथ उभारता है उसे उपन्‍यासकार की ताकत के रूप में देखा जा सकता है।
तलाकशुदा एकल मां श्‍यामली और उसके बेटे आर्य के जीवन संघर्ष को सामने रखती यह पुस्‍तक इसी संदर्भ में चर्चित उपन्‍यास ‘आपका बंटी’ की अगली कडी की तरह है। ‘आपका बंटी’ की आरंभ में चर्चा भी है उपन्‍यास में।पर श्‍यामली का आर्य ‘आपका बंटी’ नहीं है। एक पिता की कामना तो है उसमें पर वह उसके बंटी की तरह कमजोर नहीं बनाती, वह करूणा का पात्र नहीं है। क्‍योंकि श्‍यामली के धैर्य और विवेकने उसे आश्रित पुत्र की तरह नही एक सहयेागी मित्र की तरह विकसित किया है। पिता की कामना है आर्य को भी पर पिता को वह अपनी मां के मित्र के रूप में पाना चाहता है, उसके परमेश्‍वर के रूप में नहीं।
आर्य के लिए पिता कोई सत्‍ता नहीं है। वह स्‍कूल के अपने साथियेां के सवालों के जवाब के लिए पिता को खोजता है, कभी कभार पर वह उसके मानस के केन्‍द्र में नहीं है। वह पिता के रूप में मां के लिए नया साथी चाहता है और इस रूप में अपने लिए एक मित्र चाहता है।
नयी सभ्‍यता और विकास के नये दौर में पिता एक अदृश्‍य होती सत्‍ता की तरह है, इसका प्रमाण है आर्य का चरित्र। यह उपन्‍यास मातृसत्‍ता की वापसी का संकेत भी है। नयी सभ्‍यता की सहज परिणती भी है यह। इस सभ्‍यता में संतानें अब कामना की तरह नहीं रह गयी हैं। वे करियर और तमाम अन्‍य प्राथमिकताओं के बरक्‍स एक बाधा की तरह रह गयी हैं। और ऐसा घटित होने में पिता की भूमिका प्रमुखता से उभरती है। संतानों पर अपनी कामनाओं को तरजीह देना पिता के रूप्‍ में उसकी सत्‍ता से उसे बेदखल करता है।
चाहे आज पिता पिता नहीं रहा।पर संतानें तो हैं और उनके साथ उनकी माताएं हैं,मित्रवत माताएं। शासक पिता के मुकाबले मित्र माता के प्रति संतानों का खिंचाव सहज है और यह नयी सभ्‍यता को माता की नयी सत्‍ता सौंपता है। यह स्त्रियों को गुलाम बनाए रखने की हजारों सालों की उनकी कोशिशों का नतीजा है कि पिता के रूप में आज वे अदृश्‍य होने की परिणतियों की ओर बढ चुके हैं।
श्‍यामली सोचती है- ‘जिंदगी वाकई सडक की तरह ही तो है, जो चलती रहती है, कहीं पहुंचती नहीं। कोई मंजिल नहीं, मंजिल मिली तो सडक खत्‍म, जिंदगी खत्‍तम।‘ कल तक यह सोच पुरूषों की थी। विवाह स्त्रियों के लिए मंजिल की तरह था पर पुरूषों के लिए नहीं। आज स्त्रियां भी इसी तरह सोच पा रही हैं और मुक्‍त हो पा रही हैं।
यह मुक्ति उनकी भाषा में नये रंग भर रही है-हल्‍की दाढी, लम्‍बी–दुबली काया पर ढीला-ढाला कुर्ता और जींस , यह पूरी पैकेजिंग बताती है कि सुभाष का ताल्‍लुक कला की दुनिया से है। घर का हुलिया और खामोशी बयां करती है कि सुभाष के इस घर में खामोशियां गुनगुनाया करती हैं। अकेलेपन के इस मार्केट में मायूसी के ज्‍यादा शेयर्स सकून के पास हैं।‘ उपन्‍यासकार की यह शब्‍दावली अगर जीवन में बाजार के दखल को सामने लाती है तो साथ-साथ खामोशी, मायूसी और सकून को नये ढंग से परिभाषित भी करती है। पितृसत्‍ता की सतायी स्त्रियों के पास खोने को कुछ नहीं है। पित परमेश्‍वर से मुक्ति के बाद वे मायूस नहीं हैं। अकेलापन और खामोशी भी उसके लिए सुकून का वायस है, इसमें वे अपनी और अपने नये समाज की पुनर्रचना कर पा रही हैं।
