कविता अंत:सलिला है

गेटे ने कहा है कि जीवन और प्रेम को रोज जीतना पडता है। जीवन और प्रेम की तरह कविता भी उन्‍हीं के लिए है जो इसके लिए रोज लड सकते हैं। पहली बात कि कविता का संबंध उसे जिये जाने, लिखे जाने और पढे जाने से है ना कि बेचे जाने से। फिर आज इंटरनेट के जमाने में प्रकाशक अप्रासंगित हो चुके हैं न कि कविता। अब कवि पुस्‍तकों से पहले साइबर स्‍पेश में प्रकाशित होते हैं और वहां उनकी लोकप्रियता सर्वाधिक है, क्‍योंकि कविता कम शब्‍दों मे ज्‍यादा बातें कहने में समर्थ होती है और नेट की दुनिया के लिए वह सर्वाधिक सहूलियत भरी है।
कविता मर रही है, इतिहास मर रहा है जैसे शोशे हर युग में छोडे जाते रहे हैं। कभी ऐसे शोशों का जवाब देते धर्मवीर भारती ने लिखा था - लो तुम्‍हें मैं फिर नया विश्‍वास देता हूं ... कौन कहता है कि कविता मर गयी। आज फिर यह पूछा जा रहा है। एक महत्‍वपूर्ण बात यह है कि उूर्जा का कोई भी अभिव्‍यक्‍त रूप मरता नहीं है, बस उसका फार्म बदलता है। और फार्म के स्‍तर पर कविता का कोई विकल्‍प नहीं है। कविता के विरोध का जामा पहने बारहा दिखाई देने वाले वरिष्‍ठ कथाकार और हंस के संपादक राजेन्‍द्र यादव भी अपनी हर बात की पुष्‍टी के लिए एक शेर सामने कर देते थे। कहानी के मुकाबले कविता पर महत्‍वपूर्ण कथाकार कुर्तुल एन हैदर का वक्‍तव्‍य मैंने पढा था उनके एक साक्षात्‍कार में , वे भी कविता के जादू को लाजवाब मानती थीं।
सच में देखा जाए तो आज प्रकाशकों की भूमिका ही खत्‍म होती जा रही है। पढी- लिखी जमात को आज उनकी जरूरत नहीं। अपना बाजार चलाने को वे प्रकाशन करते रहें और लेखक पैदा करने की खुशफहमी में जीते-मरते रहें। कविता को उनकी जरूरत ना कल थी ना आज है ना कभी रहेगी। आज हिन्‍दी में ऐसा कौन सा प्रकाशक है जिसकी भारत के कम से कम मुख्‍य शहर में एक भी दुकान हो। यह जो सवाल है कि अधिकांश प्रकाशक कविता संकलनों से परहेज करते हैं तो इन अधिकांश प्रकाशकों की देश में क्‍या जिस दिल्‍ली में वे बहुसंख्‍यक हैं वहां भी एक दुकान है , नहीं है। तो काहे का प्रकाश्‍ाक और काहे का रोना गाना, प्रकाशक हैं बस अपनी जेबें भरने को।
आज भी रेलवे के स्‍टालों पर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स आदि की किताबें रहती हैं जिनमें कविता की किताबें नहीं होतीं। तो कविता तो उनके बगैर, और उनसे पहले और उनके साथ और उनके बाद भी अपना कारवां बढाए जा रही है ... कदम कदम बढाए जा कौम पर लुटाए जा। तो ये कविता तो है ही कौम पर लुटने को ना कि बाजार बनाने को। तो कविता की जरूरत हमेशा रही है और लोगों को दीवाना बनाने की उसकी कूबत का हर समय कायल रहा है। आज के आउटलुक, शुक्रवार जैसे लोकप्रिय मासिक, पाक्षिक हर अंक में कविता को जगह देते हैं, हाल में शुरू हुआ अखबार नेशनल दुनिया तो रोज अपने संपादकीय पेज पर एक कविता छाप रहा है, तो बताइए कि कविता की मांग बढी है कि घटी है। मैं तो देखता हूं कि कविता के लिए ज्‍यादा स्‍पेश है आज। शमशेर की तो पहली किताब ही 44 साल की उम्र के बाद आयी थी और कवियों के‍ कवि शमशेर ही कहलाते हैं, पचासों संग्रह पर संग्रह फार्मुलेट करते जाने वाले कवियों की आज भी कहां कमी है पर उनकी देहगाथा को कहां कोई याद करता है, पर अदम और चीमा और आलोक धन्‍वा तो जबान पर चढे रहते हैं। क्‍यों कि इनकी कविता एक 'ली जा रही जान की तरह बुलाती है' । और लोग उसे सुनते हैं उस पर जान वारी करते हैं और यह दौर बारहा लौट लौट कर आता रहता है आता रहेगा। मुक्तिबोध की तो जीते जी कोई किताब ही नहीं छपी थी कविता की पर उनकी चर्चा के बगैर आज भी बात कहां आगे बढ पाती है, क्‍योंकि 'कहीं भी खत्‍म कविता नहीं होती...'। कविता अंत:सलिला है, दिखती हुई सारी धाराओं का श्रोत वही है, अगर वह नहीं दिख रही तो अपने समय की रेत खोदिए, मिलेगी वह और वहीं मिलेगा आपको अपना प्राणजल - कुमार मुकुल

