कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Sunday, 31 January 2016

चंदन सिंह - क्या कर लेती है गाय

बीज का गुणा हुआ मिट्टी के साथ/तो एक पेड़ पर फले कई-कई फल/३पर एक दिन पेड़ के स्वामी ने/पेड़ से घटा दिए सारे फल/और इस तरह जोड़े पैसे।
बीजगणितकविता की ये पंक्तियां उद्घाटित करती हैं कि गणित जैसे कठिन विषय का आधार भी बीज हैं, जिनमें हरे जीवन की तमाम संभावनाएं छुपी होती हैं। ये और ऐसे तमाम उद्घाटनों का प्रयास करती हैं चंदन सिंह की कविताएं।
चंदन कवि को भी अपने समय में एक बीजकी तरह रहता हुआ पाते हैं और जानते हैं कि उसके अंकुरने का भी कोई समय होगा। जब उसे मिलेगी धूप-हवा मिट्टी की संगत। केदारनाथ सिंह के प्रभाव में हिंदी में ढेरों कवियों ने लिखा है पर उसे विकसित कम ने किया है। चंदन ऐसा कर पाते
हैं। केदारजी के यहां जो खिलंदड़ापन है उसे थोड़ा घटाकर चंदन उसकी जगह जीवन के रहस्योद्घाटनों को तरजीह देते दिखते हैं। तभी तो वे बाघ का पताजैसी कविता लिख पाते हैं।  
पता नहीं क्यों/मुझे लगा कि मेरे डर के बिना बाघ नंगा हो जायेगा/कि मेरे देखते-ही-देखते/उस बाघ की देह से सारी काली धारियां/बाहर निकल आईं और छोड़ी बड़ी सलाखें बनकर/बाघ को चारों ओर से घेरकर/खड़ी हो गई। 
स्पष्ट है कि यह केदारनाथ सिंह का जादुई बाघ नहीं है, जिसकी खोज में उन्हें त्रिलोचन के पास जाना पड़ता है। यह बाघ का यथार्थ है, त्रासद यथार्थ जो बाघ के डर से पैदा हुआ है।
हिंदी कविता में इधर यथार्थ के नाम पर सपाट बयानी बढ़ी है, पर चंदन सिंह का यथार्थ जीवित यथार्थ है। अपने रंग-गंध-स्पर्श के साथ। त्रासदी के साथ 
 सचमुच/क्या कर लेती है गाय/जब आदमी/उसके बछड़ों को बेच/उसे ममता के इंजेक्शन लगाता है।’  चंदन के यहां अगर बाजीगरी है तो वह भी एक यथार्थ के दर्शन कराती है। 
 बारिश थमने के इंतजार में मैं रुका हुआ था/उतनी देर जैसे/बारिश के पिंजड़े में बंद था।अरुण कमल का नया इलाकाचंदन सिंह के यहां भी बसनाकविता में है। पर यहां कवि अरुण कमल की तरह, ढहते आकाश को लेकर परेशान नहीं है बल्कि यहां की हकीकत उसे पता है कि
 जैसे-जैसे यह बसता जाएगा/वैसे-वैसे नीवों के नीचे दबते चले जाएंगे/इसके सांप/इसके बिच्छू।