उनके पास अपना अर्जित दर्शन है जो उनकी अपनी अदा के साथ बारहा प्रकट होता है। नौ साल का बेटा जब पूछता है कि – मम्‍मा जी ये आसमां नीला क्‍येां होता है तो श्‍यामली का जवाब होता है – ये पीला भी होता तो क्‍या तुम सवाल नहीं करते, इसे किसी न किसी रंग का तो होना ही होगा न। स्‍पष्‍ट है कि जो कुछ झेल कर आज की स्‍त्री बाहर आ रही है उसने रंगों के पारंपरिक मानी और अर्थों के प्रति उसमें एक विद्रोह भर दिया है जिसे वे अपनी तरह से हल करती हैं। जन्‍नत जाविदां की श्‍यामली विश्‍व की उस स्‍त्री का प्रतिनिधित्‍व करती है जिसने पुरूषों के बरक्‍स अपनी नयी दुनिया रची है। उसमें रंगों के वही अर्थ नहीं रहने हैं जो थे।
प्रेम में अक्‍सर लोग अपने साथी से कहते हैं कि मैं और तुम अलग हैं क्‍या। पर यह एकसा वाला दर्शन बस प्रेम में पुरूष ही बघारते हैं और प्रेम के अलावे इसका कहीं प्रयोग नहीं हेाता। जीवन के अन्‍य तमाम मसलों में यह छद्म एकसापन दूर तक साथ नहीं दे पाता। नये दौर की स्‍त्री अब इस भुलावे को भोली बनकर सह नहीं पा रही। उपन्‍यास में माही एक जगह कहती है – एक होते तो एक मुंह से खाते...। स्त्रियां आज समझ चुकी हैं कि अब ‘प्रेम फुरसती लोगों का सब्‍जेक्‍ट है। पीत्‍जा संस्‍कृति का हिस्‍सा है।...प्रेम पैसे बहुत दिलाता है।‘ हमारे आपके जीवन में प्रेम नहीं है तभी लोग ‘दो सौ रूपये खर्च कर उसे देखने’ मॉल-हॉल जाते हैं।‘
उपन्‍यास में श्‍यामली का बेटा आर्य का चरित्र अनोखा लगता है। आज के बच्‍चे कितना बदल चुके हैं। आर्य जब बोलता है तो लगता है जैसे बाप-बेटा एक साथ बोल रहे हों। एकल मां का यह बेटा पति के ना होने पर मां के दोस्‍त की भी भूमिका अदा करता दिख रहा है। श्‍यामली आर्य को चालू मोबाइल टोन के लिए डांट रही होती है, फोन आने पर, तो आर्य बोलता है – ‘मम्‍मा पहले कॉल अटेंड कर लो, फिर डांट लेना बच्‍चे को’।
उमा यह उपन्‍यास स्‍त्री विमर्श से आगे मनुष्‍यता के विमर्श को छूता सा लगता है। पुरूष लेखक जिस तरह अपनी कुंठाओं और टैबू को खुलकर अभिव्‍यक्‍त करते हें, उमा ने भी इस मामले में कोई हिचक नहीं दिखाई है। पढते हुए आदमी चौंकता है पर अगर पुरूष लेखन में उसे बहादुरी की तरह लिया जाता है तो यहां उसके कुछ और मानी क्‍येां निकाला जाना चाहिए। ‘हरामी होता है आदमी ... तब अपना हरामीपन जाग जाता है’।
परंपरिक उपन्‍यासकारों की तरह उमा ने भी उपन्‍यास में समाज सुधारके कुछ प्रसंग साथ-साथ चलाए हैं। इस दौर में यह लेखिका की समाज के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उपन्‍यासों और कहानियों में कवितांश कोट करना लेखकों के यहां सहज होता है, वह पाठ को रोचक बनाता है। उमा ने भी कई अध्‍यायों की समाप्ति कवितांश से की है, पर वे पंक्तियां लेखिका की खुद की हैं और कहीं कहीं वो छूती भी हैं।
बेटे की यौन जिज्ञासाओं का जवाब देते जिस तरह श्‍यामली एड्स का डर दिखा उसे चुप कराने की कोशिश करती है उसे पारंपरिक पितृसत्‍तात्‍मक तरीके की कुंठाएं पैदा करने वाले भय पैदा करने की कोशिशों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।