Sunday, 14 February 2016

निर्मला गर्ग - जिस रात की सुबह नहीं

'' जिस रात की कोई सुबह नहीं
वह रात है
गुजरात...यह रात फैलती जा रही है
... सच होते जा रहे बारंबार दुहराए झूठ
... नाच रही नंगी यह रात
... विदेशी पूंजी से बहनापा रखती
जनता की जेबों में कर रही छेद
इस रात के बाजू सहस्‍त्र हैं
इसके हैं चेहरे अनेक। ''

गर्ग जैसी राजनीतिक सचेतनता नहीं के बराबर है क‍वयित्रियों में, कुछ हैं तो अनावश्‍यक तौर पर लाउड हैं। बातों से ज्‍यादा उनका  शोर रह  जाता है, बाकी। विष्‍णु खरे ने गर्ग के आब्‍जर्वेशन को 'अदभुत' कहा है। वह अद़भुत से ज्‍यादा स्‍पष्‍ट है, इतना स्‍पष्‍ट है कि हमारे भीतर की कायरता को लगता है कि, अद़भुत है -
''मौसम्‍मी के रस की दरकार मुझे ज्‍यादा है
या उस बच्‍चे की निस्‍तेज देह को
इसका फैसला नहीं करती संसद
न्‍यायालय नहीं करता
...संसद और न्‍यायालय मेरे पक्ष में हैं।''

मृत्‍यु को लेकर बहुत लकीर पीटी है अशोक वाजपेयी ने, पर इधर पूरनचंद जोशी के बाद मौत को लेकर जैसा  ट्रीटमेंट निर्मला कविताओं में दिखता है वह 'अदभुत' है -
'' मृत्‍यु का आसरा नहीं होता
तो जीना भी आसान नहीं होता
...यह मृत्‍यु ही थी
दृष्टि दी जिसने
... उसने मुझे अपनी ओर नहीं बुलाया
दूर से ही हिलाती रही हाथ
कि मैं हूं।''

मृत्‍यु को आश्‍वस्ति के इस भाव से देखना नया है कविता में। इस नयेपन के साथ उन्‍होंने बहुत  सी बातों को देखा है , असफलताएं, युद्ध, आदि कई शब्‍दों के नये भाष्‍य हैं गर्ग की कविताओं में -
'' ताकतवर देश
अंधेरे की भाषा बोलते हैं
उपनिवेशों की सरकारें उसे दुहराती हैं''