राजीव पांडे - यथार्थ तक जाने की पहलकदमी

पहाड़ों पर घूमते हुए/मैं अक्सर सोचता हूं/जीवन की खुशीका इजहार करते हुए/घाटी के इन सुंदर फूलों को तोड़ लूं/बिखेर दूं बीज उनके/शहर के हर घर की/छोटी सी फुलवारी में/जहां/इन्सानियत की पौध/उगने का नाम ही नहीं लेती।
राजीव पांडे की उपरोक्त पंक्तियां बतलाती हैं कि कवि किस कदर बेचैन है। इन्सानियत की पौध को विकसित करने के लिए। राजीव हृदय रोग चिकित्सक हैं और उनकी कविताएं प्रमाणित करती हैं कि वे साहित्यिक अर्थों में भी विशाल हृदय रखते हैं। वे सीधे जीवन के यथार्थ तक जाने की पहलकदमी करते हैं और उनके निष्कर्ष पाठकों को विचलित करने वाले हैं। 
कुछ अपवादों को छोड़कर/ऐसा लगता रहा है/भूख ने भूख को ही डसा है। पारिवारिक आत्मीयजनों को लेकर भी कुछ कविताएं हैं, संग्रह में। भाई को लेकर इधर एकांत श्रीवास्तव बोधिसत्व ने मार्मिक कविताएं लिखी हैं। राजीव की एक कविता जब बड़े भैया को नौकरी मिलेगीभी भारतीय निम्न मध्यम वर्ग की त्रासदियों को सामने लाती हैं-छनकर आती लालटेन की रोशनी/जिस दिन तेज हो जाए/समझ भैया को नौकरी मिल गई । यहां यथार्थ तक जाने की और उसे रेखांकित करने की जद्दोजहद तो दिखती है, पर अक्सर वह सपाट या कठोर यथार्थ के रूप में सामने आती है। अगर कवि यथार्थ को उसकी द्वंद्वात्मकता में पकड़ने की कोशिश करे तो आगे और आशा की जा सकती है। धूमिल भी उतरप्रदेश से थे। धूमिल का प्रभाव कहीं-कहीं कौंध की तरह दिखता है कवि में। एक जगह
इसे कवि ने स्वीकारा भी है।आम आदमीको लेकर इधर कई तरह की टिप्पणियां सामने आ रही हैं, कवि की टिप्पणी भी ध्यान खींचती है। 
 आम आदमी की कविता/किसी भड़वे के नपे-तुले कदमों के पीछे/रंडी के कोठे तक पहुंचे हुए/एक भद्र पुरुष का ठिठका हुआ कदम भर है-आम आदमी को लेकर ऐसी टिप्पणियां अंततः फिकरेबाजी में बदलकर रह जाती हैं। धूमिल के यहां भी यह गड़बड़ी है। जीभ और जांघ के भूगोल से कविता में बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सकता, सिवा क्षणिक उत्तेजना पैदा करने के। यूं सच के साक्षात्कार से कवि भाग नहीं रहा है, यह महत्वपूर्ण है सच है/सुलगती हुई लकड़ियों के बीच/चांदी के बिछुओं और सोने की बाली की तलाश।

Thursday, 28 January 2016

नरेश अग्रवाल -कविता के नए घरों की महक

नरेश अग्रवाल की कविताओं से गुजरते हुए लगा, जैसे सचमुच के नए घर में प्रवेश मिला हो मुझे, कविता का नया घर। नई तो प्रकृति होती है, हर पल नई होती हुई, नरेश प्रकृति की इस अंतरलय को बखूबी पहचानते हैं: 
लेकिन यह नीला आकाश/वैसा का वैसा/दूर से अपने रंग भरता हुआ/कभी नहीं छोड़ेगा मेरा पीछा/क्या यही है मित्रा मेरा सबसे बड़ा/और इसके पास तो हैं/बड़े-बड़े चांद-सितारे/मैं एक छोटा-सा शून्य/वो भी बिना किसी चमक का/फिर भी यह संबंध बनाए रखता है मुझसे/भेजता रहता है अपनी रोशनी मुझे हर पल।
नरेश की कविताओं को पढ़कर एक तरह की आश्वस्ति मिलती है कि जीवन है अभी बाकी, अपने रंग-रूप-गंध के साथ विकसित होता हुआ। नरेश की कविता का संबंध जीवन की इसी निरंतरता और अनंतता से है। उनकी दृष्टि उसी के प्रेम में डूबी पर अतृप्त-सी उसे यहां-वहां ढूंढ़ती चलती है। नरेश के पास प्रेम पगी अच्छी कविताएं भी हैं, सहज प्रेम कविताएं: 
ये हाथों के इशारे। हवा को इधर-उधर करते हुए/एक साथ अनेक अर्थ पैदा करते हैं
संग्रह में कई प्रेम कविताएं है। वह प्रेम मात्र प्रेमिका के प्रति नहीं है, तमाम मानवीय संबंध वहां है- दादा, पिता, प्रेमिका, ताई व अन्य। इस उधेड़बुन में डूबे कई बार वे प्रेम के स्रोतों को जानने की कोशिश में उसके अदृश्य-गुप्त दरवाजों पर भी दस्तक देते नज़र आते हैं:
 ‘‘तुम धोती और कमीज में लिपटें/हमेशा एक जैसे रहे/कभी-कभी छोटी-सी बात पर/नाराज हो जाया करते थे तुम/किंतु मनाना कितना आसान था तुम्हे‍।
नरेश का मिजाज एक चिंतक का है, वे जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं, उतरते भी हैं, कभी-कभार मोती हाथ भी लगता है उन्हें, पर मोती को तराशना अभी बाकी है, वह भी आ जाएगा आगे। 
प्रातः वेला वैदिक काल से भारतीय मानस को ऊर्जस्वित करती रही है। दिन भर की काम की ऊब, उदासी से लड़ता व्यक्ति सो जाता है थक कर लंबी चादर में घुसकर। सुबह कुछ नया होने की आशा में। कवि को सुबह अच्छी लगती है क्योंकि उसे हमेशा उसका इंतजार रहता है।
श्रम-परिश्रम की महत्ता समझता है कवि और शहर में इसकी घटती संभावना को पहचानता है, वह देखता है कि किस तरह लोग पार्क में फव्वारे देख बिना परिश्रम के थके हुएलौटने लगते हैं। जीवनानुभव को अभिव्यक्त करने की क्षमता अच्छी है नरेश की, हां, विडंबनाओं के त्रासद विश्लेषण में अभी पैठ बनानी बाकी है, तभी वे परंपरा की खूबियों को समझने के साथ उसकी रूढ़ियों को जान पाएंगे और जानेंगे तो जूझेंगे। तब शायद वे जानेंगे सूअर-सी नाक वाले अपने दोस्तों की असलियत। फिर शायद वे समझ सकेंगे कि कैसे वह (सूअरी) मादरे-हिंद की बेटी है (नागार्जुन)।