एड्स के उदाहरण के रूप में मां-बेटे जिस तरह फिल्‍मों का उदाहरण देते हैं एक दूसरे केा वह एक बडी सामाजिक समस्‍या की ओर ईशारा करता है। श्‍यामली सोचती है- -‘हर बात फिल्‍मों के जरिए ही क्‍येां समझानी पडती है, क्‍येां हमारे पास कोई और उदाहरण नहीं होते’। यह एक बडा सवाल है जो हमारे समाज के नकलीपन को दर्शाता है।
स्त्रियों के भीतर जो सुंदर दिखने की कंडिशनिंग होती है, उस पर भी विचार किया है लेखिका ने। सारे पार्लर यूं ही नहीं चलते, करोडों का क्रीम का कारोबार यूं ही नहीं है’। यह एक गंभीर सवाल है कि –सारे दुखों के बीच भी जैसे यह कितना जरूरी होता है कि आप भीड से अलग नजर आओ। सुंदर नजर आओ।

Sunday, 24 April 2016

हृषिकेश सुलभ की कहानियां, विजयकांत और आंचलिकता

कुछ कहानियां सन्‍नाटे को भंग करती हैं पर हृषिकेश सुलभ की कहानियां सन्‍नाटे को चुपचाप ग्रस लेती हैं। इनमें जीवन के मद्धिम राग का जिस तरह प्रसार होता है वह संतोष देता है। सुलभ की कहानियों का बडा गुण यही है कि आलोचना इसकी बा‍बत बहुत कम बता सकती है। पढ कर ही इन्‍हे जाना जा सकता है।
इन कहानियों से गुजरना कुछ कुछ अपने आपको अपने समाज की अंतर्रचना के और दोनों के अंतरविरोध से उपजे परिवर्तनों को जानने और उससे आगे जाकर समझने की दृष्टि देता है। ये पुनर्रचना का उदाहरण हैं। जो एक कहानी पढने की खुशी से आगे जाकर कहानी बनने की प्रेरणा भी देती है।
ये कहानियां महानगरीय बोध से बाहर के जीवन में हो रहे परिवर्तनों की कहानी कहती हैं। स्‍त्री की प्रताडना हमारे समाज की विडंबनाओं में एक है। ‘कथावाचक की बेटी’ कहानी स्‍त्री की प्रताडनासे लेकर उसकी मुक्ति के संघर्ष तक की गाथा को बडे नाटकीय ढंग से प्रस्‍तुत करती है। इस कहानी का मूल उसकी भाषा है। भाषा को हटा देने पर कहानी में कुछ खोजना व्‍यर्थ होगा। यह कहानी ग्रामीण जीवन की कुरूपताओं को भाषा के स्‍तर पर सामने लाती है। वह एक ईमानदार कथावाचक की बेटी है। उसका बाप जिंदगी भर ईमानदारी से कथा बांचता है। बेटी ईमानदारी से कथा सुनती है और मुक्‍त होती है। पर उसका तोतारटंती समाज इससे प्रभावित नहीं होता। उसके लिए कथा उसकी उब मिटाने का एक साधन भर है। कहानी बतलाती है कि हमारे समाज में जो विभिन्‍न रीति-रिवाजों के फूल खिले थे, वे कब के मुरझा चुके हैं,अब कांटे ही शेष हैं। जिन्‍हें हम ढो रहे हैं।
जिंदगी भर फूलों की कथा सुनने वाली कथावाचक की बेटी जब ससुराल जाती है तो वहां भी फूल खोजती है पर उसका दामन कांटों से भर जाता है। वह पाती है कि वे फूल उसके तथाकथित सभ्‍य समाज के बाहर के असभ्‍य समाजों के जंगल में खिले रहे हैं। वह वहीं चली जाती है। पर क्‍या वह कथा के बाहर चली जाती है। नहीं, शायद यही कथा का विस्‍तार है, जीवन का विस्‍तार है।
भोजपुरी अंचल की भाषा सुलभ की कहानियों को अपने समय संदर्भों पर सहज पकड देती है। आज हिंदी में अधिकांशतया महानगरीय बोध की कहानियां लिखी जा रही हैं। ऐसे में सुलभ के यहां जैसे रेणु के बाद आंचलिकता अपनी सहज संप्रेषणीयता के साथ पहली बार सामने आती दिखती है।