अपनी सारी उधेडबुन, संघर्ष के बाद भी अपनी कविता को वे एक आश्‍वस्तिदायक जगह के तौर पर देखना चाहती हैं-
'' लिखी गयीं इतनी कविताएं कि
सडक बन गयी एक छोटी सी
...शहर में जब-जब धुआं उठेगा
...लोग इसी सडक से घर आएंगे।''

Friday, 5 February 2016

एकांत श्रीवास्तव -अध्यात्म का पुट

बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों का असर अब हिंदी कविता पर पड़ता दिखाई देने लगा है। तभी तो एकांत श्रीवास्तव जैसे युवा कवि यात्रा का महूरत देखने लगे हैं। अपने तीसरे संग्रह ‘बीज से फूल तक’ की कविता ‘सगुन’ में वे लिखते है-
मल्लाहों ने पतवार उठा लिए हैं खोल दी हैं घाट पर बंधी नावें किस समुद्र में डूबी पड़ी हैं हमारी नावें कि यात्रा का यह बिल्कुल ठीक सगुन है। 
कवि यहाँ चाहता तो ‘सगुन’ की जगह ‘समय’ का भी प्रयोग कर सकता था। देव, ईश्वर, प्रार्थना, स्वर्ग, पाताल, प्रलय आदि शब्दों का जिन संदर्भों में एकांत प्रयोग करते हैं, वह उनकी राजनीतिक दृष्टि की बाबत साफ-साफ कहता है। ‘सत्य की खोज की कथा’ शीर्षक कविता में वे पाते हैं कि सत्य का राहुल, यशोधरा और बुद्ध से कोई नाता नहीं है। बल्कि वह तो हमारे आसपास ही था जिसे हम पहचान ना पाने के चलते बचते फिर रहे थे। देखा जाए तो राजनीति के क्षेत्र में परंपरा और सत्य के अन्वेषियों ने ‘हस्तिनापुर’ पर कब्जा प्राप्त कर लिया है पर साहित्य में अभी ऐसा हो नहीं पाया है पर एकांत इस मामले में आश्वस्त हैं और अपनी कविताओं को विजयी होने की शुभकामनाएँ देते हैं। वे चाहते हैं कि ये कविताएँ ‘पांडवों की तरह छिने हुए हस्तिनापुर को’ पुनः प्राप्त करें। 
प्रकृति के जीवंत दृश्य एकांत की कविताओं में प्रभावी ढंग से आते रहे हैं, यहां वे अपनी ताकत के साथ मौजूद दिखते हैं। ‘जो कुरुक्षेत्र पार करते हैं’ शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियाँ इस माने में ख़ूबसूरत हैं- बिना यात्राओं के जाने नहीं जा सकते रास्ते ये उसी के हैं जो इन्हें तय करता है चांद उसी का है जो उस तक पहुँचता है..।
एकांत के पास कुछ मार्मिक कविताएं हैं- ख़ून के तालाब में डूब कर तड़पते हुए उसने इच्छा की होगी कि उसका सिर मां की गोद में हो...।
एक लंबी कविता ‘कन्हार’ में कवि अपनी स्मृतियों के सहारे लोक जीवन के संकटों को चिह्नित करता है और उनके छीजते जाने को लेकर दुख व्यक्त करता है। शहरीकरण और बाज़ारवाद के विषमतामूलक प्रभावों के प्रति कवि काफी संवेदनशील है। वह चिन्तित है कि चीज़ों की कीमतें जहाँ आकाश छू रही हैं, वहीं आदमी का बाजार भाव गिरता जा रहा है। 