विनय विश्वास - बढ़ते अंधेरे की पहचान

मध्यवर्गीय जीवन में बढ़ते अंधेरे की सही पहचान है विनय को। एक जिल्लत में बदलती जाती रोजमर्रा की जिंदगी की घुटन व त्रास को वो शिद्दत से अभिव्यक्त कर पाते हैं-
अंधेरे इतने फैल गए घरों में कि जगह नहीं बची रोशनदानों को/चोरियों ने बंद कर दिए/रोशनी और हवा के रास्ते/हम भूल गए कि दम घुटना कहते किसे हैं...
दरअसल विनय में एक वाजिब जिंदगी जीने की तड़प है और जीने के अवसरों की लगातार कटौती से वह बुरी तरह परेशान हैं। वह देख रहे हैं कि किस तरह हवा-पानी-धूप का मिलना मुहाल होता जा रहा है और अंधी करने वाली एक चौंध चहुंओर फैलती जा रही है, जो उन्हें लाजवाब करती जा रही है। हालांकि खुद मिटकर भी रोशनी पैदा करने का कवि का जज्बा मरा नहीं है: 
हमें मारकर भी/डर भर गया/अंधेरों की हाड़-हाड़ में/मिटे भी ऐसे कि दूर तक उगते चले गए/उजाड़ में।
नया कवि अपने लिए नई जमीन तोड़ता है तब ही उसे जुदा पहचान मिलती है। ऐसी नई अनुगूंजें विनय की कविताओं में भी हैं। आविष्कार, मेहनत, कुसूर, देहाती आदि ऐसी ही कविताएं हैं।
विनय की बहुत-सी कविताएं सपाटबयानी-सी हैं, वे कहीं-कहीं स्थितियों की व्याख्या करती लगती हैं और कहीं एक्सपर्ट कमेंट कर रह जाती हैं। भूतपूर्व’, ‘अन्नदाता’, ‘धन्य’, ‘कार्रवाईआदि कविताओं को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।
दुख-दर्द-पीड़ा को हथियार बना लेना भी कवि को आता है , विनय ऐसा सफलतापूर्वक कर पाते हैं, दर्द को दवा बन जाने की हद तक जज्ब करना यह सीख रहे हैं। विनय में जीवन के कई रंग हैं, प्रकृति को व जीवन की जमीनी सच्चाईयों को बचाने व उनके लिए जूझने का साहस व विवेक भी उनके पास है, हिंदी कविता उनसे आशा कर सकती है।