यूं विजयकांत भी आंचलिकता से अपनी कहानियों को सशक्‍त बनाते हैं पर उनके यहां मिथिलांचल, जिस क्षेत्र की वे कहानियां हैं, की लोकभाषा पर उर्दू जैसे बेजा सवार मिलती है। इससे उन्‍हें एक शिल्‍पकाप की हैसियत तो मिलती है, एक गढाव और चुस्‍ती भी है इस अदाकारी में , पर वहां शैलियों का सामंजस्‍य गायब हो जाता है। वहां जीवन की द्वंद्वात्‍मक गति पर निर्णयात्‍मकता हावी सी हो जाती है। विजयकांत जहां शिल्‍प के स्‍तर पर दृढता का परिचय देते हैं, वहीं संप्रेषणीयता पैदा होता लगता है। उनके यहां यथार्थ कवच की तरह काम करता है। पर सुलभ सारा फैसला खुद ही नहीं कर लेते, वे पाठकों को भी निर्णय में भागीदार बनने का अवसर देते हैं। सुलभ के यहां एक उभरते चरित्र की जगह चरित्रों का समुच्‍चय है। एक पूरा टूटता व बनता हुआ समाज इन कहानियों के माध्‍यम आकार लेता दिखता है।
विजयकांत के यहां डायलाग्‍स की भरमार है, जिन्‍हे आप आसानी से कोट कर सकते हैं, उसका अभाव है सुलभ के यहां। आपको सुलभ की पूरी कहानी ही कोट करनी होगी। यह सुलभ के रचना और समाज के प्रति लगाव को दर्शाता है। सुलभ की अधिकांश कहानियां औपन्‍यासिक विस्‍तारों को खुद में समेटे चलती हैं।
सुलभ का अंचल रेणु के समय का अंचल नहीं है। उसमें नागरी संस्‍कृतिका हस्‍तक्षेप बढता जा रहा है। इस हस्‍तक्षेप के अंतर्द्वंद्व को ‘पांडे का बयान’ कहानी बयां करती है। इसमें तिरलोचन पंडित आखिर राजधानी में बसने का निर्णय लेते हैं। क्‍योंकि उनकी शर्तों पर गांव उन्‍हें जीने नहीं देता और जात ही गंवानी है तो राजधानी में गंवाएंगे।
पांडे का बयान पढकर अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह की एक कहानी याद आती है जिसमें दिल्‍ली में बसं पंडित जी की पार्टी में कोई नहीं आता तो घी के बने लड्डू वे सुबह को पडोसियों को भिजवाते हैं जिन्‍हें पडोसी बासी कहकर लौटा देते हैं।
वधस्‍थल से छलांग’ सुलभ की एक महत्‍वपूर्ण कहानी है जो मिडियाकरों की दुनिया में झांकने का प्रयास करती संपादक और पत्रकारेां के रिश्‍तों की पडताल करती है। क्‍या पत्रकारिता में संपादक हमेशा एक हस्‍तक्षेपकारी नीति के तहत ही बदला जाता है। ऐसे संपादक के नाटकीय क्रियाकलापों को उसकी पूरी रोचकता और संत्रास के साथ उकेरा है कथाकार ने, जिससे यह एक विडंबना की कथा बन जाती है। जिसमें कला और संस्‍कृति का बीट संभालने वाले को जब अपराध का बीट दे दिया जाता है तो क्‍या दिक्‍कतें आती हैं और ऐसा करना किस हद तक जायज है, जैसे सवाल उठते हैं।
क्‍या पत्रकारिता भी राजनीति की शक्‍ल लेती जा रही है, जिसमें कला के जानकार को वित्‍तमंत्री और वित्‍त को जानकार को खेलमंत्री बना दिया जाना एक सामान्‍य घटना है या इसका समाज की सापेक्षता में अपना कोई चेहरा भी है। इस महानगरीय बोध की कथा में भी सुलभ अपनी आंचलिक भाषा को परे नहीं ढकेलते। देखा जाए तो सुलभ की क‍हानियां अपनी संपूर्णता में समाज और व्‍यक्ति के द्वांद्वात्‍मक विकास को रेखांकित करती हैं।