Thursday, 4 February 2016

नीलेश रघुवंशी - ठहर गया आना जाना

चाहे जितना उत्तर आधुनिक हो गया हो स्त्री-विमर्श, उसे सर्वसुलभ होने में वक्त लगेगा। मध्यवर्गीय स्त्री की इच्छा-आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करती नीलेश की कविताएँ तो यही कहती हैं। कविता ‘स्त्री-विमर्श’ में वे लिखती हैं- ओ कामगार स्त्री देखती हो कभी आसमान, कभी जमीन निबटाओ बखूबी अपने सारे कामकाज होने दो मुक्त अभी समृद्ध संसार की औरतों को फिलहाल संभव नहीं मुक्ति सबकी। 
नीलेश जीवन की बहुस्तरीयता को उसकी जटिलता में पहचानने की कोशिश करती हैं। अपनी कविताओं में कई बार अपने अंतद्र्वंद्वों को वे सीधे रख देती हैं। ऐसा करते वे बहुत बार उलझ जाती हैं और हड़बड़ा कर कभी-कभी सपाट पंक्तियाँ लिख डालती हैं।
स्त्री की मुक्ति में चाहे तात्कालिक तौर पर अविश्वास प्रकट करती हों नीलेश, पर मुक्ति संघर्ष की कोशिशें और दुनिया बदल डालने की इच्छाएँ उनके यहाँ पर्याप्त जगह पाती हैं। ‘तोड़-मरोड़कर’ कविता में वे लिखती हैं- इस दुनिया को तोड़-मरोड़ कर बनानी चाहिए एक नई दुनिया। बेटी जिसमें इतनी पराई न हो। 
यह संतोषजनक है कि नीलेश की नज़र देश-दुनिया के सवालों पर भी है और अपनी राय को वे पूरी संजीदगी से अभिव्यक्त कर पाती हैं। यही कारण है कि वे 11 सितंबर की रात को दुनियावी चश्मे से न देखकर अपनी राय प्रकट करती हैं- जैसी करनी वैसी भरनी हो गई है आज की रात...। 
देखा जाए, तो हिंदी की युवा कविता का यह दौर ही संदर्भहीनता का है। कविताएँ सच्ची जिदों की जगह बचकानी जिदों से लिखी जा रही हैं। नीलेश के यहाँ भी ऐसी कुछ कविताएँ हैं जो तेजी से भागती हुई अचानक पटरी से उतर-सी जाती हैं। उदाहरण के लिए, ‘उदासी’ कविता को देखा जा सकता है। इसमें कवयित्राी उदासी को दोहराते-दोहराते उसे बदल डालने की इच्छा से जो कुछ करना चाहती है, उसका अंत उदासी के बिकने में होता है: ...बस्स बहुत हो गई उदासी/पुराने पड़ गए कपड़ों की तरह ‘उदासी को बेच कर/नए चमचमाते बरतन खरीद लाने चाहिए’, । यहाँ उदासी को पोंछे की तरह रगड़ना जहाँ एक सकारात्मक प्रयास है, वहीं उसे बेचने की कोशिश के पीछे कचरे को बेचकर दो पैसे पा लेने की बचकानी खुशी है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि पुराने कपड़ों से औरतें बरतन बदलती हैं, न कि बेचती हैं। फिर जिस वर्ग के लोगों के लिए ये कपड़े इकट्ठे किए जाते हैं उनकी दारुण स्थिति नए बरतनों की चमक में खो जाती है। यह संदर्भहीनता और भी दुखी करती है, जब ‘जीवन’ कविता में वे अपने जीवन से तंग आकर पानी से बाहर आ भोजन सामग्री में बदलने को तैयार मछलियों-सा जीवन जीने की घोषणा करती हैं। स्त्री के मुक्ति संघर्ष में अविश्वास का कारण आप चाहें तो स्त्री की इस पारंपरिक शहादत वाली मुद्रा में ढूंढ़ सकते हैं। 
नीलेश की कविताओं में विषयों की विविधता है। इनमें जहाँ बहुत-से घरेलू प्रसंगों के माध्यम से जीवन की विडंबनाओं को जाहिर किया गया है। वहीं कई जगह कवयित्री इन दुःस्थितियों के मुकाबिल खड़े होने की जद्दोजहद में लगी दिखती है। कई कविताएँ पिछले जीवनानुभवों को मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करती हैं? ‘डायरी’, ‘घर’, ‘बरबस’, ‘सोलह बरस की उमर में’ आदि ऐसी ही कविताएँ हैं। नीलेश की जो कविताएँ सर्वाधिक ध्यान खींचती हैं, उनमें जीवन की कटु सचाइयाँ, अपनी दारुणता के साथ अभिव्यक्त हुई हैं। ‘दरवाज़े’, ‘छिपाकर’, ‘प्रेम का खुलासा’ आदि उन्हीं कविताओं में हैं। ‘दरवाज़े’ की इन पंक्तियों को देखें: 
दरवाज़े जो खुले हुए थे हमारे लिए, खुले ही रह गए, हमारा आना-जाना ठहर गया। 