Sunday, 24 January 2016

रेवतीरमण - अन्वेषी प्रश्नाकुल मुद्राएं

रेवतीरमण की कविताओं से गुजरना इस मानी में एक अलग अनुभव रहा कि इसमें हमें एक आलोचकीय जद्दोजहद के बीच उपजी कविताओं से दो-चार होना पड़ा। मुक्तिबोध के बाद आलोचना कवियों के लिए निषिद्ध क्षेत्र नहीं रह गई है। इसके साथ यह भी हुआ कि कविता के  आलोचकों के लिए भी एक कसौटी बनती जा रही है। असफल कवि आलोचक होता हैवाला मुहावरा अब पुराना पड़ता जा रहा है। इसके उलट अब अच्छी कविताएं लिखने पर आलोचक की आलोचना को भी ज्यादा महत्व मिलता है। क्योंकि आलोचक की कविता उसके आलोचना कर्म की आत्मालोचना की तरह होती है। राम विलास शर्मा से लेकर नंदकिशोर, नवल परमानंद श्रीवास्तव तक आलोचकों के कविता संग्रहों की भी एक परंपरा बनती जा रही है। नामवर सिंह का चाहे कविता संग्रह नहीं आया हो पर जो भी पुरानी कविताएं उनकी दिखती हैं वो सधी हुई हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में आलोचना की करीब आधी दर्जन किताबे लिख चुके रेवतीरमण की कविताएं इस उत्तर आधुनिक समय की रूढ़ियों से हमारा परिचय
कराती हैं और उन्हें तोडऩे की चुनातैी पाठकों के लिए छोड़ जाती है- ‘‘नुकीले नखों और दांतों की फीकी पडी़ थी दुकान/विज्ञापन ने फिर से शामिल किया। हमारी आदत में एक जंगल’’
या फिर ‘‘विज्ञापन से पहले/किसी मालूम था/कि विज्ञापन के लिए कितने विकल हैं/हमारे दुःख अवसाद, उदासी और प्रसन्नता’’
वैश्वीकरण के नाम पर किस तरह रंगों की चमचमाती कीमियागरी की आड़ में एक जंगल हमारी दैनदिनी की आदतों में शामिल होता जा रहा है इसका शिद्दत से बोध कराती हैं ये कविताएं। यह कीमियागरी किस तरह खुले दिमागों को भी खाली करती जा रही है यह बतलाती हैं रेवतीरमण की कविताएं।
‘‘खाली दिमाग में उस दिन/प्रवेश नहीं कर पाएंगी किरणें/यह सोचकर ही भारी हो जाता है मन/ सुनता रहता हूं सब, समय/खाली दिमागों को खाली कनस्तरों-सा बजते’’
दिमाग खाली भर रहते तो भी एक बात थी पर आज दिमागों को खाली कर जिसतरह का वैश्विक कचरा उसमें भरा जा रहा है उससे त्रस्त दिखता है कवि। वह देखता है कि इन बददिमागों की अमद्-रफ्त बढ़ती जा रही है सभ्यता के गलियारों में और पारपंरिक हथियार पुरखों की तलवार साबित हो रहे है-
‘‘चौराहें के चबूतरे पर चढ़कर जब दहाड़ता है दरिन्दा/तो दुम दबाकर छिपने की जगह/तलाश रही होती/सुरक्षा की व्यवस्था/जुलूस और धरना और सत्याग्रह सब बेअसर/जंग लगी पुरखों की टुट ही तलवार।’’