Wednesday, 3 February 2016

उपेेन्द्र चौहान - आततायियों के तर्क

हाल की कविताओं में उपेन्द्र चौहान ने देश-दुनिया के अंतिम आदमी को अपनी कविता के केन्द्र में रखा है, आदिवासी, मजदूर उनके नायक हैं। पर ये वे मजदूर नहीं हैं जो प्रतिरोध की किसी राजनीतिक परंपरा से जुडे हों, ये वे हैं जो सबसे निचले पायदान पर पिस रहे हैं जिनकी जरूरतों को कोई उनकी जमीन पर जाकर समझने को तैयार नहीं है, हिन्दी के कवि भी आदमी की इस जमात से अनभिज्ञ हैं। उपेन्द्र की इन कविताओं में सामन्यतया नायक नहीं हैं, और उन्हें राह दिखानेवाला भी कोई नहीं है। दश्‍ारथ माझी इसके अपवाद हैं जो उपेन्द्र के इकलौते नायक हैं। पहाड काटकर रास्ता निकालने वाले बिहार गया के दशरथ मांझी दुनिया में मानव श्रम और जीने की इच्छा की अकेली मिसाल हैं। ‘दशरथ मांझी’ कविता में उपेन्द्र लिखते हैं - दुनिया की सारी प्रेम-कथाएँ बासी पड़ चुकी हैं।
दशरथ की पत्नी को पहाड के बीच का दर्रा पार करते चोट लगी थी उसी से प्ररित हो दशरथ पहाड काटने के काम में लग गए थे। पत्नी इस बीच चल बसीं पर दशरथ का पहाड काट कर रास्ता बनाने का जज्बा खत्म नहीं हुआ। दशरथ की प्रेमकथा बासी इसलिए नहीं पडी क्योंकि वह प्रेम के साथ श्रम और अटूट धैर्य की भी कथा है। हालांकि हिन्दी के चर्चित कवि अरूण कमल दशरथ मांझी को नायक नहीं मानते उनके अनुसार - ‘दशरथ मांझी का श्रम एक व्यक्ति का था,समूह का नहीं ,इसलिये वह नायक नहीं थे’। क्या अरूण कमल बताएंगे कि किसी भी व्यक्ति, चाहे वो कैसा भी नायक हो उसका श्रम एक समूह का श्रम कैसे हो सकता है .. ।
उपेन्द्र की इन कविताओं में दुनिया भर के आदिम समाजों में जारी सकारात्मक और नकारात्मक तौर-तरीकों को जगह दी गयी है। जैसे एक कविता है बिठलाहा जिसमें संथाली समाज में बलात्कारी को दी जाने वाली सजा का विवरण आता है कि किस तरह से बलात्कारी के घर को संथाली समाज के लोग खत्म कर देते हैं और उसके परिजनों को गांव-समाज से बाहर कर देते हैं, बलात्कारी तो जान बचाकर पहले भाग ही चुका होता है, संथाल समाज के बालत्कारियों को दंडित करने के तौर-तरीकों से चाहे तो हमारा तथाकथित आधुनिक समाज सीख सकता है -
क्या तूने कहीं सुना है
देखा है... ऐसा कोई समाज
जो इस तरह हो खड़ा
दुराचार के खि़लाफ़!
चीन , कनाडा, इंडोनेशिया आदि के आदिवासी समाजों में प्रचलित कुप्रथाओं को भी अपनी कई कविताओं में अभिव्यक्त किया है उपेन्द्र ने। भारत में आज भी जहां-तहां से नर बलि की बीभत्स घटनाओं की खबर आती है जबतब। डायन कहकर भोली-भाली औरतों को आज भी झारखंड और बिहार में ओझा-गुणी अपना शिकार बना रहे हैं। अशिक्षा और कुंठाओं से उपजी इस तरह की क्रूरता के कई प्रसंग हैं यहां जो हमें विचलित करते हैं-
क्वाँरी लड़की का माँस उबालकर खाने से
कोई आदमी उड़ नहीं सकता
क्या तुम्हारा अपरिपक्व मस्तिष्क
इतना समझ नहीं सका
या

सैंडी कोई अलग से शैतान का अस्तित्व नहीं होता
आदमी ही किंवा शैतान हो जाता है

या

क्या सचमुच बलि से देवता हो जाते हैं ख़ुश
तब ऐसा क्यों नहीं करते
उस देवता की ही बलि दे देते
ताकि वह देवता हो जाए और ख़ुश!
या
युवतियों को ख़रीदकर फिर उनकी गर्दन दबाने में
तुम्हें कितना वक़्त लगता है जेंग डांगेपन
0 0 0
पुलिस बाबू,
हम तो केवल माँग की पूर्ति करते हैं-
लोग तो बस ख़ूबसूरत और जवान दुल्हनें चाहते हैं
कोई लड़की कैसे मरी या मारी गई
इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं, बाबू!
आख़िर किसी लड़की को
एक-न-एक दिन मरना तो है ही...!

अमानवीयता के कैस-कैसे तर्क हो सकते हैं आततायी समाज के यह इन कविताओं से गुजरते हुए महसूस किया जा सकता है। आततायियों के ऐसे तर्क केवल आदिम समाजों में ही नहीं मिलते आधुनिक समाजों में भी ये उसी तरह फल-फूल रहे हैं, गुजरात में हुए दंगों के पीछे के आततायियों के तर्क को हम इन सबसे अलग कैसे कर सकते हैं पर वहां के रहनुमा हैं कि  गुजरात की आधुनिकता और विकास के दावे करते नहीं थकते। देखा जाए तो यह आततायीपन दुनिया भर में नकाब के पीछे आज भी जीवित है, उसका चोला भले अलग हो पर हर जगह उसकी अमानवीयता एक सी है, उसके शिकार एक से हैं। उनका कालाजादू आज भी वैसा ही चल रहा है, आज भी आसराम बापू जैसे के आश्रम में इस कालाजादू के शिकार बच्चों की लाशें मिलती हैं। उपेन्द्र भी इससे अवगत हैं -
इवे कबीले की कुमारी
दात्सोमोर अकू
तुम
केवल घाना के बोल्टा क्षेत्र में ही नहीं हो

मैंने तुम्हें जहाँ भी ढूँढ़ा-वहीं पाया
अफ्रीका में
लैटिन अमरीका में
एशिया और यूरोप में।
इन कविताओं में उपेन्द्र ने पीडा के और भी कई प्रसंग उठाए है, क्लाड इथरली से लेकर रत्नाबाई काणेगांवकर तक, वे पाठकों को व्यथित करते हैं। आहत मनुजता के यह तमाम प्रसंग हमें सोचने को विवश करते हैं कि क्या इक्कीसवीं सदी सचमुच विज्ञान या विकास की सदी है या मध्ययुगीन कालिमा  अपनी काली उंगली उठाए हमारे भाल को आज भी कलंकित कर रही है। क्योंकि इस आधुनिक और विकासोन्मुख सदी में भी सडक पर एक प्रसवपीडिता हमारे रहनुमाओं के काफिले के गुजरने के इंतजार में अपने अजन्मे बच्चे के साथ काल-कवलित हो जा रही है। उपेन्‍द्र की एक लंबी कविता कार्यकर्त्ता  है जिसमें कवि ने राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं के दुख को जबान दी है। कार्यकर्त्ताओं पर हिन्दी में संभवतया यह पहली कविता है जो उनके पक्ष को सामने रखने की कोशिश करती है। उपेन्द्र कवि के साथ खुद एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता भी रहे हैं और इस कविता को उनका निज के साथ साक्षात्कार माना जा सकता है-
हर जगह लड़ रहे हैं कार्यकर्त्ता!
मर रहे हैं कार्यकर्त्ता!
उनके ख़ून से अभी तक माटी में है ललाई
नेता बन रहे ख़ून सोख्ता!
इस ढ़लती उम्र में अभी तक
जो रह गये हैं केवल कार्यकर्त्ता
उन्हीं के संघर्ष से कहीं पक रहा है लोहा
और बन रहे हैं औज़ार
और हो रही तैयारी- किसी युद्ध की!