‘‘कई बार पापी को पापी कहो/तो मुस्कुराता है कहो बेहया/तो मुदित मुंख दांत दिखाता है/सोचकर कि फोकट - में ही हो गया/बेजोड़ विज्ञापन’’। यहां रघुवीर सहाय की चर्चित कविता पंक्तियां ‘‘लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/कहकर आप हंसे’’ की याद आती है। यहां जो दरिंदे की हंसी पीछे छिपी रहती है। आज वे दुरिंदे लोकतंत्र को इस अंतिम क्षण में पहुंचा चुके हैं जहां उन्हें अपने बेहयायी को हंसी के अवरण में छुपाने की जरूरत नहीं है। कल तक अपने पाप को हंसी के अवरण में छुपाने वाला दरिंदा आज पापी और बेहया कहने पर हंसता है। आज वह दरिंदे मात्र राजनीति के क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है उसकी उपस्थिति वैश्विक हो गई है। कवि रेवतीरमण को इसकी पहचान है तभी तो वे
लिख पाते हैं-‘‘पूरा का पूरा दूरदर्शन का इक्कीस इंच का परदा/बन जाता है बलात्कारी का चेहरा’’
आखिर 21वीं सदी में बढ़ती जा रही अति-उत्तर-आधुनिकता की होड़ हमें कहां ले जाएगी। कवि के शब्दों में-‘‘एक दिन जब उड़नतश्तरियों-सी दिखेगी/हवा में तैरती इक्कीसवीं शताब्दी/न हो पांव के तले पांव रखने की जमीन भले/पर दौड़ तो सकेगा दिमाग/शताब्दी एक्सप्रेस की तरह।’’ कितना सही चित्र खींचा है कवि ने आगामी विकलांग सदी का। इन पंक्तियों को पढ़ते इस सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफेन हाकिंग की याद आती है। क्या वे इन अर्थों में भी 12वीं सदी के प्रतिनिधि हैं? इस धरती पर अपना कोई भी काम यंत्रों की सहायता बिना नहीं कर पाने वाले इस वैज्ञानिक के पास इस
समय का श्रेष्ठ ब्रह्मांडान्व्षी मस्तिष्क है। कहीं यह जमीन से कटकर ब्रह्मांडजीवि होने की त्रासद शर्त तो नहीं है। पर ऐसा नहीं है कि रेवतीरमण के यहां आगामी भविष्य के त्रासद चित्रा ही हैं। इस त्रासदी से निपटने के औजार भी वहां हैं।
कागज’, ‘कलमऔर किताबऐसी ही कविताएं हैं जो हमें कठिन समय में भी संघर्षरत रहने का
आश्वस्त करती हैं-‘‘मौसम बदल जाता है कागज की करवट से/कैसा तो पिद्धी नजर आता है तानाशाह/कागज से बड़ा माथा क्या होगा ईश्वर का/वह भी इस तेज भागते समय में/बना फिरता है कागजी’’। या ‘‘राजा राजा है/कागज पर मुहर से/प्रजा प्रजा।नरपशुओं के महाअरण्य में आज कवि को कलमसबसे कमाल की चीज लगती है। वे स्याही की हर बूंद को स्याह रात के समंदर से जूझते पाते हैं और पाते हैं कि दुर्वचन-सीउनकी नुकीली नोक से जूझते हुए आततायी की तलवार बुढ़ा जाती है। कवि का विश्वास है कि ‘‘कलम है तो कायम रहेगी यह दुनिया/कयामत के दिन भी।’’ ‘किताबमहत्वपूर्ण कविता है। कविता लिखता है-‘‘किताब के पन्नों में/इंतजार में जाग रहे सपने हैं/हांफ रहीक्ररू ता बेदम’’। ये किताबें ही हैं जो समय की रगं तपहचानती हैं और उन्हें चुनौती देती हμैं समय देवता!/तुम्हारी लक्ष्मण रेखा को/कहां मानती है किताब।इस तरह रेवतीरमण की कविताएं इस कठोर अमानुषिक होते समय के समक्ष अपनी अन्वेषी प्रश्नाकुल मुद्राओं के साथ सामने आती हैं।