Monday, 1 February 2016

बोधिसत्व - अपने समय में हस्तक्षेप

स्मृति और इतिहास बोध से बने अपने कलात्‍मक भाषाई स्थापत्य को लेकर बोधिसत्व को जाना जाने लगा है। उनकी लंबी कविता एक आदमी मुझे मिलाको लें, तो उसमें कवि एक आदमी के बहाने अतीत की तमाम अंधेरी गलियों में घूम आता है-
सब जल्दी में थे
जिन्ना को जाना था कहीं
मुजीबुर्रहमान सोने के लिए
कोई छाया खोज रहे थे।
इधर की हिंदी कविता में करुण प्रसंग गायब होते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि करुण प्रसंग के कारक गायब हो गए हैं। त्रासदियां, विडंबनाएं समाप्त हो चुकी हैं। वस्तुतः करुणा आज फैशन में नहीं रही है और कविता बड़ी जमात के लिए फैशन होती जा रही है। वे वैसी कविताएं लिखते हैं, क्योंकि वैसा लिखने का चलन है। कवि कविता कम आज शोध ज्यादा कर रहे हैं। ऐसे में भाईकविता की मर्मांतकता बेध कर रख देती है।
पिछले कई बरस से
भाई के पास कोई काम नहीं है।
असल में पिछले कई साल से भाई को
पलभर का आराम नहीं है।
...
झुका माथा, गिरी आंखें, थकी बोली,
भाई का अब कैसा भी, कोई संग्राम नहीं है।
क्या काम की तलाश में दर-दर की ठाकरें खाता आपका बेरोजगार भाई आपको याद आ रहा है?
 कमला दासी की कविताएंमें कमला कवि को उनके आश्रम में ले जाती हे। वहां जाकर
कवि संन्यासिनों के यौन शोषण की चली आ रही कड़ियों को देखता है। ये कविताएं कमला के त्रासद अनुभवों की अभिव्यक्तियां हैं। 
 सपनेकविता में कवि लिखता है -
किसी काम की नहीं
मैं तो बासन भी नहीं मल सकती।
दर नहीं सकती दाल
इतनी घायल कि बहुत देर तक
हंस भी नहीं सकती, रो भी नहीं सकतीं।
क्या आज के इस उत्तर आधुनिक युग का कोई तालमेल बैठता है, कमला जैसी देवदासियों से, पर वे चली आ रही हैं परंपरा और आधुनिकता दोनों का उपहास उड़ातीं?
आखिर कहां जाएं ये संन्यासिनें जब मिट्टी के माधो बने उनके देवता, उनकी ना सुनें।
मैं किन के लिए
अभी भी हूं
सुंदर और कुंआरी
मूड़ मुंडाकर मैं
किसे खोजती हूं
अपने अंतः के झाड़-झंखाड़ में।
श्रीकांत वर्मा ने कभी लिखा था-‘जब कोई नहीं करता/तब सड़क से गुजरता हुआ मुर्दा/यह कह कर हस्तक्षेप करता है/कि आदमी क्यों मरता है। बोधिसत्व की कविताएं भी इस समय में ऐसे ही हस्तक्षेप की तरह हैं।