Sunday, 17 January 2016

अंकुर मिश्र - राह दिखाता लैंपपोस्ट

किसी सितारे का तार टूटने पर भी 
उसे बजाया जा सकता है
मगर तभी जब तुम सागर के मध्‍य 
की खोज में निकलने की हिम्मत करो
अंकुर की कविताएं उद्दाम साहस से धाराओं का रूख बदलने की हिम्मत रखनेवाले युवा की कविताएं हैं। इस साहस का आधार संवेदनशील दृढता है, जो विवेकपूर्ण ढंग से परंपरा और आधुनिकता को नये सिरे से व्याख्यायित करना चाहती है – 
क्या पत्थर मजबूत है 
मजबूती के ढोंग ने दिया भगवान 
और कमजोरी के ढोंग ने दिया इंसान 
और अपने ढोंग का वजन कमर पर लादे 
हमारे बाल उलझ रहे हैं 
संघर्ष के समय अंकुर चरम प्रतिरोधी रूख अपनाते हैं। प्रतिरोध के चरम क्षणों में वे विचलित होते हैंभटकते हैं और अपने अस्तित्व को फिर फिर तलाशने की कोशिश करते हैं 
मैं उन गहराइयों और उंचाइयों के 
निर्वात में चकाचौंध 
अपने अस्तित्‍व की तलाश में 
भटक रहा हूं
अपने प्रतिरोधी क्षणों में वे परित्यक्तजमातों में भी नये निर्माण की संभावनाएं तलाश लेते हैं - 
रंडियों की खुली टांगें 
जो चाहें तो पैदा कर दें धरती, पाताल और 
उससे आगे भी 
अंकुर को किसी भी रूप में हार स्वीकार नहीं है -
और अंत
और मृत्‍यु 
मुझे जनमना है। 
कवि का प्रतिरोधी धारा के विरूद्ध उडान का जज्बा युवकोचित है, जो ख्वाबों की वीरानी में छलांग लगाकर काले-सफेद का फर्क पता करना चाहता है। उसके लिए उडने की चाह, सच्ची चाह हैचाहे वह उडान मौत की अंधी गुफाओं की ही क्यों न हो। प्रतिरोध के चरम पर कवि ताकत को चूकता पाता है कबड्डी का खेल बहुत खेला 
अब अपाहिज महसूस करता हूं 
ऐसे में अपने भीतर ही कोमल स्‍वरों की तलाश करता है वह 
काश कि मैं होता सुर
सुर्ख लाल रंग बहुत पसंद है अंकुर को - 
क्योंकि सुर्ख ही है रंग हमारे गर्म खून का। 
एक कविता में नीले रंग को भी बहुत सराहता है वह। वह उसकी अकांक्षाओं का नीला रंग है जिसे वह खोज निकालना चाहता है अंतरात्‍मा की परछाईयों में। इस नीले रंग में भी लहू के लाल रंग की सुर्खी छुपी है क्यों कि यह नीला रंग होगा - 
कलम से लहुलुहान कागज की रेखाओं में। 
यहां लाल रक्त ही गहराता नीला हो जाता है।
कई बार अंकुर के चरम प्रतिरोध को जब राह नहीं मिलती तो पहले वह पूरी ताकत से चोट करता है। ऐसे में वह प्रतिरोध को आत्म हनन की सीमा तक ले जाता है - 
निकले हुए खून की जडों में कूदना 
हमारे पास अब सिर्फ यही एक चारा है। 
हैमरेज। 
फिर एक तरह के तिलस्म में वह अपनी अपेक्षाओं को रहस्य मय ढंग से छुपा देता है 
दीवारों पर लाल पेशाब के छींटे 
और उसको मधुमक्‍खी की तरह 
चाटते लोग। 
भावनाओं में बह जाने को शमशेर कमजोरी मानते हैं और स्‍वीकारते भी हैं कि अक्सर तो बह ही गया मैं। भावना को लेकर मुक्त्बिोध का रवैया ज्यादा सख्‍त है। उनके अनुसार भावनाएं बच्चा हैं और अगर तुम उन्हें आदमी नहीं बना सकते तो उन्हें मार डालो। वरना वे विकृत रूप ले लेंगीराक्षस हो जाएंगी। भावना की इन विकृतियों से अंकुर का भी साक्षात्काहर होता है - 
भावनाएं वेश्‍या बन गई हैं। 
इन्‍सान का मांस बाजार में खूंटों पर टंगा है
और हम झूठे महोत्‍सवों के झूठे रंगों में 
अठखेलियां कर रहे हैं। 
कई जगह कवि अपने चरम उद्दाम आवेग को अपने वश में कर लेता है और तब उसे लगता है कि कर्णकृष्ण - मार्क्समाओ से बेहतर है दूसरे को राह दिखाने वाला लैंपपोस्ट बन जाना। अपना अस्तित्व तलाशता कवि कभी आग हो जाता है, कभी पानी बन जाता है और कभी दोनों के संतुलन से एक नयी राह तलाशने को बचैन दिखता है।